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जिन्ना की जीत पर क्यों हो गए गांधी मौन?

पता नहीं किसने किसकी राजनीति और महत्व को खत्म किया, लेकिन भारत पाकिस्तान (अब बांग्लादेश भी) का 1947 से पहले का संयुक्त इतिहास ऐसे दो नायकों के इर्द गिर्द ही घूमकर रह जाता है जिसमें एक का नाम गांधी और दूसरे का जिन्ना था। दोनों एक ही क्षेत्र से आते थे: काठियावाड़, गुजरात। दोनों ने लंदन से वकालत की पढाई की थी।

Jinnah won but why did Mahatma Gandhi remain mute

दोनों स्वतंत्रता आंदोलन में एक ही भावना से आये थे लेकिन काल का प्रवाह कुछ ऐसा बना कि दोनों के नाम दो अलग देशों को आजाद कराने का श्रेय चिपक गया। लेकिन जब इन दोनों का अलग अलग देश आजाद हुआ तब दोनों ही इस आजादी का उत्सव नहीं मना पाये। एक शरीर से इतना बीमार था कि उसकी उखड़ती सांसे उसे देश थामने से ज्यादा शरीर को बचाने के लिए कह रही थी तो दूसरा दिल्ली से दूर बंगाल में उपवास करके "पाप का प्रायश्चित" कर रहा था।

करीब 30 सालों तक भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का "नेतृत्व" करनेवाले मोहनदास गांधी के लिए आजादी इतनी लाशों पर सवार होकर आयी थी कि उनका अहिंसा का सिद्धांत तार तार हो गया था। 30 सालों तक वो जिस अहिंसा के सहारे पूरे देश को एक साथ खड़ा होने के लिए "मजबूर" करते रहे, बंटवारे की हिंसा मानों गिन गिनकर उसका बदला ले रही थी।

ब्रिटिश हुकूमत के अंतिम वॉयसरॉय माउंटबैटन जो "आजादी की योजना" लेकर लंदन से दिल्ली आये थे, उनकी रुचि भारत को स्वतंत्र करने से अधिक भारत के विभाजन में थी। उन मतभेदों को, जिन्हें खत्म करना शासन का काम होता है, उसे माउंटबैटन हवा दे रहे थे। मानों लंदन में बैठे लोग एक साथ कई बातों का हिसाब करना चाहते थे। इसमें सबसे बड़ा हिसाब तो गांधी की वह अहिंसा ही थी जिसके आगे लाठियां, गोलियां भी असहाय हो जाया करती थीं।

मोहनदास गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत आये। शुरुआत के दिनों में वो कांग्रेस के अधिवेशनों में जाते और चुपचाप वहां हो रही कार्रवाई को देखते और सुनते। 1916 के लखनऊ अधिवेशन के बाद कलकत्ता अधिवेशन में भी वो एक आब्जर्वर की ही भूमिका में रहे। लेकिन मानों भारत की जनता उसी मोहनदास का इंतजार कर रही थी जो इस "गुलामी" से उन्हें आजाद करा सकता था।

1917 के चंपारण सत्याग्रह में जब गांधी नीलहों के लिए जाकर खड़े हुए तब तक कांग्रेस में ही कोई उनको ढंग से नहीं जानता था। डॉ राजेन्द्र प्रसाद लिखते हैं कि दोनों अधिवेशनों में वो मेरे पास ही बैठे थे। बिल्कुल चुपचाप वो सब कुछ सुन रहे थे, लेकिन बिहार के राजकुमार शुक्ला ने पता नहीं उनमें ऐसा क्या देख लिया था कि दोनों अधिवेशनों में वो उनके पास पहुंचे और कहा कि "सिर्फ आप ही हैं जो हमें नील की खेती से आजादी दिला सकते हैं।"

यह वह समय था जब जिन्ना कांग्रेस के भीतर एक प्रखर राष्ट्रवादी वकील हुआ करते थे। गांधी ने जिन गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु माना, जिन्ना उनके साथ उठते बैठते थे। 1916 के कांग्रेस के जिस लखनऊ अधिवेशन में गांधी दर्शक बनकर पहुंचे थे उसी अधिवेशन में जिन्ना को कांग्रेस का सर्वमान्य नेता माना गया था। बहुत सारे इतिहासकार और विद्वान लोग ये मानते हैं कि कांग्रेस में गांधी के उभार ने जिन्ना को कोने में धकेल दिया। वरना उससे पहले वो कांग्रेस में हिन्दू मुस्लिम एकता के पैरोकार समझे जाते थे। 1906 में उन्होंने मुस्लिम लीग के गठन का विरोध किया।

इसी साल आगा खान जब लार्ड मिन्टो से मिले और बहुसंख्यक हिन्दुओं से मुस्लिम हितों की रक्षा की मांग की तो जिन्ना ने इसका विरोध करते हुए गुजरात के एक अखबार में लेख लिखा। संभवत: जिन्ना तब तक ये मानते थे कि ब्रिटिश हुकूमत से भारत की आजादी के लिए हिन्दू मुस्लिम एकता जरूरी है। लेकिन अपने विस्तार में गांधी ने जिन्ना की ये सोच भी अपने नाम कर ली।

इधर भारत में गांधी की छाया जैसे जैसे विशाल होती जा रही थी, उधर जिन्ना लगातार सिमटते जा रहे थे। सेकुलर छवि वाला एक काबिल वकील ऐसा अप्रासंगिक हुआ कि भारत छोड़कर लंदन जाकर बस गया। पूरी कांग्रेस गांधी के इर्दगिर्द इकट्ठा हो गयी थी और कांग्रेस हिन्दू मुस्लिम एकता की नयी पैरोकार। इस बीच जिन्ना ने बंबई से मुस्लिम सीट पर चुनाव भी लड़ा और 1927 में मुस्लिम लीग के करीब भी आये। स्वाभाविक है वो अपने लिए कोई बेहतर राजनीतिक भविष्य की तलाश कर रहे थे लेकिन वह भविष्य इतनी आसानी से कहीं दिख नहीं रहा था। इस बीच 1930 के बाद अल्लामा इकबाल उन्हें लगातार प्रेरित करने लगे कि उन्हें क्यों अलग इस्लामिक देश की मांग करनी चाहिए।

मुस्लिम लीग या अलग इस्लामिक राज्य की चाहत रखने वाले लोगों को जिन्ना बहुत प्रिय रहे हों, ऐसा भी नहीं था। जिन्ना की जीवनशैली और सेकुलर सोच के बारे में सब जानते ही थे। लेकिन इनकी मजबूरी यह थी कि इन्हें अलग इस्लामिक राज्य या देश के लिए कोई लीडर नहीं बल्कि एक अच्छा वकील चाहिए था, जो अच्छी अंग्रेजी बोलता हो, लंदन के तौर तरीकों को जानता हो और उनका केस वायसरॉय के कोर्ट में बहुत कॉन्फिडेन्स के साथ लड़ सकता हो।

निश्चय ही मोहम्मद अली जिन्ना से बेहतर दूसरा वकील हो नहीं सकता था। इसलिए मुस्लिम लीग हो या अल्लामा इकबाल दोनों जिन्ना के उसी जिद्दी स्वभाव में अलग पाकिस्तान बिठा देना चाहते थे जिसके लिए जिन्ना किसी भी हद तक जा सकते हों। हुआ भी यही। एक बार जिन्ना ने पाकिस्तान की जिद्द पकड़ी तो उखड़ती सांसों के बाद भी नहीं छोड़ी। उनके पास पाकिस्तान को लेकर कोई कार्ययोजना नहीं थी। एक अलग इस्लामिक मुल्क का कोई ब्लूप्रिंट नहीं था। जो कुछ थोड़े बहुत तथ्य और कथ्य थे वो भी कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता और मुस्लिम लीग मुहैया कराती थी।

लेकिन पाकिस्तान के लिए जिन्ना की जिद्द ऐसी थी कि उन्होंने इसके लिए डॉयरेक्ट एक्शन से भी अपने आप को पीछे नहीं रखा। 1941 में जब पाकिस्तान के समर्थन में वो कानपुर में मुसलमानों से बात करने गये तो उनकी बेमतलब सी मांग का विरोध हुआ। मुसलमानों ने कहा कि आप जहां पाकिस्तान बनाने की बात कर रहे हैं वहां तो पहले से मुसलमान बहुसंख्यक है। फिर इस मांग का क्या तुक है? तब जिन्ना ने कहा था कि "मैं बाकी के 2 करोड़ मुसलमानों को शहीद करवा दूंगा ताकि 7 करोड़ मुसलमानों को आजाद करा सकूं।"

साफ है, जिन्ना एक जीवित जिन्न का रूप ले चुके थे। उन्हें किसी भी कीमत पर पाकिस्तान चाहिए था। भले ही इसकी कोई भी कीमत मानवता को चुकानी पड़ती। कांग्रेस का भी एक बड़ा धड़ा इसके लिए तैयार हो गया था। गांधी अकेला इन्सान था जो थका हारा इस बंटवारे के खिलाफ रहा लेकिन उसकी कौन सुनता? इधर, नेहरू और पटेल भी बंटवारे के लिए मानसिक रूप से तैयार थे और उधर जिन्ना कायद-ए-आजम होने को बेताब।

बंटवारे की घोषणा के बाद मचे कत्लेआम ने कठोर हृदय जिन्ना को जरूर थोड़ा मर्माहत किया होगा इसलिए उन्होंने पाकिस्तानी संविधान सभा के अपने पहले भाषण में सबको अपनी अपनी मान्यता के अनुसार मंदिर, मस्जिद और चर्च में जाने की आजादी वाली बात कही लेकिन यह बहुत देर से कही गयी बात थी। तब तक हर स्वार्थी गिरोह अपने अपने हिस्से पर दावा कर चुका था।

आज 75 साल बाद ही नहीं, आजादी के सौ साल बाद भी और डेढ सौ साल बाद भी जब जब 1947 का उत्सव मनाया जाएगा, सब कहीं न कहीं अपने आप को स्थिर कर चुके होंगे लेकिन तब भी गांधी किसी नोआखली में भटकता ही पाया जाएगा। यही एक ऐसा व्यक्ति था जो 30 साल के स्वतंत्रता संघर्ष के बाद भी 15 अगस्त 1947 को नहीं समझ पाया कि वह करे तो क्या करे? वह आजादी की खुशियां मनाये या भारत को बांटकर जो पाप किया गया है, उस पाप का प्रायश्चित करे। उसकी अहिंसा को अंग्रेजों ने अपनी शातिर चालों से जरूर हरा दिया था लेकिन अभी भी उसके पास एक हथियार था। उपवास और मौन। हर 15 अगस्त को गांधी उपवास पर चला जाता है। खून से लथपथ होकर लोगों के बीच पहुंची आजादी पर गांधी मौन धारण कर लेता है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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