Ramcharitmanas Controversy: स्त्री और शूद्र की प्रताड़ना नहीं है रामचरित मानस का 'ताड़ना'
अवधी में ताड़ना का अर्थ ध्यान पूर्वक देखकर समझना या बोध करना के अर्थ में है। स्वयं तुलसीदास जिस बुन्देलखण्ड इलाके से आते थे वहां आज भी देखरेख करने के लिए 'ताड़ ल्यौ' शब्द का ही इस्तेमाल किया जाता है।

रामचरित मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाई को लेकर बार-बार विवाद खड़ा करने का प्रयास किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास के नारी विरोधी होने का दावा करने वालों के लिए यह एक पंक्ति बिना सन्दर्भ और प्रसंग मनमानी व्याख्या के लिए अति प्रसिद्ध हो चुकी है। 'ढोल गंवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥' तुलसीदास पर स्त्री द्वेष का आरोप लगाने वाले लोग बार बार इस चौपाई को चर्चा में ले आते हैं।
ऐसे विवाद को संकीर्ण दृष्टि से नहीं बल्कि व्यापक दृष्टिकोण से देखने और समझने की आवश्यकता है। कारण यह है कि कोई भी बात बिना अपने मूल सन्दर्भ और प्रसंग के अर्थहीन होती है। अतः बिना प्रसंग की व्याख्या के इसका प्रयोग करना स्वयं ही उद्देश्य पर संदेह उत्पन्न करता है।
पूरे विश्व में मानव समूहों के मध्य एक अघोषित संघर्ष चला आ रहा है। जो बाह्य रूप में कभी शक्ति - सत्ता का संघर्ष, कभी सीमाओं का संघर्ष तो कभी सभ्यता का संघर्ष प्रतीत होता है। किन्तु इन सबके मूल में सांस्कृतिक संघर्ष है। जब व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक पहचान से टूटकर अलग होगा तभी वह दूसरी संस्कृति के समूह में कमतर बनकर सम्मिलित होने को मजबूर होगा। यही खेल वर्षो से चला आ रहा है। इसके लिए अलग-अलग समय पर अलग अलग दांव-पेंच चलाए जाते हैं।
भारत एक विराट राष्ट्र है। संस्कृति ही राष्ट्र की आत्मा होती है। भारतीय संस्कृति सनातन हैं जिसे भारतीय अपने धर्म बोध के साथ जीवन में धारण करते हैं जिसमें राम चरित भारतीय संस्कृति का आधारिक और सर्व स्वीकार्य चरित है। इसी कारण बाबा तुलसीदास सनातन धर्म की अंतर्दृष्टि बन जाते हैं। सांस्कृतिक विचार साहित्य की दृष्टि से मध्यकाल में इतना विराट व्यक्तित्व कोई और न था। केशव, वादरायण और शंकराचार्य के बाद तुलसी को युगद्रष्टा ऋषि कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनके विभिन्न स्त्री सम्मान में लिखी गई पंक्तियों को चालाकी से परे करते हुए सुन्दरकाण्ड की इस पंक्ति पर बार - बार विवाद का कारण भी उपरोक्त संघर्ष का ही उपकरण है।
यदि बात करें साहित्यिक कथा रूपों की तो उसके कथानक में संवाद के माध्यम से गति आती है। यह संवाद विभिन्न पात्रों के मध्य होता है। जो अपने पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में प्रसंगवश अपनी बात कहते हैं। ऐसे ही वार्तालाप में यह 'ढोल गंवार शूद्र पशु नारी' वाली चौपाई भी कही गई है। लंका प्रवेश करने हेतु समुद्र पार करने के लिए राम, उनकी सेना और समुद्र देव के मध्य क्या बात चल रही है, यह वही प्रसंग है। भगवान राम की सेना को जब तीन दिनों तक समुद्रदेव ने रास्ता नहीं दिया तब श्रीराम ने समुद्र सुखाने हेतु बाण चढ़ाया। इसके मध्य में कागभुशुंडि और गरुड़ का वार्तालाप भी है।
अंततः समुद्र भयभीत होकर प्रभु रामचंद्र के पैर पकड़ता है और अपना बचाव कहते हुए कहता है कि, आपने मुझे अच्छी सीख दी। हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिए।
- सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
- गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
आगे समुद्र कहते हैं - आपकी प्रेरणा से ही माया ने इन पांच तत्वों को सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है। इनकी क्रिया स्वभाव से जड़ है।
- प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
- ढोल गंवार क्षुद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
आपने मुझे आज यह शिक्षा देकर भला किया। किन्तु यह मर्यादा आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी ये सभी शिक्षा और समुचित देखरेख के पात्र हैं। क्योंकि इन सभी की अपनी मर्यादाएं हैं। उस मर्यादा को पार करना उनके लिए अहितकारी हो सकता है।
यह पूरा प्रसंग समुद्र द्वारा मर्यादा के विषय में अपना पक्ष रखने का है। यदि समुद्रदेव श्रीराम की सेना को मार्ग नहीं दे रहे तो वह समुद्र की अपनी प्रकृति के कारण उनकी मर्यादा की सीमा की बात है। राम को उस मर्यादा की सीमा को तोड़ना नहीं चाहिए बल्कि ताड़ना चाहिए।
यह पूरा प्रसंग है। यहां एक और बात है कि रामचरित मानस अवधी भाषा में लिखा गया है। निरर्थक उसे हिन्दी में अनूदित कर अनर्थ व्याख्या का प्रयास कुत्सित है। अवधी में ताड़ना का अर्थ ध्यान पूर्वक देखकर समझना या बोध करना के अर्थ में है। स्वयं तुलसीदास जिस बुन्देलखण्ड इलाके से आते थे वहां आज भी देखरेख करने के लिए 'ताड़ ल्यौ' शब्द का ही इस्तेमाल किया जाता है।
स्वाभाविक है, तुलसीदास ने इस चौपाई में ताड़ना शब्द का प्रयोग अपनी स्थानीय बोली के प्रभाव के कारण ही किया। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है। ताड़ना के बाद जो अगला शब्द है वह अधिकारी है। क्या किसी को प्रताड़ित करना उसका अधिकार हो सकता है? एक सामान्य सोच समझ वाला व्यक्ति भी ऐसी कल्पना नहीं कर सकता तो फिर गोस्वामी तुलसीदास ऐसी भूल भला कैसे कर सकते हैं?
तुलसीदास की इस चौपाई में नारी की प्रताड़ना नहीं बल्कि उसकी ताड़ना अथवा ध्यान रखने की बात है। नारी की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। जिसकी जैसी प्रकृति होगी उसके लिए उसकी वैसी मर्यादा होगी। उसको यथोचित ताड़ना उसका 'अधिकार' है। किसी का "अधिकारी" होना बड़ी बात है। अधिकारी की अनदेखी नहीं की जा सकती है। अधिकारी का सम्मान रखना पड़ेगा।
जिन गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस में मर्यादा ही सर्वोच्च है। उनकी इस रचना में स्त्री की मर्यादा, स्त्री सम्मान को लेकर ऐसा भ्रम फैलाना निंदनीय है। गोस्वामी जी के बारे में ऐसी निरर्थक बात करने के पहले यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इसी सुन्दरकाण्ड में सुरसा को भी 'माता' कहकर संबोधित कराया है।
- राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥
- तब तव बदन पैठिहहुं आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
भारत में जातीय विभेद और लिंग विभेद का छ्द्म विमर्श खड़ा करने वालों को किसी सन्दर्भ, प्रसंग या व्याख्या से कोई सरोकार नहीं। उनके लिए नैरेटिव सेटिंग का एजेण्डा जहां से पोषित हो सकता है, उतना आधा-अधूरा ज्ञान ही महत्वपूर्ण है। इस चौपाई के साथ वो ऐसी ही आधी अधूरी व्याख्या करके लंबे समय से अपना धर्म विरोधी नैरेटिव चला रहे हैं।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तुलसीदास के नाम पर जिस विचारधारा के लोग निगेटिव नैरेटिव चलाते हैं वो समाज के पथ प्रदर्शक तुलसीदास को लंबे समय से पथभ्रष्टक घोषित कर चुके हैं। इसके लिए उन्होंने रामचरित मानस की ऐसी ही ऊटपटांग व्याख्या की है और अपना एजेंडा चलाया है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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