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बीमार पति और बच्चों की ज़िम्मेदारी फिर भी हिम्मत नहीं हारी, लोगों ने कहा 'सरिता को सलाम'

सरिता का गांव मुंगेर ज़िला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर है। वह अपने गांव से लोगों को बाज़ार ले जाती है और फिर बाज़ार के गांव वापस लाती है। सरिता अपने प्रखंड की पंचायतों में ई-रिक्शा चला कर रोज़ाना 8 सौ रुपये तक कम...

मुंगेर, 23 सितंबर 2022। स्त्री के कई रूप होते हैं, यह बात मोहराटन गांव (भूना पंचायत, टेटिया बंबर प्रखंड) की रहने वाली सरिता पर बिल्कुल सटीक बैठती है। सरिता ने एक पत्नी और मां का कर्तव्य बखूबी निभाते हुए समाज के लिए मिसाल पेश की है। दरअसल सरिता अपने बीमार पति और बच्चों की परवरिश के लिए ई-रिक्शा चला रही है। सरिता अपने जिला की पहली महिला हैं, जो परिवार के गुज़ारा के लिए ई-रिक्शा चला रही है। उनके इस फैसले से अन्य महिलाएं भी प्रेरित होकर इस ओर क़दम बढ़ा रही हैं।

सरिता ने अन्य महिलाओं को दिया हौसला

सरिता ने अन्य महिलाओं को दिया हौसला

सरिता का गांव मुंगेर ज़िला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर है। वह अपने गांव से लोगों को बाज़ार ले जाती हैं, और फिर बाज़ार से गांव वापस लाती हैं। सरिता अपने प्रखंड की पंचायतों में ई-रिक्शा चला कर रोज़ाना 8 सौ रुपये तक कमा रही है। ई-रिक्शा चलाने की वजह से उनके घर कि आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हुई है। सरिता को देखते हुए अब समाज की अन्य महिलाएं भी इस ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित हो रही हैं।

'परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं थी ठीक'

'परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं थी ठीक'

सरिता देवी ने बताया कि शंकर मांझी से उसकी शादी 2008 में थी। पति पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए बेरोज़गार ही रह गए। तबियत सही नहीं होने की वजह कोई और काम भी नहीं कर पाते थे। पैसे की कमी की वजह से पूरे परिवार को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सरिता ने बताया कि उनके दो बेटे और एक बेटी है। ग्राम संगठन सफलता की जीविका कार्यकर्ता सिंधु कुमारी को 2021 में उन्होंने अपनी परेशानियां बताई। जिसके बाद उन्हें जीविकोपार्जन योजना के तहत ई-रिक्शा दिया गया। फिर उन्होंने ई-रिक्शा चलाना सीखा और अपने प्रखंड़ में ही ई-रिक्शा चलाने लगी।

एक फ़ैसले ने बदली सरिता की क़िस्मत

एक फ़ैसले ने बदली सरिता की क़िस्मत

ई-रिक्शा चलाने से कुछ आमदनी हुई तो बीमार पति का इलाज कराया और अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। सरिता देवी का कहना है कि महिलाएं कभी भी पुरुषों के कम नहीं थी। पुरुष जिस तरह से काम कर ज़िंदगी गुज़ार सकते हैं, वैसे महिलाएं भी जीवनयापन कर सकती हैं। इसलिए ही उन्होंने ई-रिक्शा चलाने का फ़ैसला लिया, इसी फ़ैसले से उनकी किस्मत बदली और अब एक अच्छी ज़िंदगी गुज़ार रही हैं।

ई-रिक्शा चलाने से आत्मविश्वास बढ़ा- सरिता

ई-रिक्शा चलाने से आत्मविश्वास बढ़ा- सरिता

सरिता का कहना है कि जब महिलाएं दफ़्तर में काम कर सकती हैं, तो फिर सड़कों पर ई-रिक्शा क्यों नहीं चला सकती। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए ई-रिक्शा चलाने में संकोच नहीं करना चाहिए। सरिता ने कहा कि ई-रिक्शा चलाने का काम शुरू करने से उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है। वह अपने काम को ईमानदारी के साथ कर रही हैं और इससे फायदा मिल रहा है। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि सरिता अपनी लगन और कड़ी मेहनत से दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। सरिता के इस जज्बे को 'सलाम' है। वह अपने काम के ज़रिए अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देते हुए उसकी ज़िंदगी भी संवार रही हैं।

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