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चाचा-भतीजे ने बिहार में बढ़ाई शाह की टेंशन! नीतीश को साथ लाकर बुरे फंसे, क्यों नहीं हो पा रहा सीटों का बंटवारा?

Lok Sabha Election, NDA Seat Sharing In Bihar: देश की वर्तमान सरकार का कार्यकाल इसी साल मई के महीने में पूरा होने जा रहा है। ऐसे में अगले एक महीने के अंदर हर हाल में लोकसभा का चुनाव होना तय है। इसे लेकर किसी भी दिन चुनाव तारीखों का ऐलान किया जा सकता है।

लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों की नजर खास कर यूपी, बिहार और बंगाल पर टिकी होती है। इसकी बड़ी वजह इन राज्यों में मौजूद लोकसभा सीटों की संख्या है।
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Lok Sabha Election NDA Seat Sharing In Bihar

हाल ही में बिहार के अंदर हुआ सत्ता परिवर्तन लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए खुशी और टेंशन दोनों साथ लेकर आई है। खुशी सूबे के अंदर भाजपा के वापस सत्ता में आने की है तो टेंशन यह कि लोकसभा चुनाव के लिए सहयोगियों के साथ सीटों का बंटवारा किस फॉर्मूले के तहत किया जाए।
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छोटे दल बिगाड़ सकते हैं खेल
बिहार की सत्ता में काबिज एनडीए में वर्तमान में छह राजनीतिक दल शामिल हैं। यहां लोकसभा सीटों की संख्या 40 है। ऐसे में सहयोग के साथ चुनाव लड़ने के लिए किसी न किसी पार्टी को कड़वा घूंट तो जरूर पीनी पड़ेगा, वरना मामला बेहद पेचिंदा हो सकता है।

इस चुनाव में भाजपा ने जो 400 पार का मिशन रखा है, ,सीट शेयरिंग में मामला फंसने पर उसे तगड़ा झटका लग सकता है। इसकी वजह एनडीए में शामिल कोई बड़ा दल नहीं बल्कि छोटे दल हो सकते हैं।
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खुद के पैर पर भाजपा नहीं मारेगी कुल्हाड़ी
बिहार के अंदर एनडीए में सांसदों की संख्या के अनुसार देखें तो भाजपा सबसे आगे है। इसके पास सीटिंग सांसदों की संख्या 17 है। इसके बाद जदयू के सीटिंग सांसदों की संख्या 16 है। तीसरे नंबर पर आती है पशुपति पारस की लोजपा, जिनके पास सीटिंग सांसदों की संख्या वर्तमान में 4 है।

इसके बाद आता है चिराग पासवान का नंबर, जो अपनी पार्टी से खुद एक मात्र सांसद हैं। इसके अलावा दो और पार्टियां हैं। उनमें से एक भाजपा के लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि इनकी वजह से ही बिहार की सत्ता में भाजपा की वापसी हुई है और दूसरी बड़े वोट बैंक को अपने साथ लेकर चलते हैं। ऐसे में इनको नराज कर भाजपा चुनाव से पहले अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारेगी।
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भतीजे ने बढ़ाई हुई है बीजेपी की टेंशन
ऐसे में बात आती है कि बिहार में यदि सबकुछ साफ है तो फिर सीट का बंटवारा क्यों नहीं हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह बिहार में मौजूद चाचा-भतीजे की जोड़ी है।

हम नीतीश और तेजस्वी की नहीं बल्कि चिराग और पारस की बात कर रहे हैं। दरअसल, चिराग पासवान का कहना है कि उन्हें लोकसभा चुनाव में 4 से अधिक सीट दी जानी चाहिए और साथ ही एक राज्यसभा सीट भी मिलनी चाहिए। यानी चिराग 2014 के लोकसभा चुनाव की तरह सीटों की मांग कर रहे हैं।

इसके पीछे चिराग का कहना है कि आज वो अपने चाचा से अलग हो गए हैं लेकिन पिछला चुनाव साथ लड़े थे। ऐसे में जीत उनके और उनके पिता रामविलास पासवान और पीएम मोदी के वजह से हुई थी ना की चाचा पशुपति पारस की वजह से।
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ऐसे में चिराग का कहना है कि उनको (पशुपति पारस) को हमसे अधिक सीट देने को कोई मतलब नहीं रह जाता है। क्योंकि उनके सांसद चिराग के बल पर जीते थे भले ही आज वो कहीं और चले गए हो। चिराग का कहना है कि दलित का वोट बैंक उनके पास है। चिराग की पहली डिमांड पशुपति पारस की हाजीपुर सीट है। उसके बाद वो नवादा और जमुई सीट के साथ ही साथ वैशाली और किशनगंज में भी एक सीट की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा एक राज्यसभा सीट की भी डिमांड उन्होंने की है।
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चाचा की भी अनोखी मांग
वहीं, चिराग के चाचा की दलील है कि उन्होंने हमेशा से भाजपा का साथ दिया है। बीच में चिराग पासवान ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था। उनका कहना है कि भले चिराग और वो साथ में चुनाव मैदान में थे लेकिन अब उनके पास सांसदों की संख्या अधिक है तो उस हिसाब से उन्हें अधिक सीट मिलनी चाहिए, जितनी उनकी सेटिंग है। इसके बाद भाजपा यदि राज्यसभा सीट देना चाहती है तो स्वीकार है। हालांकि उन्होंने खुद अपनी ओर से खुल कर बातें सामने नहीं रखी हैं।
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छोटे दल में कहां है परेशानी ?
इसके अलावा बात करें अन्य छोटे दल की तो जीतन राम मांझी की पार्टी की कोई बड़ी डिमांड लोकसभा के लिए नहीं है। इसकी वजह मांझी के पार्टी का अभी खुद के लोकसभा चुनाव के लिए ताकतवर नहीं बना पाना है।

ऐसे में मांझी जातीय समीकरण के आधार पर एक सीट की मांग रखी है ऐसा सूत्रों का कहना है। इसको लेकर भाजपा आलाकमान भी राजी भी हो गए हैं। इसके बाद बचते हैं उपेंद्र कुशवाहा, तो इनकी पार्टी में खुद के अलावा कोई बड़ा चेहरा भी नहीं है लिहाजा वो बस खुद को कैंडिडेट बना चुनाव लड़ सकते हैं या एक सीट पर चुनाव लड़ सकते हैं।
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जदूय का नया प्लान
उधर, यदि बात करें भाजपा और जदयू की तो भाजपा इस बार भी बिहार में अपने सीटिंग सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। यदि मुकेश सहनी साथ आते हैं तो भाजपा एक सीट का समझौता उनके लिए कर सकती है और उम्र वाला फार्मूला लगाकर एक सीटिंग सांसद का पत्ता काट सकती है। इनके आलावा सीट बदलने की भी चर्चा होती हुई नजर आ रही है, लेकिन संभावना बेहद कम है।

वहीं, जदयू इस बार सीटिंग सीट पर यानी 16 सीट पर चुनाव तो लड़ेगी लेकिन एक नाम चौंकाने वाला हो सकता है। ऐसा हो सकता है कि उपेंद्र कुशवाहा के करीबी जदयू के सिंबल पर चुनाव लड़ते नजर आएं।

बहरहाल, बिहार में सीट बंटवारे का सारा खेल चाचा-भतीजे की जोड़ी पर ही निर्भर करता है। यदि भाजपा आलकमान दोनों को मना लेते हैं तो बहुत से कैंडिडेट के नाम के साथ सीटों की संख्या भी सामने आ सकती है और बिहार में महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ सकती है। यदि बात नहीं बनती है तो यह फिर नीतीश और मोदी की डबल इंजन की सरकार को परेशानी में डाल सकती है।
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