क्या यूरोप में नव राष्ट्रवाद का उदय हो रहा है?
क्या यूरोप में नव राष्ट्रवाद का उदय हो रहा है? यह प्रश्न इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यूरोपियन यूनियन के 27 में से 13 राष्ट्रों में राष्ट्रवादी विचारधारा की समर्थक पार्टियों का दबदबा है और सभी राष्ट्र अप्रवासी मुस्लिम शरणार्थियों को अपने राष्ट्र में शरण देने के विरोध में मुखर हो चुके हैं। पिछले आधे दशक में इन सभी राष्ट्रों में नव राष्ट्रवाद की लहर चली है जो अपने समकालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों से भी प्रभावित रही है।

ट्रम्प हंगरी के राष्ट्रवादी नेता विक्टर ओर्बन को यूरोप का स्टार बता चुके हैं तो पोलैंड के राष्ट्रवादी राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा भी ट्रम्प के समर्थक हैं। इस दौरान यूरोप में राष्ट्रवादी पार्टियों का वोट प्रतिशत लगभग 55 फीसद बढ़ चुका है। यूरोप युद्ध प्रभावित व आतंरिक समस्याओं का सामना कर रहे मुस्लिम देशों के मुस्लिमों को शरण देने की अपनी उदारवादी छवि के दौर से निकल कर अब प्रतिकार करने लगा है। इतिहास भी यूरोप का इस्लाम से विरोधाभास का जटिल सा रिश्ता दिखाता है जिसकी पुष्टि ऑटोमन साम्राज्य के दौर से होती है।
हाल ही में इटली में हुए आम चुनावों में दक्षिणपंथी पार्टी ब्रदर्स आफ इटली पार्टी की नेता जियोर्जिया मिलोनी प्रधानमंत्री का चुनाव जीत गयी हैं। मिलोनी इटली के फासीवादी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी की विचारधारा को मानने वाली नेता हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहला अवसर है जब इटली जैसे ईसाई देश की सत्ता पर दक्षिणपंथी पार्टी का कब्ज़ा हुआ है और एक महिला जियोर्जिया मिलोनी प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं। भारत के परिपेक्ष्य में बात करें तो जियोर्जिया मिलोनी के भाषण यहाँ खूब सुने जा रहे हैं जिनमें इस्लाम और अप्रवासी शरणार्थियों को लेकर कटु बातें कही गई हैं।
हंगरी, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, फ्रांस जैसे राष्ट्र मुस्लिम अप्रवासी समस्या से इतने त्रस्त हो चुके हैं कि वे अब इस्लाम और उसकी मान्यताओं को अपने देशों में कुंद करके ईसाईयत को बढ़ावा दे रहे हैं। इन सभी राष्ट्रों के नायक भी द्वितीय विश्व युद्ध के वे किरदार हैं जिन्हें पश्चिम ने षड़यंत्र करके खलनायक बना दिया। जिन राष्ट्रों में अभी राष्ट्रवादी सरकारें नहीं हैं और वे अमेरिका में पूंजीवादी प्रभाव में हैं, वहां भी जनता अब 'राष्ट्र प्रथम' की अवधारणा को आत्मसात कर वर्तमान सरकारों की मुश्किल में डाल रही है।
नेशनल मैप ऑफ इस्लाम से मुस्लिम चरमपंथ का मुकाबला
याद कीजिये, पिछले वर्ष ऑस्ट्रिया की मंत्री सुजैन राब ने एक वेबसाइट लॉन्च की थी जिसका नाम था नेशनल मैप ऑफ इस्लाम। उक्त वेबसाइट में ऑस्ट्रिया में स्थित 620 से भी अधिक मस्जिदों, मुस्लिम संगठनों व उनके अधिकारियों के नाम और पते दिए गए हैं। इसके साथ ही वेबसाइट में मस्जिदों, उनके मौलानाओं, मुस्लिम संगठनों इत्यादि के विदेशों में उनके संभावित गठजोड़ की जानकारी भी शामिल है।
जब यह मामला सार्वजनिक हुआ तो ऑस्ट्रिया में अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा विरोध के स्वर मुखर हुए। मुस्लिम राष्ट्रों में भी इस कदम की निंदा की गई और परोक्ष रूप से धमकाया भी गया। खासकर मुस्लिम समुदाय का खलीफा बनने की इच्छा पाले बैठे तुर्की की ओर से इस मामले में बड़ी ही तीखी प्रतिक्रिया आई जबकि सऊदी अरब इस मुद्दे पर थोड़ा संयत रहा।
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दरअसल, ऑस्ट्रिया में मुस्लिम जनसँख्या आठ प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है और उसकी चिंता है कि इससे उसका सामाजिक तानाबाना बिगड़ रहा है। मैप ऑफ इस्लाम के सामने आने से यह भी पता चला कि ऑस्ट्रिया में मात्र 206 मस्जिदें ही अनुमति प्राप्त हैं और शेष बिना अनुमति के अवैध रूप से संचालित की जा रही हैं। और फिर ऑस्ट्रिया ही क्यों, पूरे यूरोप में बिना अनुमति अवैध मस्जिदों का निर्माण हो रहा है ताकि इस्लाम का प्रचार-प्रसार हो सके। ऑस्ट्रिया की ही भांति अब अन्य यूरोपीय राष्ट्र भी नेशनल मैप ऑफ इस्लाम को अपने यहाँ लागू करने की कवायद करने लगे हैं जो निश्चित रूप से मुस्लिम राष्ट्रों की चिंता बढ़ाने वाला है।
इस्लाम ने आक्रामक विस्तार से खुद मोल ली परेशानी
विश्व इतिहास इस तथ्य की गवाही देता है कि जिस राष्ट्र ने मुस्लिमों को मानवता के नाते शरण दी है वह कालांतर में उसी के लिए नासूर बना है। बीते कुछ दशकों में यह समस्या आम हुई है कि किसी भी मुस्लिम राष्ट्र में अशांति अथवा अराजकता फैलती है तो वे अन्य किसी मुस्लिम राष्ट्र में शरण न लेकर बड़े पैमाने पर यूरोप का रुख करते हैं। यूरोप के राष्ट्रों ने भी शुरुआत में अप्रवासी मुस्लिमों को अपने यहाँ शरण दी किन्तु बाद में इन्हीं अप्रवासी मुस्लिम समुदाय ने शरण देने वाले राष्ट्र में अपने अधिकारों की मांग शुरू कर दी तथा स्थानीय आबादी के प्रति आपराधिक कृत्यों को अंजाम देना शुरू कर दिया।
अप्रवासी मुस्लिमों की घनी आबादी में बस जाने के कारण कई देशों में धार्मिक और सामाजिक असंतुलन भी हुआ है। फ्रांस के कई शहरों में बड़े पैमाने पर संघर्ष की घटनाएं पूरी दुनिया ने देखी हैं। स्वीडन में पिछले 5 वर्षों के दौरान क्राइम रेट 60 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। पुर्तगाल, डेनमार्क, जर्मनी, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, स्पेन, फ़िनलैंड जैसे विकसित राष्ट्रों में भी मुस्लिम अप्रवासी वर्ग ने बड़ी संख्या में आपराधिक कृत्यों को अंजाम दिया है और वे अब इस्लाम के विस्तार पर केन्द्रित हो गए हैं।
चूँकि इस्लाम येन-केन-प्रकरेण स्वयं के प्रसार व आक्रामक विस्तार पर जोर देता है अतः यूरोप में जहाँ-जहाँ मुस्लिम बस्ती बनीं, वहां मस्जिद, मदरसे इत्यादि बनने लगे हैं। संगठनात्मक स्तर पर मुस्लिम वर्ग स्वयं को मजबूत करने के साथ ही आसपास के पंथों को मानने वालों को इस्लाम में आने का प्रलोभन देने लगा है। युद्ध-प्रभावित मध्य-पूर्व से आये बहुत सारे मुस्लिम यूरोप के कई देशों में शरणार्थी बन कर आये थे और अब बहुतों को वहां की नागरिकता भी मिल चुकी है।
जो मुस्लिम अप्रवासी यूरोप पहुंचते हैं वो पहले तो अप्रवासी बनकर आते हैं लेकिन नागरिकता मिलने के बाद इस्लाम के नाम पर ही वहां के नियम कानून को मानना बंद कर देते हैं। उस देश में जहां वो रहते हैं उसको सम्मान देने की बजाय उनकी श्रद्धा का केंद्र सऊदी, तुर्की या इराक होता है। हालांकि अब यूरोप के राष्ट्र मुस्लिम शरणार्थियों की इस नीति को समझ चुके हैं अतः वहां की जनता ऐसे राष्ट्रवादी दलों का जमकर साथ दे रही है जो इनके खिलाफ बोल रहे हैं।
यूरोप में नव राष्ट्रवाद का जागरण करनेवाली पार्टियां ईसाईयत को भी जमकर बढ़ावा दे रही हैं ताकि इस्लाम की आक्रामक विस्तार नीति से निपटा जा सके। फिलहाल तो यूरोप ने इस्लामिक विस्तारवाद को सीधे-सीधे चुनौती दी है और पहली बार इस्लामिक ताकतें भी यूरोप को लेकर आक्रामक मुद्रा में नहीं बल्कि बचाव की मुद्रा में है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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