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Floriculture : कानूनी दांव-पेंच में नहीं लगा मन, वकील ने फूलों की खेती में गाड़े कामयाबी के झंडे

नवाबों के शहर लखनऊ से वकालत की डिग्री लेने के बाद गांव लौटे एक वकील ने खेती में गाड़े सफलता के झंडे। सक्सेस ऐसी की सरकारों ने कई बार किया सम्मानित। जानिए फूलों की खेती यानी फ्लोरीकल्चर में सफलता की प्रेरक कहानी

बाराबंकी, 10 मई : फूलों की खेती कर रहे मोइनुद्दीन ने बताया कि पढ़ाई पूरी करने के बाद 2002 में उन्होंने गांव में खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि शुरुआत में वे आलू-धान-गेहूं और सरसों जैसी फसलों को ट्रेडिशनल तरीकों से उगाते थे, लेकिन अपेक्षा के मुताबिक मुनाफा नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने खेत में इनोवेशन का फैसला लिया। मोइनुद्दीन ने बताया कि लखनऊ में विदेशी मूल के फूलों की महंगी बिक्री होते देख उन्होंने सबसे पहले हॉलैंड मूल के फूल ग्लैड्यूलस को उगाने का फैसला लिया। उन्होंने कहा कि फूलों के बीज लगाने के बाद उपज अच्छी रही और मुनाफा भी हुआ। फायदा होने के बाद काफी बड़े क्षेत्रफल में ग्लैड्यूलस की बुआई की। कोरोना काल की चुनौतियों के बारे में उन्होंने कहा कि लगभग दो साल तक फूल बर्बाद हुए। कोरोना महामारी के कारण लगाई गई पाबंदियों के कारण कोई समारोह नहीं होने के कारण डेकोरेशन में फूल का प्रयोग नहीं होता था। ऐसे में फूलों की बिक्री नहीं होती थी, लेकिन चुनौतियों के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, और हालात सुधरने के बाद प्रतिदिन 15-20 हजार रुपये प्रतिदिन की आमदनी हो रही है।

पांच साल तक मिलते रहेंगे फूल

पांच साल तक मिलते रहेंगे फूल

मोईनुद्दीन बताते हैं कि नॉर्मल खेती की तुलना में फूलों की खेती में फायदा अधिक है। उन्होंने कहा कि सामान्य खेती में अगर एक एकड़ में 30-40 हजार रुपये की बचत होती है तो उतनी ही जमीन पर पॉलीहाउस फार्मिंग से 15-20 लाख रुपये प्रति एकड़ की बचत की जा सकती है। ग्लैड्यूलस फूल से एक एकड़ में चार-पांच महीनों के भीतर एक से डेढ़ लाख रुपये का नेट प्रॉफिट होता है। इंस्टॉलेशन और रखरखाव के सवाल पर उन्होंने बताया कि एक पॉली हाउस बनाने में लगभग 60 लाख का खर्च आता है, जिसमें सरकार 50 फीसद की सब्सिडी देती है। एक बार पौधे लगाने के बाद पांच-छह साल तक फूल मिलते रहते हैं।

दिल्ली-मुंबई तक फूलों की डिमांड

दिल्ली-मुंबई तक फूलों की डिमांड

ग्लैड्यूलस को खुले खेत में उगाया जाता है। बुआई का समय 15 अगस्त से शुरू होता है और लगभग 90 दिनों तक इसे रोपा जा सकता है। मोइनुद्दीन ने बताया कि बुआई के 80-90 दिनों में फूल आने लगते हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआत में वे अकेले फूलों की खेती कर रहे थे, लेकिन बाद में गांव के अन्य लोगों को भी फूलों की खेती के लिए प्रेरित किया। मंडी में फूलों की दूसरी वेराइटी देखने के बाद उन्होंने जरबेरा की खेती करने का फैसला लिया, लेकिन जरबेरा की खेती खुली जमीन पर नहीं की जा सकती, इसके लिए पॉलीहाउस का प्रयोग करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि उनका गांव फूलों के गांव के रूप में भी मशहूर हो चुका है। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में उनके फूलों की डिमांड है।

25 एकड़ क्षेत्रफल में फूलों की खेती

25 एकड़ क्षेत्रफल में फूलों की खेती

2002 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई करने के बाद वकालत में मन नहीं लगा। पुश्तैनी गांव में लौटने के बाद उन्होंने खेती से जुड़ने का फैसला लिया। 15 हजार ग्लैडोलियस फूल लगाने के बाद उन्हें चार से पांच महीनों के भीतर करीब 40-45 हजार रुपये का मुनाफा हुआ। उत्साह बढ़ने का आलम ऐसा कि 18 वर्षों के बाद वकील मोइनुद्दीन आज लगभग 25 एकड़ क्षेत्रफल में फूलों की खेती कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 2009 में हॉलैंड में उगए जाने वाले जरबेरा की खेती की शुरुआत की। महंगा बिकने के कारण जरबेरा उगाने पर एक बीघा जमीन में उन्हें 4-5 लाख रुपये तक की आमदनी होने लगी।

पीएम मोदी ने पुरस्कार दिया

पीएम मोदी ने पुरस्कार दिया

फूलों की खेती को मिलने वाले सम्मान के बारे में मोइनुद्दीन बताते हैं कि खेती से पैसों के अलावा जो सम्मान मिला, शायद उतना किसी दूसरे पेशे में ऐसा होना मुश्किल था। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार उन्हें सम्मानित कर चुके हैं। बकौल मोइनुद्दीन, पीएम मोदी से यूपी के बेस्ट फार्मर का अवॉर्ड मिला था। उन्होंने कहा कि 2013 में वाइब्रेंट गुजरात के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार उन्हें अवॉर्ड दिया था। इसके बाद नई दिल्ली में पूसा इंस्टीट्यूट में पीएम मोदी ने पुरस्कार दिया था। बकौल मोइनुद्दीन, देश के दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम खुद बाराबंकी में उनकी खेती देखने आए थे। इसके अलावा उद्यान रत्न का सम्मान मिला। महाराष्ट्र सरकार और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी उनकी सराहना की है।

किसानों के लिए कुछ करने की खुशी
उन्होंने कहा कि उनकी प्रेरणा से इलाके के कई किसान लाखों रुपये कमा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि अपना साथ-साथ समाज के लिए भी कुछ किया। उन्होंने बताया कि जो किसान एक बीघे में 10-20 हजार कमाने में संघर्ष करता था, आज लाखों रुपये कमा रहा है। समाज और देश के किसानों के लिए कुछ करने की यह संतुष्टि किसी भी सम्मान से बड़ी है।

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