अंग्रेजियत के ‘अंकल, गाइज, ब्रो’ में सिमटते भारतीय समाज के रिश्ते
आमतौर पर ऐसा होता है कि जो हमें गुलाम बनाकर रखता है, हम पर शासन करता है उसके प्रतीकों के प्रति हमारे मन में स्वाभाविक घृणा पैदा हो जाती है। लेकिन अंग्रेजी के मामले में ऐसा नहीं है। भले ही हमने अंग्रेजी हुकूमत से आजादी पायी हो लेकिन अंग्रेजी और अंग्रेजियत के प्रति हमारी दीवानगी कभी कम नहीं हुई। हम अंग्रेजों से तो लड़ रहे थे, लेकिन अंग्रेजी और अंग्रेजियत के खिलाफ पूरी तरह हम उस दौर में भी नहीं लड़े, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन कहते हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन में ज्यादातर बड़े चेहरे जो नेता बने, वे अंग्रेजी की पढाई करके ही आये थे। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मोहम्मद अली जिन्ना, बी.आर. अंबेडकर, सरोजिनी नायडू जैसे नेताओं ने या तो लंदन में पढाई की थी या फिर अंग्रेजी माध्यम से। इनके अलावा दर्जनों वे नेता जो किसी डिग्री के लिए लंदन नहीं गये, वो भी अंग्रेजी के महत्व को कम नहीं समझते थे।
कांग्रेस में अंग्रेजी और अंग्रेजियत का बोलबाला
असल में वह मोहनदास करमचंद गांधी थे जिन्होंने पहली बार भारतीयता को स्वतंत्रता आंदोलन का मूल बताया। यह गांधी ही थे जिन्होंने भारतीय तौर तरीकों, खान पान, परिधान, संस्कृति, स्वभाव और संस्कार को अपनाकर लोगों तक अपनी पहुंच बनाई। वरना उनके पहले तक कांग्रेस में भी अंग्रेजी और अंग्रेजियत का ही बोलबाला था। गांधी से पहले अधिकांश कांग्रेसी नेता अंग्रेजी हुकूमत के बाद दूसरा प्रभु वर्ग थे। उनका भारत से कम और इंग्लैण्ड से ज्यादा अपनेपन वाला संबंध था। नेहरू तो स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए भी जीवन पर्यन्त उससे मुक्त नहीं हो पाए।
लेकिन गांधी भी इंग्लैण्ड रिटर्न ही थे। गांधी भी इंग्लैण्ड कोई क्रांति करने नहीं गये थे। वो वहां वकालत की पढाई करने गये थे, जो उस दौर में बहुत विशिष्ट पढाई समझी जाती थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1726 में भारत के तीन शहरों, मुंबई, कलकत्ता और मद्रास में मेयर कोर्ट की शुरुआत कर दी थी। लेकिन 1774 से 1785 के दौरान भारत के गवर्नर जनरल रहे वारेन हेस्टिंग्स ने भूमि विवाद के लिए दीवानी अदालत और आपराधिक मामलों के लिए फौजदारी अदालत की शुरुआत की।
कोर्ट का यही सिस्टम आज भी भारत में लागू है। मतलब उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में हमें ऐसे वकीलों की जरूरत थी जो ब्रिटिश कानूनों को समझते हों इसलिए एक दौर में लंदन जाकर वकालत पढना बहुत सम्मान का काम समझा जाता था। गांधी भी उसी सम्मान और आकर्षण में इंग्लैण्ड गये थे। इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजी शासन का विरोध तो किया गया लेकिन अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व बना ही रहा।
अंग्रेज हट गये लेकिन अंग्रेजी हटाना संभव नहीं
जब भारत स्वतंत्र हुआ तब सबसे बड़ी समस्या राजभाषा निर्धारण की ही खड़ी हुई। हमारी पूरी नौकरशाही जिसे उस समय आईसीएस कहा जाता था, वह अंग्रेजी में काम करने की अभ्यस्त थी। फिर भारत में इतनी भाषाई विविधता थी कि किसी एक भाषा को चुनना दूसरी भाषा के दमन वाले आरोपों का शिकार हो जाता। इसलिए स्वतंत्रता के बाद हिन्दी को राजभाषा जरूर बनाया गया लेकिन सरकारी काम काज की भाषा अंग्रेजी ही बनी रही।
आज कोई चाहे भी तो अंग्रेजी को भारत से बाहर नहीं निकाल सकता। अंग्रेजी के कारण भारत ने कुछ खोया है तो कुछ पाया भी है। अंग्रेजी के ही कारण भारत विश्व मंच पर आर्थिक, कूटनीतिक और तकनीकी स्तर पर एक शक्ति बनकर उभरने में सफल हो रहा है। इसलिए अब अंग्रेजी को जैसे ब्रिटेन या अमेरिका से बाहर नहीं किया जा सकता वैसे ही इसे भारत से बाहर नहीं किया जा सकता। आज यह सरकार के साथ साथ बाजार की भी भाषा है। अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के दौर में वैसे भी संसार भर के देश अंग्रेजी सीखना चाह रहे हैं तो भला भारत सीखी हुई भाषा को क्यों भूलना चाहेगा?
शून्य से प्रकट नहीं होती भाषा
लेकिन भाषा के इस संक्रमण के कारण भारतीय समाज को कई प्रकार के नुकसान उठाने पड़ रहे हैं। भारतीय शास्त्रों के अनुसार नाद या शब्द शून्य से पैदा हुए हैं लेकिन भाषाएं किसी शून्य से पैदा नहीं होती। वे एक सामाजिक परिवेश से निकलती हैं। प्रकृति ने कोई नाम तय नहीं किये। कोई भाषा तय नहीं की।
पहाड़ को पहाड़ का नाम मनुष्य ने दिया, स्वयं पहाड़ ने अपने लिए कोई नाम तय नहीं किया। इसी तरह पशु, पक्षी, वृक्ष, जल, पृथ्वी ये सारे नामकरण हमारे तय किये हुए हैं। इनमें से किसी ने अपना नामकरण नहीं किया है। इसी नामकरण की प्रक्रिया से भाषा का विकास होता है। इसी से संस्कृतियों का विकास होता है कि हम अपने आसपास की प्रकृति को किस नाम से पुकार रहे हैं, किस भाव से देख रहे हैं।
अंग्रेजी इस मामले में बहुत कमजोर साबित होती है। अंग्रेजी अपने आप में किसी समुदाय की भाषा नहीं थी। वह ठीक वैसे ही विकसित हुई है जैसे भारत में खड़ी बोली का विकास हुआ है जिसे हिन्दी कहते हैं। इसलिए अंग्रेजी ने ठीक उसी तरह अपने आसपास की बोलियों से शब्द उधार लिये जैसे खड़ी बोली वाली हिन्दी ने किया है।
तमिलनाडु के भीषण विरोध के बावजूद अगर हिन्दी भारत की संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो सकी तो उसका कारण वही गुण है जो अंग्रेजी में है। ये दोनों भाषाएं सर्व समावेशी हैं। किसी भी भाषा बोली का शब्द ये आसानी से ग्रहण करके अपने में समाहित कर लेती हैं।
जैसे अंग्रेजी ग्रीक, लैटिन, फ्रेन्च, स्पेनिश सहित संस्कृत तक के शब्दों को अपने भीतर समेट लेती है वैसे ही हिन्दी भी भारत की अवधी, भोजपुरी, ब्रज, हरियाणवी, बुन्देली, मारवाड़ी, मैथिली ही नहीं गुजराती, बंगाली, मराठी के शब्दों को भी अपना हिस्सा बना लेती है।
हिन्दी के इस समावेशी स्वभाव का सबसे बड़ा कारण है संस्कृत। तमिल के इतर भारत की जितनी भाषाएं हैं उनकी जड़ें संस्कृत में निहित हैं। यहां तक कि भारत में फारसी के मेलजोल से जिस नयी भाषा उर्दू ने जन्म लिया, उसमें भी अधिकांश संस्कृत के शब्द ही पाये जाते थे। ये बात अलग है कि पाकिस्तान बनने के बाद उर्दू ने संस्कृत शब्दों को हटाकर वहां अरबी शब्दों को जोड़ना शुरु कर दिया। इससे उर्दू भारत में एक समुदाय की भाषा बन गयी जिनकी आस्था अरब से जुड़ी हुई है। यहां तक कि हिन्दी में भी उर्दू के नाम पर बहुतायत फारसी और अरबी के शब्द भर दिये गये जिसका नुकसान यह हुआ कि हिन्दी बाकी भारतीय भाषाओं से दूर हो रही है। भारत की दूसरी भाषाओं में अरबी फारसी का वैसा प्रकोप आज भी नहीं है जैसा हिन्दी में हो गया है।
अंकल, गाइज, ब्रो वाले संबंध
जो लोग हिन्दी में से अरबी फारसी को बाहर निकाल रहे हैं वो किसी भारतीय भाषा को वहां जोड़ने की बजाय अंग्रेजी के शब्द जोड़ रहे हैं। सत्तर अस्सी के दशक में हो सकता है नौजवान पीढी में उर्दू की 'दीवानगी' रही हो, लेकिन इक्कीसवीं सदी में यह 'क्रेज' अंग्रेजी का है। जिन्हें अंग्रेजी नहीं भी आती, वो भी भरसक अपनी भाषा में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करके अपने आप को समय के साथ जोड़कर 'मॉडर्न' बनाना चाहते हैं। जैसे, अंकल अब हमारे लिए इतना सामान्य शब्द हो गया है कि हमने अपने सारे रिश्तों को अंकल के तंग गलियारे में धकेल दिया है। अब चाचा, ताऊ, मामा, मौसा, फूफा सबको अंकल वाली श्रेणी में धकेल दिया है।
अगर आधुनिकता को खंगालकर इस दौर में हम सभी रिश्तों को देखना चाहें तो 'यूथ' और 'इलिट' की अंग्रेजी शब्दावली में हर परिचित अपरिचित संबंधों के लिए तीन शब्द बचे हैं। अंकल, गाइज और ब्रो। सोशल मीडिया के प्रकोप के कारण जन सामान्य या ग्रामीण परिवेश का नौजवान भी अब अपने आसपास के संबंधों को इन्हीं तीन शब्दों में परिभाषित करना सीख रहा है। उसके लिए संबंधों की यही तंगहाली आधुनिकता है। हां, हमने अंकल का इतना भारतीयकरण जरूर कर लिया है कि उसके साथ 'जी' जोड़ दिया है। सम्मान भाव में हम अंकल की बजाय 'अंकलजी' कहते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के नौजवान जो सोशल मीडिया पर वीडियो बना रहे हैं वो भी 'हेल्लो गाइज' से अपनी बात शुरु करते हैं। अंकल का संबोधन अब शहरों से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी घुसपैठ कर रहा है। दोस्तों, मित्रों, साथियों के लिए 'ब्रो' एक सामान्य शब्द बनता जा रहा है। और यह किसी अंग्रेजी पढे लिखे या अंग्रेजियत में पले बढे नौजवान की बात नहीं है। यह वो कर रहे हैं जो शुद्ध रूप से भारतीय परिवेश में ही पले बढे हैं और सामान्य शिक्षा पाई है। उनको चाचा, मित्र या दोस्त कहने में शर्म आती है, इसलिए वो अंकल, गाइज और ब्रो बोलकर अपनी शर्म छुपाना चाहते हैं।
यह शर्मबोध ही अंग्रेजी का दुष्प्रभाव है जिस पर आज नहीं तो कल हम जरूर विचार करेंगे। हम अपने समृद्ध संबंधों और जीवनदृष्टि को सिर्फ इसलिए तो नहीं त्याग सकते क्योंकि हमें अंग्रेजी में ही बोलकर माडर्न होना है? वैसे भी अंकल, गाइज और ब्रो ये अपने आप में इतने संकीर्ण शब्द है कि भारत का व्यक्ति अपने समृद्ध रिश्तों और संबंधों को इतने सीमित शब्दों में परिभाषित ही नहीं कर सकता।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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