इन मुहूर्तों में विवाह नहीं करना चाहिए वरना हो सकता है बड़ा नुकसान
शायद इस बारें में लोगों को ठीक से जानकारी ही न पता हो कि विवाह किस मुहूर्त में और कब नहीं करना चाहिए। चलिए हम आपको बताते है विवाह किस मास में, किस नक्षत्र में और किस मुहूर्त में नहीं करना चाहिए।
नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में विवाह का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि जोड़ियां उपर से बनकर आती है, बस नीचे उन्हें खोजकर मिलाया जाता है। जब हम रिश्ता पक्का करने के लिए इतनी जांच-पड़ताल करते है तो फिर आखिर विवाह का मुहूर्त निकलवाने में इतनी जल्दी व लापरवाही क्यों ? शायद इस बारें में लोगों को ठीक से जानकारी ही न पता हो कि विवाह किस मुहूर्त में और कब नहीं करना चाहिए। चलिए हम आपको बताते है विवाह किस मास में, किस नक्षत्र में और किस मुहूर्त में नहीं करना चाहिए।

1- 27 नक्षत्रों में 10 ऐसे नक्षत्र होते है, जो विवाह के लिए वर्जित है। जैसे-आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती आदि। इन 10 नक्षत्रों में कोई भी नक्षत्र हो या सूर्य सिंह राशि में गुरू के नवमांश में गोचर कर रहा हो तो विवाह कदापि नहीं करना चाहिए।
2- जन्म नक्षत्र से विवाह होने की तिथि में 10वां, 16वां, 23वें नक्षत्र में अपनी बड़ी सन्तान का विवाह नहीं करना चाहिए।
3- विवाह का मुख्य कारक शुक्र होता है, इसलिए जब शुक्र बल्यावस्था में हो या कमजोर हो तब विवाह करना सुख कारक नहीं होता है। शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के 3 दिन तक बाल्यावस्था में रहता है और जब वह पश्चिम दिशा में होता है तो 10 दिन तक बाल्यावस्था में होता है। शुक्र अस्त होने से पहले 15 दिन तक कमजोर अवस्था में रहता है और शुक्र अस्त होने से 5 दिन पूर्व वृद्धावस्था में रहता है। इस काल में विवाह नहीं करना चाहिए।
4- गुरू भी विवाह में अहम भूमिका निभाता है, इसलिए गुरू का बलवान होना भी जरूरी होता है। यदि गुरू बाल्यावस्था, वृद्धावस्था या कमजोर है तो भी विवाह जैसे शुभ कार्य करना उचित नहीं होता है। गुरू उदित व अस्त दोनों परिस्थितियों में 15-15 दिनों तक बाल्याकाल व वृद्धावस्था में रहता है। इस दौरान भी विवाह करना उचित नहीं होता है।
5- विवाह कार्य के लिए वर्जित समझा जाने वाला एक योग होता है, जिसे त्रिज्येष्ठा कहते है। इसमें बड़ी सन्तान का विवाह ज्येष्ठ मास में नहीं करना चाहिए और ज्येष्ठ महीने में उत्पन्न लड़के-लड़की का विवाह भी ज्येष्ठ महीने में नहीं करना चाहिए।
6- त्रिबल विचार- इसमें गुरू ग्रह कन्या की जन्म राशि से प्रथम, आठवें व 12वें भाव में गोचर कर रहा हो तो विवाह करना शुभ नहीं होता है। बृहस्पति ग्रह कन्या की जन्म राशि से मिथुन, कर्क कन्या व मकर राशि में गोचर कर रहा हो तो यह विवाह कन्या के लिए हितकर नहीं होता है। गुरू के अतिरिक्त सूर्य व चन्द्रमा का गोचर भी शुभ होना चाहिए।
7- चन्द्रमा मन का कारक होता है, इसलिए विवाह कार्य में चन्द्र की शुभता व अशुभता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। चन्द्र अमावस्या से तीन दिन पहले व तीन बाद तक बाल्यावस्था में रहता है। इस समय चन्द्रमा अपना फल देने में असमर्थ होता है। चन्द्र का गोचर चैथे व आठवें भाव में छोड़कर शेष भावों में शुभ होता है। चन्द्र जब पक्षबली, त्रिकोण में, स्वराशि, उच्च व मित्रक्षेत्री हो तभी विवाह करना चाहिए।
8- सगी दो बहनों का विवाह एक घर में या एक लड़के से नहीं करना चाहिए। दो सगे भाईयों का विवाह दो सगी बहनों से भी नहीं करना चाहिए। दो सगे भाईयों का या दो सगी बहनों का विवाह एक मुहूर्त या एक मण्डप में नहीं करना वर्जित है।
9- पुत्री का विवाह करने के बाद 6 महीने के अन्दर लड़के का विवाह न करें और न ही पुत्र का विवाह करने के बाद 6 माह के भीतर पुत्री का विवाह करें। अर्थात सगे भाईयों या बहनों का विवाह 6 माह के अन्दर करना शास्त्रों के अनुसार वर्जित है।
10- विवाह में गण्डान्त मूल का भी विचार करना चाहिए। जैसे मूल नक्षत्र में पैदा हुयी कन्या अपने ससुर के लिए कष्टकारी मानी जाती है। अश्लेषा नक्षत्र में जन्मी कन्या अपनी सास के लिए अशुभ होती है। ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न हुई कन्या अपने ज्येठ के लिए अशुभ होती है। इन नक्षत्रों में जन्मी कन्या से विवाह करने से पूर्व इन दोषों का निवारण अवश्य करना चाहिए।
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