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Delhi Bomb Threat: 2 साल में 50 धमकी भरे ईमेल,500 स्कूल टारगेट—क्यों 24×7 अलर्ट पर दिल्ली पुलिस की बम स्क्वॉड

Delhi Bomb Threat: दिल्ली में पिछले करीब दो साल से एक ऐसा खतरा सामने आया है जिसने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। राजधानी के 500 से ज्यादा स्कूलों को अब तक 50 से अधिक धमकी भरे ईमेल मिल चुके हैं।

हर बार आशंका यही रहती है कि कहीं किसी स्कूल में बम तो नहीं रखा गया। हालांकि अब तक सभी धमकियां झूठी साबित हुई हैं, लेकिन पुलिस के लिए हर कॉल और हर ईमेल को गंभीरता से लेना जरूरी होता है। यही वजह है कि दिल्ली पुलिस की बम निरोधक टीम पिछले दो साल से लगभग 24 घंटे अलर्ट मोड में काम कर रही है।

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आरके पुरम थाने का वह कमरा, जहां से शुरू होती है आपात कार्रवाई (Bomb Response Hub in RK Puram)

इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिणी दिल्ली के आरके पुरम पुलिस स्टेशन की तीसरी मंजिल पर एक साधारण सा कमरा है। कमरे में एक मेज, कुछ कुर्सियां, दीवार से लगी अलमारी और कई बक्से रखे हुए हैं। पहली नजर में यह किसी मशीन पार्ट्स बनाने वाली कंपनी का स्टोर रूम लग सकता है, लेकिन असल में यही वह जगह है जहां से बम से जुड़ी आपात स्थिति से निपटने की कार्रवाई शुरू होती है।

यहीं पर बम निरोधक दस्ते और बम खोजी टीम के जवान अपने उपकरणों की जांच करते रहते हैं। कमरे में बम सूट, तेज रोशनी वाली सर्च लाइट और कई तकनीकी उपकरण रखे होते हैं। इन टीमों में कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर रैंक तक के करीब 430 पुलिसकर्मी शामिल हैं, जो लगातार तैयार रहते हैं।

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धमकी मिलते ही कैसे शुरू होता है ऑपरेशन (How the Bomb Response Operation Works)

जैसे ही किसी स्कूल या संस्थान से धमकी भरी कॉल या ईमेल की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम तक पहुंचती है, तुरंत कार्रवाई शुरू हो जाती है। सबसे पहले स्थानीय पुलिस इलाके को घेरती है और स्कूल को खाली कराया जाता है। इसके बाद डॉग स्क्वॉड और बम खोजी टीम परिसर में प्रवेश करती है।

अगर किसी संदिग्ध वस्तु का पता चलता है तो बम निरोधक दस्ता मौके पर बुलाया जाता है। इस दौरान दमकल विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल भी सतर्क रहते हैं। पुलिस अधिकारी बताते हैं कि हर कोने की गहन जांच के बाद ही यह तय किया जाता है कि धमकी झूठी है या नहीं।

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मई 2024 से शुरू हुआ डर का सिलसिला

इस तरह की घटनाओं की शुरुआत मई 2024 में हुई थी। उस समय करीब 200 स्कूलों को एक साथ एक ईमेल मिला जिसमें लिखा था कि स्कूल में कई विस्फोटक उपकरण लगाए गए हैं। यह ईमेल एक विदेशी ईमेल पते से भेजा गया था।

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि ईमेल में इस्तेमाल हुआ एक शब्द कट्टरपंथी संगठनों के प्रचार में भी इस्तेमाल होता रहा है। चूंकि ईमेल का सर्वर विदेश में था, इसलिए जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी मदद मांगी गई।

जांच क्यों बन जाती है मुश्किल?

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक ज्यादातर ईमेल वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क, टोर नेटवर्क या प्रॉक्सी सर्वर के जरिए भेजे गए थे। इससे भेजने वाले का असली पता छिप जाता है। कई बार ईमेल के स्रोत यूरोप या दूसरे देशों से जुड़े पाए गए, लेकिन तकनीकी कारणों से उनकी असली पहचान तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है।

साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि कई लोग अपनी पहचान छिपाने के लिए कई स्तर की तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। वे अस्थायी ईमेल खाते बनाते हैं और अलग-अलग देशों के सर्वर के जरिए संदेश भेजते हैं। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को डिजिटल फोरेंसिक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का सहारा लेना पड़ता है, जिससे जांच लंबी हो जाती है।

कुछ मामलों में छात्रों की शरारत भी निकली

हालांकि हर धमकी झूठी निकली है, लेकिन कुछ मामलों में पुलिस को चौंकाने वाली जानकारी भी मिली। कई बार स्कूल के ही छात्रों ने मजाक या परीक्षा टालने के लिए धमकी भरे ईमेल भेजे थे।

एक मामले में सौ से ज्यादा स्कूलों को धमकी भेजने वाला छात्र पकड़ा गया क्योंकि उसने गलती से बिना वर्चुअल नेटवर्क के ईमेल भेज दिया था। उसने पुलिस को बताया कि वह सिर्फ मजाक करना चाहता था। ऐसे मामलों में बच्चों को काउंसलिंग के बाद छोड़ दिया गया।

अदालत के निर्देश के बाद बढ़ाई जा रही तैयारी

लगातार मिल रही धमकियों के बाद अदालत ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया। अदालत ने सरकार और पुलिस को निर्देश दिया कि ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सभी एजेंसियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट की जाएं।

दिल्ली में चार हजार से ज्यादा स्कूल हैं, जबकि पहले बम निरोधक दस्तों की संख्या काफी कम थी। अब इन टीमों की संख्या बढ़ाने और डॉग स्क्वॉड में और प्रशिक्षित कुत्तों को शामिल करने की तैयारी की जा रही है।

चौबीस घंटे सतर्क रहती हैं सुरक्षा टीमें

दिल्ली पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि राजधानी हमेशा हाई अलर्ट पर रहती है। बम निरोधक टीमों को सिर्फ स्कूलों की धमकियों से ही नहीं, बल्कि वीआईपी कार्यक्रमों और बड़े आयोजनों की सुरक्षा में भी तैनात किया जाता है।

इसी वजह से इन टीमों को समय-समय पर नई तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे किसी भी संभावित खतरे से तुरंत निपट सकें। पिछले दो साल ने यह साफ कर दिया है कि भले ही धमकियां झूठी हों, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए हर खतरा असली ही माना जाता है।

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