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क्या हिंसा फैलाने वाले लोग जाने-अनजाने भाजपा की राजनीति को और मजबूत बना रहे ?

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नई दिल्ली, 15 जून। क्या देश में हिंसा फैलाने वाले लोग जाने-अंजाने भाजपा की राजनीति को खाद-पानी दे रहे हैं ? जब कई मुस्लिम देश नूपुर शर्मा पर भाजपा की कार्रवाई से संतुष्ट हो गये तो फिर भारत में विरोध क्यों नहीं थम रहा ? जाहिर है कुछ लोग अपने राजनीतिक मकसद के लिए भारत में अशांति फैसाला चाहते हैं। अब तो हिंसक विरोध के पीछे पाकिस्तानी साजिश की बात भी सामने आ रही है। डीएफआरएसी की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने ट्विटर के जरिये भारत में हिंसा फैलाने के लिए साजिश रची थी।

violence over nupur sharma statement in states making BJPs politics stronger?

इसके बाद पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन हुए। तनाव और डर का माहौल बनाया गया। लेकिन यहां एक बात गौर करने की है कि ऐसे हिंसक प्रदर्शनों से भाजपा और मजबूत ही हुई है। अल्पसंख्यकों की उग्रता की प्रतक्रिया में वैसे लोग भी भाजपा की तरफ उन्मुख हो जाते हैं जिनका विचारवाद से कोई संबंध नहीं होता। इसकी झलक मिलने भी लगी है। जिस नूपुर शर्मा के बयान पर बवाल मचा हुआ है अब उनके भी समर्थन में आवाज उठने लगी है। बिहार के गोपालगंज में नूपुर शर्मा के समर्थन में पोस्टर लगाये गये। भागलपुर में उनके समर्थन में पर्चे फेंके गये। हालांकि शांति व्यवस्था कायम करने के लिए पुलिस मुस्तैद है। वह सख्ती भी करेगी। लेकिन इस घटना के बाद लोगों की मन:स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

वक्त से बड़ा ताकतवर कोई और नहीं

वक्त से बड़ा ताकतवर कोई और नहीं

किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती। ज्यादा चीनी भी खराब है। ज्यादा नमक भी खराब है। विरोध जो हिंसक हो जाए वह भी खराब है। आलोचना जब हद पार कर जाए तो वह भी खराब है। याद कीजिए 2 सीटों वाली भाजपा आज कैसे अकेले बहुमत वाली सरकार चला रही है ? दरअसल भाजपा को अपने सिद्धांतों से जितना फायदा नहीं मिला उससे अधिक विरोधियों ने उसकी जड़ मजबूत कर दी। नरेन्द्र मोदी 2001 में पहली बार केयर टेकर मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वह कोई बहुत मजबूत नेता नहीं थे। भीषण भूकंप की वजह से गुजरात में करीब 20 हजार लोग मारे गये थे। मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की कुर्सी हिलने लगी थी। जनता में भाजपा सरकार के प्रति आक्रोश फैलने लगा। भाजपा के अंदर भी भयंकर गुटबाजी थी। स्थिति को संभालने के लिए नरेन्द्र मोदी को कुर्सी पर बैठा दिया गया। केशुभाई पटेल और कांशीराम राणा यही समझते थे कि नौसिखिए मोदी के नेतृत्व में भाजपा चुनाव नहीं जीत पाएगी जिससे फिर उनकी पूछ बढ़ जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। नरेन्द्र मोदी 7 अक्टूबर 2001 को पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन लगभग चार महीने बाद ही गोधरा कांड हो गया। यह बहुत ही दुखद घटना थी। फरवरी 2002 में गोधरा स्टेशन पर कारसेवकों से भरी ट्रेन में आग लगा दी गयी जिसमें करीब 58 लोगों की मौत हो गयी। मरने वालों में अधिकांश कारसेवक थे जो अयोध्या से लौट रहे थे। आग लगाने का आरोप अल्पसंख्यक समुदाय पर लगा। इस घटना की प्रतिक्रिया में पूरे गुजरात में दंगा फैल गया। दोनों पक्षों के बीच जबर्दस्त हिंसा हुई। इस दंगे में सैकड़ों लोग मारे गये। दंगे के बाद गुजरात का माहौल पूरी तरह बदल गया। धर्म के आधार पर प्रबल राजनीतिक ध्रुवीकरण हो गया।

किसी घटना का तटस्थ मूल्यांकन क्यों नहीं ?

किसी घटना का तटस्थ मूल्यांकन क्यों नहीं ?

गोधरा कांड और गुजरात दंगे, दोनों ही मानवता के नाम पर कलंक हैं। लेकिन गूंज सिर्फ गुजरात दंगे की हुई। गोधरा कांड के खलनायकों के नाम शायद ही किसी को याद हों। लेकिन गुजरात दंगे के आरोपियों के नाम हर एक जुबान पर हैं। वक्त की इस नाइंसाफी का गुजरात की राजनीति पर जबर्दस्त असर पड़ा। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगा कि उन्होंने दंगा रोकने के लिए कठोर कदम नहीं उठाये जिससे स्थिति इतनी भयावह हो गयी। कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी की घनघोर आलोचना शुरू कर दी। अल्पसंख्यक नेताओं ने भी नरेन्द्र मोदी का कट्टर विरोध शुरू कर दिया। नरेन्द्र मोदी की आलोचना और निंदा रोजमर्रा की बात हो गयी। इस नकारात्मक राजनीति ने नरेन्द्र मोदी को चर्चित बना दिया। जो नरेन्द्र मोदी एक केयर टेकर मुख्यमंत्री बने थे अचानक वे मजबूत नेता बनते चले गये। बहुसंख्यक उनकी तरफ मुड़ने लगे। जो बहुसंख्यक कांग्रेस के समर्थक थे वे भी भाजपा के पाले में जाने लगे। इसी माहौल के बीच दिसम्बर 2002 में गुजरात विधानसभा के चुनाव हुए। कमजोर समझे जाने वाले नरेन्द्र मोदी ने कमाल कर दिया। 127 सीट जीत कर भाजपा ने फिर सरकार बनायी। नरेन्द्र मोदी दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।

जितनी आलोचना हुई उतनी बढ़ी लोकप्रियता

जितनी आलोचना हुई उतनी बढ़ी लोकप्रियता

नरेन्द्र मोदी चुनावी राजनीति के धुरधंर नहीं थे। लेकिन अंध आलोचना ने उनका कायकल्प कर दिया। एक बार उन्हें जनसनर्थन मिला तो उन्होंने विकास को अपनी राजनीति का आधार बना लिया। कांग्रेस उनके खिलाफ हेट स्पीच देती रही और नरेन्द्र मोदी गुड गवर्नेंस की राह पर चलते रहे। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ केस भी दर्ज किया गया। 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो कांग्रेस का निंदा अभियान और तेज हो गया। लेकिन यह कोशिश नरेन्द्र मोदी के लिए संजीवनी साबित हुई। कांग्रेस सिर्फ यही कहती रही कि दंगे के लिए मोदी दोषी हैं और उन्हें इसका दंड मिलना चाहिए। इन आलोचनाओं से उब कर एक बार मोदी ने कहा था, अगर में गुजरात दंगे का दोषी हूं तो मुझे फांसी पर लटका दीजिए। इस साहसिक बयान ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ा दिया। वे चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने। दिसम्बर 2013 में गुजरात दंगा मामले में उन्हें क्लीन चिट मिल गयी। इसके बाद उनका कद इतना बढ़ गया कि वे भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गये। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने करिश्मा कर दिया और प्रधानमंत्री बने। 2019 में और ज्यादा मजबूती से प्रधानमंत्री बने। राजनीति में अंध आलोचना का नतीजा क्या होता है, यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीति उत्कर्ष को देख कर समझा जा सकता है। क्या अतिशय ओलोचना अब नूपुर शर्मा को भी एक नये मुकाम पर पहुंचा देगी ?

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violence over nupur sharma statement in states making BJP's politics stronger?
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