स्वतंत्रता हेतु संघर्ष और भारत की स्त्री नायिकाएं जिन्हें भुला दिया गया
पश्चिमी फेमिनिज्म के पैरोकारों का एक संवाद अत्यधिक प्रचलित है कि यदि उनका फेमिनिज्म नहीं होता तो भारतीय स्त्रियाँ अभी तक चूल्हे चौके में ही सिमटी होतीं। वो स्वयं के फेमिनिज्म को वह एक प्रकार से भारतीय स्त्रियों का उद्धारक बताते हैं। ऐसे में कई बार यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या वास्तव में यह पश्चिमी वामपंथी फेमिनिज्म ही है जो भारतीय स्त्रियों के मध्य चेतना का प्रस्फुटन लाया या फिर यह एक ऐसा झूठ है जिसमें बार बार फंसाकर भारतीय स्त्रियों को नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है?

क्या वास्तव में स्त्री चेतना का प्रस्फुटन अट्ठारहवीं या उन्नीसवीं शताब्दी से हुआ? जैसा इन फेमिनिस्ट द्वारा दावा किया जाता है? या फिर भारत में यह चेतना युगों युगों से है। आज जब यह लेख लिखा जा रहा है, उस दिन भी भारत की ऐसी महिला शासक अहल्याबाई होलकर को यह कृतज्ञ राष्ट्र स्मरण कर रहा है, जिन्होनें मुगलों द्वारा इस राष्ट्र की आत्मा पर किए गए तमाम आक्रमणों का उत्तर दिया था। उन्होंने उन मंदिरों को दोबारा से बनवाया था जिन्हें विधर्मी आतताइयों ने मजहबी कारणों से तोड़ा था।
13 अगस्त 1795 को मालवा की रानी अहल्याबाई होलकर ने अंतिम सांस ली थी, तब तक वह इतिहास में अपना नाम एक स्वतंत्र शासिका के रूप में दर्ज करवा चुकी थीं। उन्होंने अपने शासनकाल में कई दुर्गों एवं सड़कों का निर्माण कराया। जनता से प्रत्यक्ष संवाद किया। उनके लिए उनका कर्म ही उनका ईश्वर था। मालवा ही नहीं बल्कि उनके लिए हर तीर्थ स्थान पूज्य था, उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या आदि के मंदिरों को भी दान दिए। साहित्य के प्रति उनके ह्रदय में अनुराग था। उन्होंने अपने द्वार सरस्वती के उपासकों के लिए खोल रखे थे, जैसे मोरोपंत, खुशाली राम।

इससे पूर्व जीजाबाई मुगलों को मुंहतोड़ उत्तर दे चुकी थीं। हालांकि वह स्वयं कभी युद्ध के मैदान में नहीं गईं, परन्तु युद्ध के मैदान में न जाकर भी उन्होंने जो किया, उसकी तुलना आज तक विश्व इतिहास में नहीं मिलता है। उन्होंने अपने पुत्र शिवा को छत्रपति शिवाजी बनाकर एक ऐसा प्रतिमान स्थापित किया, जिसकी कल्पना ही सहज संभव नहीं है। ऐसे समय में जब मुगल बादशाह औरंगजेब का नाम आतंक का पर्याय था, उस समय हिन्द स्वराज का स्वप्न देखना और उसे अपने पुत्र के माध्यम से पूरा करना, कभी भी उस फेमिनिज्म की समझ में नहीं आ पाएगा जो मात्र ऊपरी और कृत्रिम समानता के आधार पर नारी सशक्तिकरण का विमर्श उत्पन्न करता है।
भारत में समानता का विमर्श सृष्टि के आरम्भ से ही है क्योंकि एकमात्र भारत ही है जहाँ पर अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा है। एकमात्र भारत ही है जहाँ पर स्त्री एवं पुरुष को समान समझा जाता है। हाँ, यह समानता उस समाजवादी समानता से एकदम अलग है जो बाजार के आधार पर समानता का सिद्धांत गढ़ता है।
यही कारण है कि स्त्रीवाद की प्रथम लहर, द्वितीय लहर और तृतीय लहर के बीच उपजे पश्चिमी विमर्श के मध्य भारत में स्त्रियों की उपलब्धियां क्या थीं, वह सब दबकर रह जाता है। उनके चेहरे दिखाई ही नहीं देते, जिन्होनें अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया। क्योंकि वामपंथी पहले, दूसरे और तीसरे स्त्री विमर्श की लहर में भारत की उन स्त्रियों को आने ही नहीं देते हैं जिन्होनें उस समय अपने साहस का परचम उन शक्तियों के विरुद्ध लहराया, जो शक्तियाँ अपने देशों में स्त्रियों को दबा रही थीं।
अब हम बात करेंगे कुछ उन स्त्रियों की जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में तो बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया, लेकिन आज हम उनके बारे में नहीं जानते। सन्यासी विद्रोह की देवी चौधरानी, चुआड़ विद्रोह की रानी शिरोमणि तो हैं हीं, परन्तु उल्लाल की वीर रानी अबक्का और कितूर की वीर रानी चेनम्मा को कौन भूल सकता है जिन्होने स्वतंत्रता हेतु सशस्त्र विद्रोह किया और पुर्तगालियों एवं अंग्रेजों के दांत खट्टे किये थे।

जहां पश्चिम में यह लड़ाई लड़ी जा रही थी कि महिलाओं का संपत्ति पर अधिकार होना चाहिए, तो वहीं भारत की स्त्रियाँ अपनी संपत्ति के अधिकार को अंग्रेजों के हाथों नष्ट होने से बचाने की लड़ाई लड़ रही थीं। भारत में स्त्रियों के अधिकारों पर डाका डालने वाले अंग्रेज, जिन्हें वामपंथी इतिहास 'सुधारक' के रूप में प्रस्तुत करता है, हिन्दू रानियों के अधिकारों पर डाका डाल रहे थे। इसमें यह अधिकार सम्मिलित था कि वह अपने पति के राज्य को अपने दत्तक पुत्र को दे सके या स्वयं शासन कर सके।
वर्ष 1857 की क्रांति में मात्र मुजफ्फरनगर में ही 255 स्त्रियों के बलिदान का रिकॉर्ड मिलता है। इसके साथ ही उसके बाद जब आन्दोलन में गांधी जी और कांग्रेस का प्रवेश नहीं हुआ था, तब भी स्त्रियों ने बढ़चढ़कर अपने देश को स्वतंत्र कराने के लिए भाग लिया था, और उन यातनाओं को सहा था, जिसे सहते सहते वह अपना मानसिक संतुलन और घर परिवार सबकुछ खो बैठी थीं।
ऐसी स्त्रियों में शामिल हैं ननी बाला देवी जिनका जन्म हावड़ा में वर्ष 1888 में हुआ था और वह वर्ष 1916 में विधवा हो गयी थीं। क्रान्ति के प्रथम दौर में वह क्रांतिकारियों के लिए आश्रयस्थल जुटाने, फंड एकत्र करने और गुप्त दस्तावेजों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का कार्य करती थीं। परन्तु इन कार्यों के चलते वह पुलिस की नजर में आ गयीं और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें तमाम यातनाएं दी गईं, ताकि किसी प्रकार वह अपना मुंह खोलें, परन्तु उन्होंने मुंह नहीं खोला। जब उन्हें वर्ष 1919 में रिहा किया गया तो उनका जीना मरना एक समान था। क्योंकि अंग्रेजों के डर से उन्हें दूसरों ने तो क्या अपनों ने ही सहारा नहीं दिया था।
टुकड़ी बाला देवी की कहानी भी ननी बाला देवी के जैसी ही थी। वह भी विधवा होने के बाद क्रांतिकारियों के लिए कार्य करने लगी थीं। उन्हें भी पुलिस ने गिरफ्तार किया और जब वह जेल में थी, तब उन पर हो रही यातनाओं के विरोध में ननी बाला देवी ने भूख हड़ताल की थी। यह दोनों एक ही समय में जेल में थीं। टुकड़ी बाला देवी को वर्ष 1918 में रिहाई मिली थी।
ऐसी ही एक कहानी है क्षीरोदा देवी सुन्दरी की, जिन्होनें 1959 में वर्ष 76 वर्ष की उम्र में अपनी कहानी खुद लिखी थी, उन्होंने भी जीवन भर क्रांतिकारियों के लिए शरण स्थल, भोजन आदि जुटाने का कार्य किया। बार बार पुलिस इन्हें पकड़ने आती थी, परन्तु वह उन्हें चकमा देती रहती थीं। और पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पाती थी। एक दो बार पुलिस ने इन्हें पकड़ा भी तो भी सबूतों के अभाव में उन्हें रिहा करना पड़ा था।
ऐसी एक नहीं कई स्त्रियाँ हैं, बल्कि कहा जाए तो स्त्रियों का समृद्ध इतिहास है, फिर भी यह कहा जाना कि यदि पश्चिमी या वामपंथी फेमिनिज्म नहीं आता तो भारत की स्त्रियों में चेतना नहीं आती, या फिर उन्हें चूल्हे चौके में ही सीमित रहना पड़ता, कितना बड़ा झूठ है, धोखा है।
परन्तु आज जब हम स्त्रीविमर्श की बात करते हैं तो हमें न ही रानी अबक्का रानी दिखती हैं, न ही अहिल्याबाई होलकर, न ही रानी लक्ष्मी बाई, न ही ननी बाला देवी, न ही क्षीरोदा सुन्दरी देवी और न ही वह यशोदा देवी, जो उस समय आयुर्वेद का परचम लहरा रही थीं।
आजादी का अमृत महोत्सव जब आज पूरा देश मना रहा है तो आवश्यकता है उन महान वीर स्त्रियों को विमर्श के मुख्य केंद्र में लाने की जिन्होनें भारतीयता को बनाए रखने के लिए संघर्ष किया। कुछ ने सर्वस्व बलिदान किया तो कुछ जीवन भर संघर्षरत रहीं। हर युग में भारत की संस्कृति और स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व त्याग करने के लिए हमेशा तत्पर रहीं वीर नारियों के बारे में अपनी अगली पीढ़ियों को बताना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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