Lachit Borphukan: भारतीय शौर्य, साहस और वीरता का प्रतीक लाचित बरफुकन
Lachit Borphukan: जिस वक़्त छत्रपति शिवाजी महाराज ने पश्चिम और दक्षिण भारत में औरंगज़ेब की नाक में दम कर रखा था उसी दौर में उत्तर-पूर्व भारत में औरंगज़ेब से अहोम साम्राज्य टक्कर ले रहा था। उसी सेना के सेनापति थे लाचित डेका बरफुकन।

बरफुकन का अर्थ होता है सेनापति और लहू से लथपथ होने को असम में लाचित कहते हैं। उन्हें लेकर असम में यह कहानी प्रसिद्ध है कि वे अपने पिता मोमई तामुली को खून में सने हुए मिले थे, 'लाचित' अवस्था में। इसलिए उनका नाम लाचित पड़ा।
लाचित बारफुकन का जन्म 24 नवंबर 1622 में हुआ था, इस दिन को असम के लोग प्रत्येक वर्ष लाचित दिवस के रूप में मनाते हैं। 1999 से ही भारत की राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) लाचित बरफुकन के नाम से अपने कैडेट को स्वर्ण पदक से सम्मानित करती आ रही है। अफसोस यह है कि इतने महान योद्धा को पूर्वोत्तर से बाहर वह पहचान नहीं मिल पाई, जिसके वे हकदार थे।
जिस आहोम साम्राज्य के पास लाचित जैसा सेनापति था, उसके संबंध में भी हम कुछ खास नहीं जानते। आहोम साम्राज्य असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में 600 वर्षों तक फलता-फूलता रहा। आहोम सैनिकों को उनकी वीरता के साथ साथ पूर्वोत्तर में मुगल साम्राज्य के विस्तार को रोकने के लिए भी जाना जाता है। मुगलों पर आहोम सैनिकों की जीत को इतिहास में प्रमुखता से दर्ज इसलिए नहीं किया गया क्योंकि इतिहास लेखन पर वामपंथी विचारधारा से प्रभावित लोगों का अधिकार रहा।
रजत सेठी और शुभ्रष्ठा की किताब 'द लास्ट बैटल आफ सरायघाट' पेंग्विन प्रकाशन से आई थी'। किताब पूर्वोत्तर में भाजपा के उदय की कहानी को केन्द्र में रखकर लिखी गई थी, जिसका आमुख भाजपा नेता राम माधव ने लिखा था। इस किताब ने सरायघाट की लड़ाई से पूर्वोत्तर के बाहर रहने वाली बड़ी आबादी का परिचय कराया था।
इसी लड़ाई को लाचित बरफुकन मुगलों के विरुद्ध जीत कर आए थे। यह एक ऐतिहासिक लड़ाई थी, जिसे जीतने वाले इतिहास पुरुष लाचित बरफुकन भारतीय वामपंथी इतिहास में एक गुमनाम योद्धा बनकर रह गए।
विक्रम संपत की नई किताब 'ब्रेवहर्टस आफ भारत, विगनेट्स फ्रॉम इंडियन हिस्ट्री' में लाचित की कहानी पाठकों को पढ़ने के लिए मिलेगी। उन्होंने लाचित के साथ साथ भारतीय 'वामपंथी' रूझान वाले इतिहास की विसंगतियों पर विस्तार से लिखा है। भारतीय इतिहास लेखन में जो लड़ाई हम हारे हैं, उन लड़ाइयों का वर्णन मिलता है। हमारे जीत का इतिहास पाठ्यक्रमों में पढ़ाया ही नहीं जाता। विक्रम संपत ने अपनी किताब में भारत की जीत की, भारत के पराक्रम और शौर्य की कहानियों को लिखा है।
लाचित बरफुकन की कहानी भी भारतीय शौर्य, साहस और पराक्रम की कहानी है। ब्रह्मपुत्र नदी में मार्च 1671 में लड़ी गई सरायघाट की लड़ाई की कहानी है। यह पूरी लड़ाई नदी में लड़ी गई थी।
17वीं सदी के प्रारंभ में ही मुग़लों को असम के सामरिक महत्व का अंदाज़ा हो गया था। उन्होंने ब्रह्मपुत्र घाटी की खातिर अहोम राजाओं के साथ दो लड़ाइयाँ लड़ी। पहली 1639 की लड़ाई। इस युद्ध के बाद दोनों पक्षों के बीच फरवरी में एक संधि हुई। जिसे असुरार अली संधि कहा जाता है। यहां अली का मतलब पुल है। मुग़ल शासक ब्रह्मपुत्र के दक्षिण में रहेंगे, इस बात पर दोनों पक्षों की सहमति बनी।
लेकिन बादशाह बनने के बाद 1661 में औरंगजेब ने इस संधि को तोड़ दिया। उसने बड़ी सेना के साथ असम पर चढ़ाई कर दी और अहोम राजधानी पर कब्ज़ा कर लिया। इस समय अहोम राजा जयध्वज सिंह थे। उन्होंने मुगलों के साथ नई संधि की, जिसके अन्तर्गत उन्हें गुवाहाटी से मानस नदी तक ज़मीन और बहुत सारी रकम चुकानी पड़ी। कुछ ही समय बाद जयध्वज सिंह की मृत्यु हो गई। नए अहोम राजा बने चक्रध्वज सिंह।
चक्रध्वज सिंह ने लाचित को अपना बरफुकन यानि कि सेनापति बनाया। लाचित को मुगलों की ताकत का अनुमान था। वह जानते थे कि मुगलों से आमने सामने लड़ना मुश्किल है। ऐसे में लाचित ने गुरिल्ला लड़ाई लड़ने का फैसला किया। इस लड़ाई ने मुग़लों को परेशान कर दिया। बात सिर्फ मुगलों को परेशान करने की नहीं थी। लाचित ने 1667 तक कई किले मुगलों से छीनकर अपने कब्जे में ले लिया था।
लाचित मैदान में मुगलों के साथ आमने सामने की लड़ाई नहीं लड़ना चाहते थे। अहोम राजा के दबाव में आकर सन 1669 में उन्हें मैदान में उतरना पड़ा। जैसा कि लाचित को अनुमान था, वह लड़ाई हार गए और इसमें लाचित घायल भी हुए।
इस मौके का लाभ उठाकर औरंगज़ेब की तरफ से चक्रध्वज सिंह पर फिर से साल 1639 की स्थिति मानने का दबाव बनाया जाने लगा। यह बातचीत काफी लंबे समय तक चली। इस बीच राजा चक्रध्वज सिंह की भी मृत्यु हुई और उनके भाई उदयादित्य सिंह को राजा बनाया गया।
जब आहोम और मुगलों के बीच समझौता नहीं हो पाया तो मार्च 1671 में औरंगजेब की सेना 40 बड़ी नावों के साथ ब्रह्मपुत्र में गुवाहाटी की तरफ़ बढ़ने लगी। ब्रह्मपुत्र नदी गुवाहाटी पहुँचकर सँकरी हो जाती है, मुगलों की आ रही सेना के लिए इसका मतलब था कि आगे बहुत तेज़ पानी का उन्हें सामना करना होगा। दूसरी तरफ मुगलों की सेना नदी के रास्ते गुवाहाटी आ रही है इस बात की खबर लाचित को लग गई थी। उस सेना को किले के अंदर घुसने से रोकने के लिए लाचित ने किले की मरम्मत शुरू करवाई।
उस समय मुगलों की स्थिति ठीक नहीं थी। सेना के अंदर आपसी झगड़े थे और उन्हें सेना को उतारने के लिए जमीन भी नहीं मिल पा रही थी। दूसरी तरफ लाचित घायल थे। उनके बिना उनकी सेना का मनोबल कमजोर पड़ रहा था। वे मुगलों की सेना के सामने युद्ध में टिक नहीं पा रहे थे। ऐसी स्थिति को देखकर लाचित ने सेना की अगुवाई का मन बनाया। लाचित ने जब मुग़ल सेना पर धावा बोला था, उनके पास सिर्फ़ सात नावें थीं।
लेकिन लाचित के आने मात्र से उनके सैनिकों का जोश बढ गया। मुग़ल सेना के पास बड़ी नावें थी। नदी का रास्ता संकरा था। उनके लिए नाव मोड़ना मुश्किल हो रहा था। वहीं लाचित की छोटी-छोटी नावें एक जगह से दूसरी जगह आसानी से चली जाती थी।
नावों की इस व्यूह रचना में मुगल सैनिक फंस गए। शाम होते होते मुगलों के 4,000 सैनिक या तो मारे जा चुके थे या घायल पड़े हुए थे। सरायघाट की लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध इस युद्ध में लाचिन ने मुगल सैनिकों को जबर्दस्त मात दी।
औरंगज़ेब के सेना प्रमुख ने एक पत्र लिखा जिसमें बताया कि, "आहोम का एक एक सैनिक तीर और नाव चलाने से लेकर खाई खोदने और बंदूक-तोप चलाने में पारंगत है।'' सेनापति ने यह भी लिखा कि भारत की किसी दूसरी सेना में इतने काबिल सैनिक नहीं दिखाई दिए। जहां एक ही आदमी सारी कलाओं में पारंगत है और वह सेनाओं का नेतृत्व करता है। उसने लिखा कि "मुझे दुश्मन के मोर्चे में कहीं भी कोई कमी नहीं दिखाई दी।"
सरायघाट की लड़ाई जीतने के एक साल बाद ही लाचित की मृत्यु हो गई। लाचित जैसे वीर जिनका नाम हमें स्वर्ण अक्षरों में लिखना चाहिए, जिनकी प्रेरक कहानियां बच्चों को पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाई जानी चाहिए उनके इतिहास को ही देश से छुपाने की कुकृत्य किया गया है।
अब देश भर में स्थितियां बदल रहीं हैं। ऐसे समय में लाचित जैसे योद्धाओं की कहानियों को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की मांग समयानुकूल प्रतीत होती है।
इसीलिए जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मंच से कहते हैं कि ''भारत सिर्फ औरंगजेब, बाबर, जहांगीर या हुमायूं की कहानी नहीं है। भारत लाचित बरफुकन, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह, दुर्गादास राठौड़ का है।'' उनकी इस बात पर देर तक सभागार में तालियां बजती हैं। भारतीय जनमानस इतिहास में ऐसे परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए तैयार है और तालियों के माध्यम से स्वीकृति दे रहा है।
यह सुखद संयोग है कि देश में आजादी का अमृत महोत्सव और लाचित बरफुकन की 400वीं जयंती मनाने का अवसर एक साथ आया है। यह ऐतिहासिक अवसर असम के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय के रूप में दर्ज हो रहा है। इस अवसर पर दिल्ली के विज्ञान भवन में लाचित पर केन्द्रित एक आयोजन के समापन समारोह में 24 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ''आजादी के बाद भी हमें वही इतिहास पढ़ाया गया जिसको गुलामी के कालखंड में साजिशन रचा गया। आजादी के बाद आवश्यकता थी कि गुलामी के एजेंडे को बदला जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ।''
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि अब देश गुलामी की मानसिकता को छोड़ अपनी विरासत पर गर्व करने के भाव से भरा हुआ है। आज भारत न सिर्फ अपनी सांस्कृतिक विविधता को मना रहा है बल्कि अपनी संस्कृति के ऐतिहासिक नायक-नायिकाओं को गर्व से याद भी कर रहा है। प्रधानमंत्री के भाषण का संदेश स्पष्ट है कि दशकों से इतिहास के नाम पर देश में जो कुछ चलता आया है, वह अब नहीं चलेगा। भारत का इतिहास पश्चिम के नजरिए से नहीं बल्कि भारतीय दृष्टि से लिखा जाएगा। इसमें मुगल और अंग्रेजों वाले काले अध्याय के साथ साथ भारत के गौरवशाली इतिहास की खुशबू भी शामिल होगी।
यह भी पढ़ें: Indian Constitution: क्या भारत के संविधान के प्रावधान विदेशों से लिये गये हैं?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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