इंटरनेट पर हिन्दी की शुरुआत और इसके विकास की बाधाएं
आज 2022 में इंटरनेट पर हिन्दी में लिखना पढना कोई महान उपलब्धि नहीं लगती। लेकिन आज से 15-20 साल पहले इंटरनेट पर हिन्दी सहित किसी भारतीय भाषा में लिख लेना और लिखे हुए को पढ पाना लगभग असंभव था। उस समय जिन लोगों ने तकनीकि मदद से ऐसा करने का प्रयास किया, वो सब डूब गये। इन बीस सालों में इंटरनेट हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन पाया तो उसका एक बड़ा कारण भारतीय भाषाओं की इंटरनेट पर उपलबधता है।

इंटरनेट नब्बे के दशक में जन सामान्य के जीवन में आना शुरु हुआ। उस दौर में भारत में इंटरनेट तो नहीं आया था लेकिन 2000 को पार करते ही इंटरनेट भारत के शहरों में भी फैलने लगा था। शहरों में इंटरनेट कैफे एक ऐसी प्रतिष्ठित जगह बन रहे थे जहां जाकर कुछ रूपये घण्टे के हिसाब से भुगतान करके व्यक्ति अपना काम कर सकता था। यह वह समय था जब मोबाइल इंटरनेट जैसी कोई चीज अस्तित्व में नहीं थी और ब्रॉडबैण्ड के सहारे कम्प्यूटर पर इंटरनेट सर्फिंग होती थी। उस समय सबके लिए कम्प्यूटर खरीदना और उसमें इंटरनेट कनेक्शन रखना एक मंहगा सौदा होता था।
लेकिन एक मुश्किल और थी। मुश्किल यह कि इंटरनेट पर बैठकर करने के लिए किसी के पास कुछ था भी नहीं। कुछ चुनिंदा वेबसाइटें होती थीं जिसमें सबसे बड़ी वेबसाइट याहू और इंडियाटाइम्स थी। ये सब अंग्रेजी भाषा में थी और इन्हीं पर एकाउण्ट बनाने पर ईमेल की सुविधा भी मिल जाती थी। भारत में यह वह समय था जब रिलायंस ने मोबाइल क्रांति कर दिया था और बहुत सस्ती कीमतों पर दुनिया मुट्टी में करने के अभियान पर था। वैश्विक स्तर पर इंटरनेट का बबल फूट चुका था जिसे 'डॉटकॉम बबल ब्रस्ट 1999' का नाम दिया गया था। दुनियाभर की न जाने कितनी डॉटकॉम कंपनियां तबाह हो गयी थीं और लोगों ने मान लिया था इंटरनेट में व्यापार की कोई संभावना नहीं है। भारत में भी मोबाइल पर बात करना, उस दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, और हम उसी पर बात करने में व्यस्त थे।
लेकिन इसी डॉटकॉम बबल ब्रस्ट के दौर में अमेरिका में एक छोटी सी कंपनी का उदय हुआ जिसका नाम था गूगल। 1998 में गूगल की स्थापना दो नौजवान छात्रों ने किया था जिनका नाम था सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज। दोनों कैलिफोर्निया के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढते थे और उन्होंने यूनिवर्सिटी के ही सर्वर पर एक प्रोजेक्ट के तहत गूगल सर्च इंजन तैयार किया। यह सर्च इंजन इतना सफल रहा कि युनिवर्सिटी ने दोनों को अपना अलग सर्वर लेने की सलाह देकर गूगल को अपने सर्वर से हटा दिया। उस समय तक याहू सर्च की बजाय डॉयरेक्टरी सर्विस देता था जिसके कारण वह अमेरिका में मशहूर हुआ था। एक्साइट सर्च कंपनी भी थी जिसे ये दोनों अपना वह एल्गोरिदम बेचना चाहते थे जो गूगल सर्च का फार्मूला था लेकिन एक्साइट ने यह कहते हुए खरीदने से मना कर दिया कि उनका अपना सर्च इंजन बहुत अच्छा है। खैर एक्साइट के इस इंकार ने संसार को गूगल दिया और उस इंटरनेट को भी स्थापित कर दिया जो अब शायद ही मानव सभ्यता से कभी अलग हो।
गूगल ही वह पहली कंपनी थी जिसने अंग्रेजी से बाहर निकलकर दूसरी भाषाओं में इंटरनेट सेवा देने को प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्हें भाषाओं का एक मानक कोड चाहिए था जो विश्वभर के कम्प्यूटर पर समान रूप से काम कर सके। गूगल ने यूनिकोड कन्सोर्टियम से संपर्क किया जो कोई कंपनी नहीं बल्कि एक स्वयंसेवी संस्था थी। अमेरिका की इस यूनिकोड कन्सोर्टियम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाषाओं के लिए एक निश्चित कम्प्यूटर कोड तैयार किया था जिसे अगर कम्प्यूटर कंपनियां या इंटरनेट कंपनियां अपने यहां लागू कर देती तो भाषा की इस समस्या से पार पाया जा सकता था।
सबसे पहले गूगल ने पहल किया और यूनिकोड के मानकों को अपने यहां लागू किया। इससे शुरुआत में ही दुनिया की 32 भाषाएं शामिल हो गयीं जिसमें हिन्दी भी शामिल थी। मतलब अब इंटरनेट पर हिन्दी को उसी तरह लिखा जा सकता था जैसे अंग्रेजी को। गूगल की इस पहल के बाद अमेरिका की बड़ी तकनीकि कंपनियों ने भी अपने यहां यूनिकोड लागू करना शुरु कर दिया जिसमें आईबीएम और माइक्रोसॉफ्ट प्रमुख थे। उस समय यही दो कंपनिया हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की दिग्गज कंपनियां थी। इनके इस प्रयास से दुनियाभर की भाषाओं में इंटरनेट पर काम करना आसान हो गया। आज यूटीएफ 32 एनकोडिंग लागू है और संसार की 7 हजार भाषाओं में से इंटरनेट पर लगभग 700 भाषाएं उपलब्ध हैं। सोशल मिडिया साइट फेसबुक ही 100 से अधिक भाषाओं को सपोर्ट करता है।
इंटरनेट के उभार के बीच 2005-06 के आसपास भारत में पहली बार इंटरनेट पर हिन्दी में लिखने का चलन बढा। इसी समय पहली बार गूगल ने भारत में ईमेल सेवाएं देनी शुरु की थी और उसने ब्लागस्पॉट को खरीद लिया था। ब्लॉगस्पॉट उस दौर में लिखने पढने का स्वतंत्र मंच होता था जहां कोई भी अपना ब्लॉग बनाकर अपनी बात कह सकता था। यह आज भी है लेकिन फेसबुक के उभार ने ब्लॉग लिखने के चलन को खत्म कर दिया। इसके साथ ही गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के हिन्दी प्रयास ने लोगों को प्रेरित किया कि वो इस ओर आयें इंटरनेट के माध्यम से नये पाठकों तक अपनी पहुंच बनायें।
उस दौर में ब्लॉग एक अभियान ही बन गये थे। दिल्ली जो कि हिन्दी पत्रकारों और लेखकों का गढ है वहां सबसे अधिक इसका प्रचार प्रसार हुआ। यूनिकोड के कारण ब्लॉग पर हिन्दी लिखना संभव हुआ तो 2008 के बाद से हिन्दी में वेबसाइटों की बाढ आनी शुरु हो गयी। भारत के बड़े बड़े मीडिया हाउस इंटरनेट पर हिन्दी के लिए जो रास्ता नहीं खोल पाये थे वह यूनिकोड के कारण कुछ सौ हिन्दी ब्लॉगरों ने खोल दिया था। फिर तो देखते ही देखते हिन्दी के सभी बड़े मीडिया हाउस ने यूनिकोड का लाभ लिया और सबने अपने यहां एक डिजिटल डिवीजन स्थापित कर दिया। इसका परिणाम ये हुआ है कि आज 15 साल बाद भारत में हिन्दी इंटरनेट की प्रमुख भाषा है। हालांकि 53 करोड़ लोगों की मुख्य भाषा होने के बाद भी हिन्दी इंटरनेट की दस सबसे बड़ी भाषाओं में शामिल नहीं है। आज भी इंटरनेट पर जितनी सामग्री उपलब्ध है उसमें सिर्फ 0.1 प्रतिशत ही हिन्दी में है। इंटरनेट में भाषाओं के पदानुक्रम में यह 35 वें स्थान पर है।
इसका कारण संभवत: हिन्दी में सर्च का अभाव है। सबसे ज्यादा सर्च अंग्रेजी में होते हैं। उसके बाद चाइनीज और फिर दुनिया की दूसरी भाषाएं हैं। असल में इंटरनेट भले ही 700 भाषाओं में सुलभ हो लेकिन यहां मुख्य रूप से दो भाषाओं का राज है। पहले नंबर पर अंग्रेजी है और दूसरे नंबर पर चाइनीज मैंडरिन है। स्टैटिका.कॉम के 2022 के आंकड़ों के मुताबिक इंटरनेट पर अंग्रेजी में सामग्री खोजने और पढनेवालों की संख्या कुल इंटरनेट यूजर का 25.9 प्रतिशत है। इसके बाद चाइनीज मैंडरिन का हिस्सा 19.4 प्रतिशत है। अंग्रेजी और मैंडरिन के बाद तीसरी बड़ी भाषा स्पैनिश है (7.9 प्रतिशत), चौथी अरबी भाषा है (5.2 प्रतिशत) और पांचवी बड़ी भाषा मलय भाषा है जिसके इंटरनेट पर यूजर 4.3 प्रतिशत है।
निश्चय ही हिन्दी बोलनेवालों की संख्या स्पेनिश बोलनेवालों से अधिक और अरबी बोलनेवालों से दोगुना है लेकिन इंटरनेट पर आज भी हिन्दी की उपस्थिति नगण्य है। इसका सबसे बड़ा कारण हिन्दी में सर्च करने का अभाव है। हिन्दी में सामग्री पढनेवाले लोग भी अंग्रेजी में ही सर्च करते हैं जिसके परिणाम स्वाभाविक है अंग्रेजी में ही आते हैं। वेबसाइट की बजाय सोशल मीडिया पर हिन्दीभाषी लोगों की सक्रियता अधिक है इसके कारण सर्च सामग्री की इंटरनेट पर वैसी उपलब्धता नहीं है जैसी अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं की है। हिन्दी में कन्टेन्ट क्रियेशन भी बहुत दयनीय दशा में है। किसी भी विषय पर जितनी समग्रता में इंटरनेट पर आपको अंग्रेजी में जानकारी मिलेगी, हिन्दी में नहीं मिल पायेगी। एक और बड़ा कारण है हिन्दी टाइपिंग टूल के बारे में लोगों में जानकारी का अभाव। आज तक हिन्दी का कोई मानक कीबोर्ड विकसित नहीं हो पाया जिस पर लोग हिन्दी टाइपिंग सीख सकें। हम अंग्रेजी के क्वेर्टी कीबोर्ड पर अंदाज से हिन्दी टाइप करते हैं। मोबाइल पर जरूर हिन्दी टाइपिंग के अनेक टूल मौजूद हैं लेकिन अधिकांश हिन्दीभाषी लोग ही इनके बारे में न तो जानते हैं और न प्रयोग करते हैं।
हालांकि गूगल एक बार फिर इन चुनौतियों से निपटने के उपाय कर रहा है। जैसे अंग्रेजी में सर्च की गयी सामग्री का हिन्दी में अनुवाद, बोलकर सर्च करने की सुविधा और ट्रांसलेशन शामिल हैं। लेकिन इनका भी इस्तेमाल अधिकांश प्रोफेशनल लोग ही करते हैं। इंटरनेट पर हिन्दी के विकास में एक बाधा वीडियो सामग्री भी है जिसे पढने की नहीं बल्कि देखने और सुनने की जरूरत होती है। यही कारण है कि हिन्दी में पठनीय सामग्री से ज्यादा दर्शनीय सामग्री ज्यादा प्रचलित हुई है। इंटरनेट पर अगर पठनीय सामग्री में हिन्दी का योगदान 0.1 प्रतिशत है तो यू ट्यूब पर हिन्दी कन्टेन्ट 5 प्रतिशत है। मतलब वीडियो माध्यम से हिन्दी ज्यादा देखी सुनी जा रही है।
फिर भी उम्मीद करनी चाहिए कि हिन्दी में वीडियो देखनेवाला और सोशल साइट्स पर सक्रिय यही इंटरनेट उपभोक्ता भविष्य में हिन्दी वेबसाइट का पाठक बनेगा तब शायद हिन्दी इंटरनेट के सर्च की बड़ी भाषाओं में शामिल हो जाएगी। फिर भी डेढ दशक में इंटरनेट पर हिन्दी की शुरुआत और विकास इतनी भी निराशाजनक नहीं है कि हम इसकी ओर देखें भी नहीं। हिन्दी भाषी लोग जैसे जैसे अपने भाषाई बोध को बढायेंगे इंटरनेट पर हिन्दी की मौजूदगी भी बढेगी। जिस तरह से राजनीतिक और सामाजिक माहौल बदल रहा है उसे देखते हुए कह सकते हैं कि भारतीय राज समाज में ही नहीं इंटरनेट पर भी हिन्दी का भविष्य अच्छा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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