जिस पार्टी में गए TMC के 20 बागी सांसद, उसके नेता को ही नहीं थी खबर! मर्जी भी नहीं पूछी गई ,अब खुद बताया सच
TMC Crisis 2O MPs NCPI Merger: पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रही उठापटक अब और दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने जब नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा किया, तब यह माना जा रहा था कि पूरी प्रक्रिया पहले से तय रणनीति का हिस्सा होगी। लेकिन अब NCPI के एक शीर्ष नेता के बयान ने इस पूरे घटनाक्रम पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस पार्टी में 20 सांसदों के शामिल होने का दावा किया गया, उसी पार्टी के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन महासचिव शांतनु डे का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी सोशल मीडिया और न्यूज रिपोर्ट्स से मिली। उनका दावा है कि इस फैसले को लेकर उनसे कोई बातचीत तक नहीं हुई थी। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर यह विलय किस स्तर पर तय हुआ और क्या पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं को इसकी जानकारी थी?

🔷TMC Crisis and NCPI Merger: 'मुझे तो सोशल मीडिया से पता चला' - NCPI नेता का बड़ा खुलासा
रविवार (14 जून) को तृणमूल कांग्रेस में उस समय बड़ा राजनीतिक विस्फोट हुआ जब पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर खुद को NCPI में विलय करने की घोषणा कर दी। बागी सांसदों की अगुवाई कर रहीं काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि यह समूह अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करेगा।
बताया गया कि सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखित रूप से सूचित किया है कि उन्होंने NCPI में विलय का फैसला लिया है। अब इस दावे की वैधता और सांसदों के हस्ताक्षरों की पुष्टि के बाद ही लोकसभा अध्यक्ष फाइनल निर्णय लेंगे।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सस्पेंस तब खुला जब समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) ने NCPI के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु डे से बात की। शांतनु डे ने कैमरे पर साफ-साफ कहा कि उन्हें अपनी ही पार्टी में 20 सांसदों के आने की खबर अखबारों, टीवी और सोशल मीडिया के जरिए मिली है।
शांतनु डे का कहना था कि उन्हें पता चला है कि यह फैसला उनकी पार्टी के अध्यक्ष (पवन कुमार दास) ने अकेले ही स्तर पर लिया है, लेकिन अध्यक्ष जी ने अभी तक उनसे इस बारे में फोन पर कोई बात नहीं की है। हालांकि, हैरान होने के बावजूद शांतनु डे ने इस फैसले का स्वागत किया है।
उन्होंने कहा, "अगर मेरी पार्टी बड़ी हो रही है, तो भला मैं खुश क्यों नहीं होऊंगा? हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थन करते हैं और देश के विकास के लिए एनडीए (NDA) के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।" उन्होंने बागी टीएमसी नेता काकोली घोष दस्तidar को न्योता भी दिया कि वे दिल्ली आएं, बैठकर बातचीत करें और जल्द ही एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आगे की रणनीति का एलान करें।
🔷'अब टीएमसी का वजूद ही नहीं बचा'- बागी सांसदों की दलील
दूसरी तरफ टीएमसी को छोड़ चुके बागी सांसद इस कदम को पूरी तरह जायज ठहरा रहे हैं। बागी सांसद असित कुमार माल ने मीडिया से बात करते हुए अपनी ही पुरानी पार्टी पर तीखे सवाल दागे। उन्होंने कहा कि 20 लोकसभा सांसदों ने जनता के हितों और क्षेत्रीय विकास के लिए एक साथ आकर यह हस्ताक्षर किए हैं।
असित कुमार माल ने साफ शब्दों में कहा, "अब ऐसा लगता है कि टीएमसी का कोई वजूद ही नहीं बचा है, इसलिए पार्टी के भीतर रहकर विकास कार्य करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।" उन्होंने पार्टी लीडरशिप को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि चुनावों में मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर हार के कारणों को लेकर कोई चर्चा या समीक्षा बैठक तक नहीं की गई। ऐसे में पार्टी के टूटने के लिए सिर्फ और सिर्फ शीर्ष नेतृत्व ही जिम्मेदार है।

🔷Who Is NCPI: आखिर रणनीतिक रूप से NCPI को ही क्यों चुना गया?
NCPI यानी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया अपेक्षाकृत नई राजनीतिक पार्टी है। इसका गठन 2022 में हुआ था और इसने 2023 में चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। हालांकि पार्टी अभी तक देश की किसी विधानसभा या संसद में प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर सकी है।
यही वजह है कि 20 सांसदों के एक साथ इस पार्टी में शामिल होने के दावे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। दिलचस्प बात यह भी है कि पार्टी भले ही छोटी हो, लेकिन उसने पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों में चुनाव लड़ा है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस पूरे खेल में परदे के पीछे से मदद कर रही बीजेपी के एक सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर इस राज से पर्दा उठाया कि आखिर NCPI नाम की इस छोटी पार्टी को ही क्यों चुना गया।
- बंगाल से कनेक्शन: यह पार्टी भले ही त्रिपुरा की हो, लेकिन इसने पश्चिम बंगाल और मेघालय में भी चुनाव लड़ा है। बागी सांसद नहीं चाहते थे कि वे किसी ऐसी पार्टी में जाएं जिससे उनका बंगाल का नाता टूट जाए।
- पूर्वोत्तर का प्रतिनिधित्व: इस पार्टी के जरिए सांसदों को लोकसभा में पूर्वोत्तर (Northeast) राज्यों का एक मजबूत चेहरा बनने का मौका मिलेगा।
- कानूनी ढाल: यह 2022 से चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड है, इसलिए इसके जरिए दलबदल कानून से बचना आसान लग रहा था।

🔷NDA के लिए क्या हैं इसके सियासी मायने?
अगर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस विलय को कानूनी रूप से मंजूरी दे देते हैं, तो देश की संसद का गणित पूरी तरह बदल जाएगा।
- लोकसभा का गणित: लोकसभा में एनडीए (NDA) की ताकत 294 सीटों से बढ़कर सीधे 314 हो जाएगी। हालांकि, इसके बावजूद बीजेपी-नीत गठबंधन निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से 46 सीटें दूर रहेगा।
- राज्यसभा का गणित: राज्यसभा में भी एनडीए का आंकड़ा 155 तक पहुंच सकता है, जो दो-तिहाई के जादुई आंकड़े के बेहद करीब है।
- टीएमसी को नुकसान: ममता बनर्जी की पार्टी संसद में एक झटके में बेहद कमजोर हो जाएगी और उनके सांसदों की संख्या सिर्फ 8 रह जाएगी।
फिलहाल स्पीकर ओम बिरला ने कहा है कि वे सभी 20 सांसदों के हस्ताक्षरों की गहन जांच करेंगे। जब तक स्पीकर का फैसला नहीं आता, तब तक इन सांसदों की किस्मत अधर में लटकी हुई है, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि भारतीय राजनीति में शह और मात का खेल अब एक नए और हैरान करने वाले स्तर पर पहुंच चुका है।
🔷बागी सांसद अरूप चक्रवर्ती ने 'गद्दार' वाले आरोप पर दिया जवाब
इस बगावत का एक और दिलचस्प पहलू बागी सांसद अरूप चक्रवर्ती के बयान से सामने आया। जहां एक तरफ अभिषेक बनर्जी इन बागियों को 'गद्दार' कह रहे हैं, वहीं अरूप चक्रवर्ती ने पलटवार करते हुए कहा कि गद्दार वो हैं जो चुनाव हारने के बाद मुंह फेर लेते हैं और अपने ही पार्टी कार्यकर्ताओं को जेल भिजवा देते हैं।
अरूप चक्रवर्ती ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी वफादारी जताते हुए एक भावुक कार्ड खेला। उन्होंने कहा, "मैं आज भी दीदी के साथ हूं, मैं तो दीदी की परछाई हूं। हम सब दीदी का चेहरा देखकर ही राजनीति में आए थे। लेकिन अब दीदी की उम्र हो चुकी है और पार्टी चलाने वाले कुछ लोग दीदी को अपनी मर्जी से काम ही नहीं करने दे रहे हैं।"
उन्होंने यह दावा भी कर दिया कि आने वाले दिनों में टीएमसी के बाकी बचे नेता भी उनके साथ आ जाएंगे क्योंकि किसी के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। वे पार्टी को तोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे 'सुधारना' चाहते हैं।
🔷अब उठ रहे हैं बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
- क्या पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं की सहमति से विलय हुआ?
- अगर NCPI के संगठन महासचिव को जानकारी नहीं थी तो निर्णय किस स्तर पर लिया गया?
- क्या यह केवल संसदीय रणनीति है या इसके पीछे बड़ा राजनीतिक पुनर्गठन चल रहा है?
- लोकसभा अध्यक्ष इस दावे पर क्या फैसला देंगे?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। TMC के 20 सांसदों की बगावत पहले ही राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी खबर बन चुकी है। लेकिन अब NCPI के नेता का यह कहना कि उन्हें खुद सोशल मीडिया से विलय की जानकारी मिली, पूरे मामले को और रहस्यमय बना देता है।















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