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Quantum Physics and Spirituality: क्या क्वांटम फिजिक्स के जरिये साबित हो जाता है आध्यात्मिक चमत्कार?

आधुनिक विज्ञान जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है, वह भारतीय अध्यात्म के पास आ रहा है। क्वांटम फिजिक्स ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय मनीषा जिन आध्यात्मिक शक्तियों की बात करती है वो परा विज्ञान के रूप में शास्वत सत्य हैं।

Quantum Physics and Spirituality

Quantum Physics and Spirituality: बागेश्वर धाम के संत धीरेन्द्र शास्त्री के चमत्कार इस समय चर्चा में है। इनके चमत्कारों पर पक्ष विपक्ष दोनों में तर्क दिये जा रहे हैं। कुछ इसे अंधविश्वास बता रहे हैं तो कुछ भारतीय विज्ञान। इसलिए धीरेन्द्र शास्त्री के चमत्कारों को परखने के लिए आधुनिक साइंस और प्राच्य भारतीय विज्ञान दोनों के दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। हमारे प्राच्य विज्ञान और मॉडर्न साइंस दोनों के इस बारे में क्या तर्क और सिद्धांत हैं, इस पर चर्चा करते हैं।

वस्तुतः होता यह है कि जिस कार्य या फल का तर्क समझ में नहीं आता, उसे चमत्कार कह दिया जाता है। परंतु वास्तव में कोई भी कार्य, विज्ञान विरुद्ध नहीं होता। कुछ का पता है और कुछ के पीछे की तकनीकी अभी तक हम समझ नहीं सके हैं। किंतु उसके पीछे विज्ञान नहीं है, ऐसा कहना उचित नहीं।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने प्रकाश का क्वांटम सिद्धांत प्रस्तुत किया था। दरअसल उनसे पहले के सिद्धांतों में बताया गया था कि प्रकाश तरंगों के रूप में चलता है। आइंस्टीन ने बताया कि प्रकाश फोटॉन के छोटे-छोटे पैकेट्स के रूप में चलता है। इन पैकेट्स को क्वांटा या फोटॉन कहते हैं।

अब ये फोटॉन क्या होता है? मॉडर्न साइंस मानता है कि परमाणु को तोड़कर जो तीन तत्व प्राप्त हुए वो हैं इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन। इसमें प्रोटॉन और न्यूट्रॉन तो पदार्थ हैं लेकिन इलेक्ट्रॉन को लेकर संशय था। इसलिए इस दिशा में लंबे समय तक साइंटिफिक रिसर्च हुई। अंतत: साइंटिस्टों को पता चला कि इलेक्ट्रॉन दो तत्वों से युक्त है: लाइट और मैटर।

इस लाइट और मैटर का विश्लेषण किया तो पाया कि जो उर्जा या लाइट है उसमें सूक्ष्म ध्वनि भी है। इसलिए इसे फोटॉन का नाम दिया गया क्योंकि यह केवल उर्जा, प्रकाश या लाइट नहीं था। इसमें ध्वनि भी थी। यही कारण है कि फोटॉन के साथ पैकेट्स शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा जैसा कि अल्बर्ट आइंस्टाइन ने किया।

इस खोज को ही क्वांटम फिजिक्स कहा जाता है क्योंकि आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि सूक्ष्म स्तर की कई घटनाओं की व्याख्या इटर्नल फिजिक्स से नहीं की जा सकती। इनकी व्याख्या के लिए ही क्वांटम सिद्धांत की आवश्यकता होती है।

क्वांटम फिजिक्स की दुनिया में एक बडा नाम मैक्स प्लांक का है। मैक्स प्लांक के क्वांटम फिजिक्स के अनुसार जब किसी ठोस वस्तु को एक सिरे से गरम किया जाता है तो दूसरा सिरा भी धीरे धीरे गर्म हो जाता है। एक समय के बाद यह उर्जा अपने मूल से बाहर भी जाने लगती है। धीरे-धीरे उसके ताप मे वृद्धि होती है और अलग-अलग तरंग्दैर्ध्य (ʎ) के विकिरण उत्सर्जित होते हैं।

आधुनिक विज्ञान भी ये मानता है कि उर्जा एक जगह स्थिर नहीं रहती। एक सिरे से दूसरे सिरे की यात्रा करती है। कुछ ऐसी ही खोज भारतीय मनीषा या आध्यात्मिक जगत की भी है। भारत का आध्यात्मिक जगत स्थूल की बजाय सूक्ष्म का अध्ययन करता है। उसने मन की गहराइयों पर सदियों सदियों तक शोध किया है और पाया है कि मन की उर्जा न केवल अपने आप को प्रभावित करती है बल्कि यह अपने आस पास के वातावरण को भी प्रभावित करती है। बिल्कुल उसी तरह जैसे मैक्स प्लांक पदार्थ के बारे में बता रहे हैं।

मन के भीतर शांति हो या अशांति। यह आसपास के वातावरण को भी प्रभावित करती है। यही बात विचारों को लेकर भी है। हम जो विचार कर रहे हैं वह विचार नकारात्मक या सकारात्मक उर्जा निर्मित करता है। उसके प्रभाव में जो आयेगा, उसे महसूस कर पायेगा। कोई सिद्ध, साधक या योगी जो कि चेतना के शुद्ध धरातल पर होता है, वह अपने आसपास आनेवाले व्यक्ति के बारे में सहज ही जान जाता है। उसे अनुभूति हो जाती है। भारतीय शास्त्रों में इसका वर्णन मिलता है। शास्त्रों में कार्य-कारण सम्बन्ध में भी अपवाद कहे गये हैं। यह भी बताया गया है कि भविष्य का आभास वर्तमान में होता है।

अचिन्त्याः खलु ये भावाः न ताँस्तर्केण साधयेत्।
प्रकृतिभ्यः परं यस्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम्॥
(महाभारत, वायु पुराण)

इसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वर्तमान स्थितियों का अनुभव कर मनुष्य मस्तिष्क, भविष्य विषय में कल्पना करता है। इसमें भी क्वाण्टम मेकॅनिक्स जैसा अनिश्चय होता है। यदि घटना देखते हैं, तो उसके समय का अनुमान सटीक नहीं होता। काल का अनुमान 3 दिन, 3पक्ष, 3मास या 3वर्ष का होता है जिसके बारे में एक श्लोक प्रसिद्ध है। अभिनव गुप्त के विधि तंत्र सार में आता है कि:

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतकर्मं शुभाशुभम्।
त्रिभिर्पक्षैंः त्रिभिर्मासैः त्रिभिर्वर्षैः त्रिभिर्दिनैः॥

सनातन धर्म से संबंध रखने वाले अन्य पुराने पंथों में स्टोरहाउस कॉन्शियसनेस अर्थात्‌ भंडार चेतना की मान्यता है। बौद्ध धर्म में इसे 'आलय विज्ञान' की संज्ञा दी गई है। आलय विज्ञान की धारणा है कि यह चेतना का एक उच्चतर स्तर का स्टोरेज है। जो प्रत्येक व्यक्ति के आभामंडल से ऊपरी तौर पर जुड़ा होता है। यह प्रत्यक्ष तो होता है किन्तु स्पष्ट नहीं। यह आभासी होता है। ब्रह्मांड में असंख्य संभावित विचार हैं जो इस स्टोरेज में निष्क्रिय बने रहते हैं।

अब यहां प्लांक के क्वांटम सिद्धान्त के मुताबिक देखें तो इस भंडार चेतना में प्रवाहित तरंगों को डिकोड कर मस्तिष्क में आभास होने की संभावना है। इसे क्वांटम फिजिक्स भी मानता है। इसे भारतीय मनीषा ने अध्यात्म के स्तर पर जाकर समझा है। यह प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर होती है और इसमें समय भी बहुत अधिक नहीं लगता। कोई भी साधक, जिनका ध्यान का स्तर उन्नत हो वो इसे सहजता से कर लेते हैं।

भारतीय ज्ञान परम्परा में इसे गुरु कृपा से प्राप्त करने का मार्ग भी बताया गया है। मॉडर्न साइंस और प्राच्य भारतीय विज्ञान की शब्दावली में अन्तर है। जिसे आज का साइंस फोटॉन या क्वांटा कह रहा है वह भी वही प्रकाश है, जिसे हमारे यहाँ दिव् धातु से सम्बोधित किया गया है। इसका लोक अंतरिक्ष के ऊपर बताया गया है। इसी दिव से देवता शब्द की व्युत्पत्ति हुई है। भिन्न फ्रीक्वेंसी पर प्रवाहित प्रकाश पुंज ही सनातन के देवता के रूप में व्याख्यायित हैं। इसलिए इसी दिव् से उजाला होने वाले प्रहरों को दिवस और सूर्य को दिवाकर कहा गया है।

यानी क्वांटम फिजिक्स जिसे फोटॉन पैकेट्स कहकर परिभाषित कर रहा है उसे ही भारतीय मनीषा देवता कह रही है। ऐसी सूक्ष्म उर्जा जो प्रकृति में घटित होनेवाली घटनाओं का कारक है। हम उसे देवता कह रहे हैं माडर्न साइंस उसे फोटॉन एनर्जी कह रहा है। बहरहाल, संक्षेप में सिर्फ इतना समझा जा सकता है कि माडर्न साइंस जैसे जैसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर जा रहा है वह भारत के आध्यात्म विज्ञान की ओर ही आ रहा है।

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    ऐसे में बेहतर हो कि आध्यात्मिक शक्तियों को चमत्कार बताकर उसकी जांच करने का प्रयास करनेवाले उन आध्यात्मिक शक्तियों को जानने का प्रयास करें। अगर बिना साइंस पढ़े कोई साइंस पर टिप्पणी नहीं कर सकता तो बिना आध्यात्मिक अनुभव के कोई आध्यात्मिक विज्ञान पर टिप्पणी करने का अधिकारी कहां से हो जाता है?

    यह भी पढ़ें: Ramcharitmanas Controversy: स्त्री और शूद्र की प्रताड़ना नहीं है रामचरित मानस का 'ताड़ना'

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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