जानिए छत्तीसगढ़ की खल्लारी माता मंदिर के बारे में, जहां हुआ था भीम का राक्षसी हिंडिबा से विवाह

महासमुंद, 02 अप्रैल। भारत में कई ऐसे स्थान हैं, जो आज भी रामायण और महाभारत काल से जुड़ी कथाओं से जुड़े हुए हैं। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में भी ऐसी ही एक जगह है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां महाबली भीम और राक्षसी हिडिंबा का विवाह हुआ था। इस स्थान पर माता खल्लारी का मंदिर है, जिनके दर्शन के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष से लोग पहुंचते हैं।

माता को रक्षक मनाते हैं ग्रामीण

माता को रक्षक मनाते हैं ग्रामीण

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में शहर से करीब 24 किलोमीटर दूर स्थित पहाड़ियों पर माता खल्लारी का मंदिर है। माना जाता है कि प्राचीन काल में इस स्थान को खलवाटिका के नाम से जाना जाता था। खल्लारी माता के मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 850 सीढ़ियां चढ़कर पार करनी पड़ती है। इस देव स्थान में बड़ी खल्लारी माता के अलावा छोटी खल्लारी माता का मंदिर भी है। नवरात्रि के दौरान यहां भव्य मेला लगता है। इस क्षेत्र के लोगों की मान्यता है कि माता मां खल्लारी उनकी रक्षक हैं।

भीम का हुआ था हिडिंबा से विवाह, मौजूद है महाबली भीम के निशान

भीम का हुआ था हिडिंबा से विवाह, मौजूद है महाबली भीम के निशान

ऐसी किवदंती है कि महाभारत काल में इस स्थान पर हिडिंब नाम का राक्षस रहता था। अज्ञातवास में महाबलि भीम इस स्थान से गुजरने के दौरान विश्राम कर रहे थे, तभी हिडिंब की बहन हिंडिबा भीम की बलिष्ठ काया को देखकर उस पर मोहित हो गई। इस बीच हिडिंब राक्षस वहां पहुंच गया और उसने भीम के साथ युद्ध किया। भीम ने हिडिंब का वध कर दिया और माता कुंती के आदेश से राक्षसी हिंडिबा से विवाह किया।

माना जाता है कि पांडवो ने इस स्थान पर काफी दिनों तक निवास किया, जिसके साक्ष्य आज भी मिलते हैं। इस स्थान को भीमखोज के नाम से भी जाना जाता है, खल्लारी की पहाड़ियों में ऐसे कई निशान हैं, जिनको महाबली भीम से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय मान्यताओं में चट्टानों पर बने बड़े-बड़े निशानों को भीम के शक्ति प्रदर्शन का सबूत माना जाता है। वहीं यहां भीम चूल्हा, भीम की नाव स्थान भी मौजूद हैं।

1985 में पहली बार जलाई गई नवरात्रि पर ज्योत

1985 में पहली बार जलाई गई नवरात्रि पर ज्योत

स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले घने जंगलों के बीच खल्लारी पहाड़ी पर केवल एक खोह यानि गुफा थी, जिसमें देवी माता की ऊंगली का निशान अंकित था। ग्रामीण वन्य प्राणियों का खतरा मोल लेते हुए देवी पूजन के लिए पहाड़ियों में चढ़ते थे। 1940 के आस पास पहाड़ चढ़ने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कराया गया, जिससे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी और साल 1985 में पहली बार नवरात्रि में ज्योति कलश प्रज्जलित करके मंदिर निर्माण किया गया।

 माता के पहाड़ी पर विराजमान होने की कथा है रोचक

माता के पहाड़ी पर विराजमान होने की कथा है रोचक

स्थानीय जनश्रुतियों के मुताबिक प्राचीन काल में महासमुंद के डेंचा गांव में खल्लारी माता का निवास था। देवी कन्या का रूप धारण करके खल्लारी में लगने वाले हाट बाजार में आती थी। एक बार माता को कन्या के रूप में देखकर एक बंजारा मोहित हो गया और उनका पीछा करते हुए पहाड़ी तक पहुंच गया। इस बात से क्रोधित होकर खल्लारी माता ने बंजारे को श्राप देकर उसे पत्थर में परिवर्तित कर दिया और खुद भी वहां विराजमान हो गई।

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नोट - उपरोक्त जानकारी स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं पर आधारित है।

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