महाराज विक्रमादित्य की कुलदेवी हैं बम्लेश्वरी माता, मंदिर निर्माण से जुड़ी है अद्भुत प्रेम कहानी
राजनांदगांव, 03 मार्च। छत्तीसगढ़ में कई ऐसे मंदिर हैं, जिसकी ख्याति पूरे देश में है। राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित माता बम्लेश्वरी का मंदिर भी ऐसा ही मंदिर है, जहां देवी भक्त देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर से माता के दरबार में माथा टेकने आते हैं। इस मंदिर की स्थापना से लेकर मान्यताओं से जुड़ी जानकारियां बेहद रोचक हैं।

2 हजार फीट की ऊंचाई पर विराजमान है माता बम्लेश्वरी का मंदिर
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पहाड़, जंगल और हरियाली है। डोंगरगढ़ भी ऐसा ही इलाका है, जहां हरीभरी पहड़ियों के शीर्ष पर बगलामुखी देवी माता बम्लेश्वरी के रूप में विराजमान हैं। डोंगरगढ़ की सबसे ऊंची चोटी पर विराजी डोंगरगढ़ की बम्लेश्वरी माता का इतिहास काफी पुराना है। ऐसे तो यहां पूरे साल भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्रि के दौरान यहां भव्य मेला लगता है।
बम्लेश्वरी माता का मंदिर डोंगरगढ़ की पहाड़ी में लगभग 2 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। माता के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्तों की मंडली यहां पहुंचती है। 1100 सीढ़ियां चढ़ने के बाद ही भक्त माता के मंदिर तक पहुंच पाते हैं, लेकिन जो इतनी सीढियां चढ़ने में अक्षम हैं, वह रोप वे की मदद से माता के दरबार तक पहुंच सकते हैं।

कामख्या नगरी के नाम से जाना जाता था पहले डोंगरगढ़
डोंगरगढ़ की लोक कथाओं में कामकंदला और माधवानल की प्रेम कहानी बहुत लोकप्रिय है। बताया जाता है कि करीब ढाई हजार वर्ष पहले डोंगरगढ़ को कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था, जहां राजा वीरसेन का शासन था। राजा वीरसेन ने अपने पुत्र का नाम मदनसेन रखा था, जो आगे चलकर कामख्या नगरी के राजा बने। मदनसेन ने काफी समय तक राजगद्दी की जिम्मेदारी संभाली इस दौरान उन्हें कामसेन के तौर पर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जो आगे चलकर राजा बने। माना जाता है कि कामाख्या नगरी में कामकंदला नामक राज नर्तकी थी, क्योंकि राजा कामसेन संगीतकला के प्रेमी थे, इसलिए उन्होंने नर्तकी कामकंदला और संगीतकार माधवानल को अपने दरबार में विशेष स्थान दे रखा था। एक बार राजा ने कलाकारों की प्रतिभा से प्रसन्न होकर माधवानल को अपने गले का हार दे दिया।

महाराजा विक्रमादित्य के प्रताप से जुड़ी है डोंगरगढ़ की गाथा
संगीतकार माधवानल ने कला प्रदर्शन का श्रेय नृत्य को देते हुए भरे दरबार के सामने नर्तकी कामकंदला को वह हार पहना दिया, इस घटना से राजा कामसेन ने अपमानित महसूस करते हुए माधवानल को राज्य से बाहर निकाल दिया। नर्तकी कामकंदला और संगीतकार माधवानल के बीच प्रेम संबंध था, जिसके कारण दोनों राजा से छुपकर मिलते रहे। राजा कामसेन उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य के काल के ही थे। एक बार अपनी प्रेमिका से दूर रहने से विचलित संगीतकार माधवनल अपनी कला का प्रदर्शन करने राजा विक्रमादित्य के दरबार उज्जैन गए, जहां उन्होंने पुरस्कार स्वरूप कामकंदला को राजा कामसेन से मुक्त कराने की पहल करने की इच्छा व्यक्त की।

अद्भुत प्रेम कहानी का गवाह है कामकन्दला ताल
महाराजा विक्रमादित्य ने कामसेन को पत्र भिजवाकर नर्तकी कामकंदला को आजाद करने अपील की, जिसे राजा कामसेन ने अपने पुत्र मदनादित्य के प्रभाव में आकर इंकार कर दिया। फलस्वरूप दोनों राजाओं के बीच युद्ध क्षेत्र में महासंग्राम छिड़ गया। कई दिनो के भयंकर युध्द के बाद विक्रमादित्य विजयी हुए और युवराज मदनादित्य का माधवनल ने वध कर दिया। इस लड़ाई के बाद कामाख्या नगरी नष्ट हो गई और केवल डोंगर ही बचे, जिसे आगे चलकर डोंगरगढ़ के नाम से जाना गया। बताते हैं कि किसी ने कामकन्दला को गलत जानकारी दे दी कि युद्ध में माधवनल मारे जा चुके हैं, जिससे दुखी होकर कामकन्दला ने एक तालाब में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए, यह तालाब आज भी कामकन्दला के नाम से जाना जाता है।
उधर कामकन्दला के चले जाने के शोक में माधवनल ने भी अपने प्राण त्याग दिये। इस घटना से राजा विक्रमादित्य ने बगुलामुखी माता की आराधना की और खुद के प्राण उन्हें समर्पित करने की इच्छा प्रकट की, अपने भक्त को पीड़ा में देखकर माता ने उन्हें दर्शन देते हुए आत्मघात से रोका। इसपर राजा विक्रमादित्य ने माधवनल कामकन्दला को फिर से जीवन देने की विनती की और साथ ही यह वरदान मांगा कि वह कामाख्या नगरी में ही स्थापित हो जाएं। इस प्रकार माता ने अपने भक्त की इच्छा पूरी की और बम्लेश्वरी देवी के रूप में डोंगरगढ मे प्रतिष्ठित हो गई।माना जाता है कि माता बम्लेश्वरी महाराजा विक्रमादित्य की कुलदेवी थी।
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नोट - माता बम्लेश्वरी मंदिर से जुडी जानकारियां लोककथाओं पर आधारित हैं।












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