Govt vs Judiciary: सरकार और सुप्रीम कोर्ट में शीत युद्ध की जगह अब वास्तविक युद्ध
पहले भी सरकारों एवं न्यायपालिका के बीच टकराव हुए हैं, लेकिन इस बार सरकार टकराव टालने के मूड में नहीं है। ताजा टकराव की शुरुआत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सुप्रीमकोर्ट के दखल से हुई है।

Govt vs Judiciary: सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार में चल रहा शीत युद्ध अब सतह पर आ गया है। वाजपेयी सरकार के समय भी जब ऐसा ही टकराव शुरू हुआ था, तो वाजपेयी ने टकराव से बचने के लिए अपने क़ानून मंत्री राम जेठमलानी को हटा दिया था। लेकिन इस बार सरकार टकराव टालने के मूड में नहीं है।

ऐसा लगता है नरेंद्र मोदी ने क़ानून मंत्री किरिन रिजीजू को खुली छूट दी हुई है। ताजा टकराव की शुरुआत भले ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सुप्रीमकोर्ट के दखल से हुई है, लेकिन अब यह जा कर खत्म होगा कोलेजियम सिस्टम खत्म होने से।
24 नवंबर को सुप्रीमकोर्ट में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर बहस चल रही थी। अटार्नी जनरल ने कोर्ट को चेता दिया था कि वह कार्यपालिका के काम में दखल न दे। लेकिन बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने चयन प्रक्रिया में चीफ जस्टिस को शामिल करने की बात कह कर सरकार के साथ टकराव का रास्ता अपना लिया था।
अगले ही दिन 25 नवंबर को कानून मंत्री किरन रिजीजू ने एक कार्यक्रम में कॉलेजियम सिस्टम पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि संविधान में कोलिजियम सिस्टम का कहीं कोई जिक्र नहीं है, यह संविधान में एलियन की तरह है, जिसे सुप्रीमकोर्ट ने खुद ही बना लिया है। भारत की जनता का इस कोलिजियम सिस्टम को कोई समर्थन नहीं है। इन तीखे शब्दों के बाद उसी दिन शाम को उन्होंने कोलिजियम सिस्टम को ठुकराते हुए, उसकी तरफ से भेजी गई जजों की नियुक्ति की पेंडिंग पड़ी 20 फाईलें बिना साईन किए बेरंग लौटा दीं।
मोदी सरकार कोलिजियम सिस्टम को न्यायपालिका में परिवारवाद को बढावा देने वाला सिस्टम बताती रही है। सरकार ने जिन 20 जजों की नियुक्ति की फाईलें लौटाई हैं, उनमें से एक फाईल सुप्रीमकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बी.एन. किरपाल के बेटे सौरभ किरपाल की भी फाईल है।
इससे पहले भी ऐसी अनेक नियुक्तियां हुई हैं, जो जजों के परिवारों से संबंधित थीं। सरकार कहती रही है कि कोलिजियम सिस्टम में जज जजों के नाते रिश्तेदारों को ही जज बना रहे हैं। सौरभ किरपाल का केस इस का प्रमाण है, दिल्ली हाईकोर्ट का कोलिजियम 2017 से बार बार सौरभ किरपाल को जज बनाने की सिफारिश भेज रहा था।
सुप्रीमकोर्ट के कोलिजियम ने इसे 2021 में केंद्र सरकार को भेज दिया, सरकार ने दूसरी बार उसकी नियुक्ति की फाईल लौटाई है। सौरभ किरपाल के साथ जुडा एक अन्य विवादास्पद मामला भी है कि वह खुलेआम कह चुके हैं कि वह समलैंगिक हैं। इन 20 फाईलों में से 9 फाईलें ऐसी थीं, जिन्हें सरकार पहले ही वापस लौटा चुकी थी। यह सीधे सीधे सरकार और सुप्रीम कोर्ट में टकराव की स्थिति है, क्योंकि कोलिजियम सिस्टम में सुप्रीमकोर्ट ने कहा हुआ है कि सरकार एक बार ही फाईल वापस लौटा सकती है।
असल में चीफ जस्टिस ने एक कार्यक्रम में कहा था कि सरकार फाइलों को मंजूरी देने में देरी करती है, इस पर भी किरन रिजीजू ने सख्त टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, "कॉलेजियम यह नहीं कह सकता कि सरकार उसकी तरफ से भेजे गए हर नाम को तुरंत मंजूरी दे, अगर ऐसा है तो उन्हें खुद ही नियुक्ति कर लेनी चाहिए।"
सुप्रीमकोर्ट और मोदी सरकार में 2015 से कोल्ड वार चल रही थी, जब सुप्रीमकोर्ट ने जजों की नियुक्तियों के लिए संसद से पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क़ानून को नामंजूर करते हुए रद्द कर दिया था। अब यह टकराव खुल कर सामने आ गया है, क्योंकि सरकार ने न्यायिक नियुक्ति आयोग को फिर से लागू करने का मन बना लिया है, सरकार इस आयोग को कैसे पुनर्जीवित करेगी, यह आने वाला समय ही बताएगा।
किरन रिजीजू ने 25 नवंबर को कहा था कि जब तक जजों की नियुक्तियों का नया सिस्टम नहीं बनता, सरकार कोलिजियम सिस्टम का सम्मान करेगी, लेकिन इसके ठीक उलट उसी दिन उन्होंने कोलिजियम को 9 फाईलें दुबारा लौटा दीं। जजों की नियुक्ति के मसले पर सुनवाई कर रही जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली बेंच को 28 नवंबर तक पता ही नहीं था कि सरकार फाईलें वापस लौटा चुकी है।
28 नवंबर को इस बेंच ने सरकार को धमकी भरे लहजे में कहा कि सरकार कोलिजियम सिस्टम को फेल करना चाहती है, अगर सरकार ने फाईलों पर समय सीमा में फैसला नहीं लिया तो कोर्ट को न्यायिक आदेश देना पड़ सकता है।
जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एएस ओका की बेंच ने 28 नवंबर को यह भी कहा कि केंद्र राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क़ानून को नामंजूर किए जाने से नाखुश है, इसलिए वह जजों की नियुक्तियों पर कुंडली मार कर बैठी है।
इसके बाद जजों ने धमकी दी कि सरकार को सुप्रीमकोर्ट की तरफ से तय क़ानून को मानना पड़ेगा। एक बार कॉलेजियम ने किसी नाम का सुझाव दिया तो बात वहीं खत्म हो जाती है। ऐसी कोई स्थिति नहीं बननी चाहिए जहां कोलिजियम नाम सुझा रहा हो और सरकार उन नामों पर कुंडली मारकर बैठ जाए। ऐसा करने से पूरा सिस्टम फ्रस्ट्रेट होता है।
कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद विधि मंत्रालय ने यह खबर मीडिया को लीक कर दी कि मंत्रालय 25 नवंबर को ही 20 सिफारिशों की फाईलें लौटा चुका है, जिनमें 9 फाईलें दूसरी बात लौटाई गई हैं। अब पलटवार करने की बारी कोलिजियम की है, देखते हैं, वह क्या करता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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