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Explained: रूस अब क्यों नहीं दे रहा भारत को तेल पर छूट? पुतिन भी खेल गए, देखें 2022 से 2026 तक का ग्राफ

Explained: पिछले चार सालों में India और Russia के बीच तेल व्यापार में जबरदस्त बदलाव आया है। 2022 में Russia-Ukraine War शुरू होने के बाद रूस एक छोटे सप्लायर से भारत तेल का बड़ा साझेदार बन गया। आज भी रूसी कच्चा तेल भारत की तेल जरूरतों का अहम हिस्सा है, लेकिन इसकी कीमत और सप्लाई पर अमेरिकी सेंक्शन, जियो पॉलिटिकल टेंशन और मिडिल ईस्ट में चल रहे अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान के युद्ध का असर लगातार पड़ रहा है।

2022 से पहले रूस का हिस्सा बहुत छोटा था

2022 से पहले भारत के कुल तेल इम्पोर्ट में रूस की हिस्सेदारी 2% से भी कम थी। लेकिन फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इसके बाद मॉस्को को एशियाई देशों को भारी छूट देकर तेल बेचना पड़ा। भारत ने इस मौके का फायदा उठाया और कुछ ही महीनों में रूसी तेल देश का सबसे बड़ा खरीददार बन गया।

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2022 से 2025 के बीच इम्पोर्ट में तेज उछाल

भारत के रूसी तेल इम्पोर्ट में 2022 से 2025 के बीच तेज वृद्धि हुई। 2022 के अंत तक भारत लगभग 900,000 बैरल प्रति दिन रूसी तेल इम्पोर्ट करने लगा। 2023 में यह खरीद और बढ़ी और कुछ समय के लिए भारत 2 मिलियन बैरल प्रति दिन से ज्यादा समुद्री तेल खरीदने वाला दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार बन गया।

2024: रूस बना सबसे बड़ा सप्लायर

2024 में रूस ने भारत के कुल कच्चे तेल इम्पोर्ट का लगभग 35% हिस्सा सप्लाई किया। इससे मिडिल ईस्ट के कई पारंपरिक सप्लायर (ईरान, सऊदी और यूएई आदि) पीछे छूट गए। 2025 में भी यह ट्रेंड जारी रहा और भारत ने औसतन 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन रूसी तेल इम्पोर्ट किया। यह रूस के समुद्री तेल एक्सपोर्ट का लगभग 40% था। इस दौरान पश्चिमी देशों ने भारत की यह कहते हुए आलोचना की, कि भारत यूक्रेन के खिलाफ जंग को फंड कर रहा है। लेकिन भारत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।

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बहुत बड़ी हैं भारत की जरूरतें

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल का ग्राहक और इम्पोर्टर है। देश अपनी कुल जरूरत का 85% से ज्यादा तेल विदेशों से इम्पोर्ट करता है। ऐसे में भारतीय रिफाइनरियों के लिए सस्ता रूसी तेल बेहद शानदार विकल्प बन गया।

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भारी छूट के कारण रूस से खरीद बढ़ी

2022 और 2023 के ज्यादातर समय रूस ने भारत को वैश्विक बेंचमार्क कीमतों से काफी सस्ता तेल दिया। रूसी Urals crude oil की कीमत Brent crude से लगभग $10 से $15 प्रति बैरल कम थी। इससे भारतीय रिफाइनरियों को अरबों डॉलर की बचत हुई और सरकार को देश में ईंधन कीमतें स्थिर रखने में मदद मिली।

शुरुआती सौदों में बेहद सस्ता तेल

शुरुआती डील्स में भारत लगभग $47 से $60 प्रति बैरल (लगभग ₹3,900 से ₹5,000) की कीमत पर रूसी तेल खरीद रहा था। शिपिंग लागत और कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर कीमत अलग-अलग होती थी। उस समय वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता थी, इसलिए यह छूट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित हुई।

2025-2026 में प्रतिबंधों का असर दिखा

लेकिन 2025 और 2026 की शुरुआत में जियो पॉलिटिकल दबाव और नए सेंक्शन का असर दिखने लगा। अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल कंपनियों और शिपिंग नेटवर्क पर निगरानी बढ़ा दी। इसके बाद भारतीय रिफाइनरियों ने धीरे-धीरे रूसी तेल की खरीद कम करना शुरू कर दिया।

जनवरी 2026 में इम्पोर्ट सबसे निचले स्तर पर

जनवरी 2026 तक भारत का रूसी तेल इम्पोर्ट घटकर लगभग 1.1 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया। यह 2022 के अंत के बाद का सबसे निचला स्तर था। इस दौरान भारत के कुल तेल इम्पोर्ट में रूस की हिस्सेदारी भी काफी कम हो गई।

भारत ने तेल इम्पोर्ट का बदला तरीका

मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से पहले ही भारत ने अपने तेल इम्पोर्ट का तरीका बदलना शुरू कर दिया था। कई भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से खरीद कम की और अमेरिका के साथ नए व्यापार समझौतों पर बातचीत शुरू की। साथ ही मिडिल ईस्ट और अफ्रीका से वैकल्पिक सप्लायर भी तलाशे जाने लगे। लेकिन खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने के बाद स्थिति फिर बदल गई। इस अस्थिर माहौल ने भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई रणनीति बनाने पर मजबूर किया। इससे वैश्विक तेल बाजार में भी अनिश्चितता बढ़ गई।

स्ट्रेट ऑफ होर्मूज का संकट

इजरायल-ईरान की जंग के कारण ग्लोबल एनर्जी शिपमेंट बुरी तरह प्रभावित हुई, खासकर Strait of Hormuz के आसपास। यह दुनिया के सबसे व्यस्त तेल शिपिंग मार्गों में से एक है। जब आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी तो भारतीय रिफाइनरियों ने फिर से रूसी तेल की ओर रुख करना शुरू कर दिया।

मार्च 2026 में इम्पोर्ट में अचानक उछाल

रिपोर्टों के मुताबिक भारत ने सप्लाई सुरक्षित करने के लिए तेल इम्पोर्ट तेजी से बढ़ाया। मार्च 2026 में रूस से इम्पोर्ट लगभग 45 से 50% तक बढ़ गया। फरवरी में यह करीब 1 मिलियन बैरल प्रति दिन था, जो मार्च में बढ़कर लगभग 1.5 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गया।

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अमेरिका हटा पीछे, फिर रूसी से खरीददारी

ग्लेबल सप्लाई चेन डिस्टर्ब होने की वजह से अमेरिका ने अस्थायी रूप से कुछ प्रतिबंधों में ढील दी। इससे समुद्र में मौजूद कुछ रूसी तेल कार्गो को डिलीवर करने की अनुमति मिली। इस छूट के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने बिना बिके पड़े कार्गो खरीदने में तेजी दिखाई।

भारत ने खरीदे 30 मिलियन बैरल तेल

रिपोर्टों के मुताबिक इस छूट के बाद भारत ने संकट के दौरान सप्लाई स्थिर रखने के लिए लगभग 30 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदा। यह कदम दिखाता है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तेजी से फैसले लेता है।

भारत को क्यों हुआ नुकसान?

अब स्थिति बदल चुकी है। पहले जहां रूस भारी डिस्काउंट देता था, वहीं मिडिल ईस्ट संकट और बढ़ती वैश्विक कीमतों के कारण वह छूट भी रूस ने लगभग खत्म कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक रूसी यूराल क्रूड की कीमत हाल ही में लगभग $89 प्रति बैरल (करीब ₹7,400) तक पहुंच गई। इसी लिहाज से भारत को छूट में बड़ा नुकसान हुआ है।

वहीं, Reuters और Bloomberg की रिपोर्ट के अनुसार कुछ हालिया डील्स में व्यापारियों ने रूसी कच्चा तेल भारत को ब्रेंट क्रूड से $4-5 ज्यादा कीमत पर बेचा। यानी अब रूसी तेल कई मामलों में वैश्विक बेंचमार्क से भी महंगा पड़ रहा है।

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दुनिया में क्या भाव बिक रहा तेल?

मौजूदा संकट के दौरान ब्रेंट क्रूड लगभग $100 प्रति बैरल (करीब ₹8,300) के आसपास ट्रेड कर रहा है। ऐसे में भारतीय रिफाइनरियों को माल ढुलाई और डिलीवरी शर्तों के आधार पर लगभग $95 से $105 प्रति बैरल (₹7,900 से ₹8,700) तक भुगतान करना पड़ सकता है। इसके साथ ही, अगर मिडिल ईस्ट की जंग लंबी खिंचती है तो रूस से तेल खरीद पूरी दुनिया के लिए एक बेहतर डील हो सकती है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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