राज्यों में मनोनीत पदों पर नियुक्ति को लेकर भाजपा का है दोहरा मापदंड
तेलंगाना की राज्यपाल तमिलिसाई ने राज्यपाल के कोटे के तहत बीआरएस नेता दासोजू श्रवण और कुर्रा सत्यनारायण को विधान परिषद में नामित करने के कैबिनेट के प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसके बाद से तेलंगाना की सत्तारूढ़ पार्टी राज्यपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले बोल रही है। हालांकि सच है कि राज्यों की विधान परिषदों में सदस्यों के नामांकन की बात आती है तो भाजपा के पास दो नियम है। आइए जानते हैं कैसे?

भाजपा शासित राज्यों में अगर विधान परिषद में राज्यपाल के कोटे के अंतर्गत राज्य कैबिनेट जिसे भी नामित करती है, उसे बिना किसी समस्या के स्वीकार कर लिया जाता है। वहीं गैर-भाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल कोटे के तहत राज्य की कैबिनेट द्वारा नामांकित नेताओं के लिए ये समान मानदंड का उपयोग किया जाता है। वहां पर नामांकन को या तो राज्यपाल द्वारा चुनौती दी जाती है और या तो खारिज कर दिया जाता है, जैसा कि हाल ही में तेलंगाना में हुआ है।
यूपी में राज्यपाल ने दे दी थी तुरंत मंजूरी
उत्तर प्रदेश जहां पर भाजपा की योगी सरकार है वहां पर राज्यपाल के कोटे से 10 लोगों को विधान परिषद में मनोनीत किया गया था, जिनमें से आठ भाजपा के सदस्य थे। यहां तक कि बाकी दोनों भी पार्टी से जुड़े हुए थे। यहां पर राज्यपाल ने बिना किसी आपत्ति या पूछताछ के उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी थी। यूपी में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए जितिन प्रसाद को एमएलसी के रूप में नामित किया था और सीएम योगी की मंत्रीमंडल में शामिल किया गया था।
ऐसे ही जब कर्नाटक में पिछले कार्यकाल में भातरीय जनता पार्टी सत्ता में थी, तब राज्यपाल कोटे के 11 राज्यपाल कोटे के 11 एमएलसी पदों में से आठ पूर्व मंत्री, सांसद, विधायक या राजनीतिक दलों के सदस्य थे। बाकी अलग क्षेत्र से जुड़ी हस्तियां थी। जिसमें यूबी वेंकटेश एक व्यवसायी थे, तलवार सबन्ना, रानी चेन्नम्मा विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और शांताराम बुदना सिद्दी आदिवासी बैग्राउंड से थे। इनमें सबन्ना और सिद्दी दोनों को आरएसएस का सपोर्ट था। आरएसएस से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम में स्वयंसेवक के तौर पर शांताराम बुदना सिद्दीकाम करते थे।












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