West Bengal SIR: 'क्या सुप्रीम कोर्ट के पास सिर्फ बंगाल के ही केस हैं' SIR मामले पर क्यों भड़के CJI?
West Bengal SIR Case (Supreme Court): पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Special Intensive Revision - SIR) प्रक्रिया के बीच वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सोमवार (09 मार्च) सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे का फिर जिक्र हुआ तो माहौल कुछ गर्म हो गया। सुनवाई के दौरान एक नई याचिका का हवाला दिया गया, जिसमें मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया गया था।
इसी दौरान नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA से जुड़े आवेदकों का मामला भी सामने आया। यह सुनते ही चीफ जस्टिस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पास पश्चिम बंगाल के अलावा कोई और काम नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन मतदाताओं की नई याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया है जिनके नाम चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। इस मामले की सुनवाई मंगलवार (10 मार्च) को होने वाली है और इसे चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? (Supreme Court Hearing)
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की। वरिष्ठ अधिवक्ता मनेका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे पहले मतदान कर चुके मतदाता हैं, लेकिन अब उनके दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं।
इस पर अदालत ने कहा कि सामान्य तौर पर न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ सीधे अपील सुनना आसान नहीं होता। हालांकि वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि इस मामले में अपील सुनना संभव है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका पर मंगलवार को विस्तृत सुनवाई की जाएगी।
80 लाख दावों और आपत्तियों का मामला (Electoral Roll Deletion)
दरअसल पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाने या आपत्तियां दर्ज होने के मामले सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी को इस प्रक्रिया को संभालने के लिए बड़ा फैसला लिया था। अदालत ने 250 जिला जजों के अलावा सिविल जजों की तैनाती की अनुमति दी थी। इसके साथ ही झारखंड और ओडिशा से भी न्यायिक अधिकारियों की मदद लेने की मंजूरी दी गई थी ताकि बड़ी संख्या में लंबित मामलों को जल्दी निपटाया जा सके।
अदालत के सामने यह जानकारी रखी गई कि लगभग 80 लाख दावे और आपत्तियां चुनाव आयोग के सामने आई हैं। अगर हर न्यायिक अधिकारी रोज करीब 250 मामलों को भी देखे तो पूरी प्रक्रिया खत्म होने में करीब 80 दिन लग सकते हैं।
क्यों हटाए जा रहे हैं नाम? (Logical Discrepancy Issue)
चुनाव आयोग के मुताबिक कई मामलों में मतदाताओं के रिकॉर्ड में तार्किक विसंगतियां (Logical Discrepancies) पाई गई हैं। उदाहरण के तौर पर 2002 की मतदाता सूची के साथ परिवार के संबंधों को जोड़ने में समस्या सामने आई।
कुछ मामलों में माता-पिता के नाम मेल नहीं खा रहे हैं, जबकि कई जगह वोटर और उसके माता-पिता के बीच उम्र का अंतर 15 साल से कम या 50 साल से ज्यादा पाया गया है। ऐसी स्थिति में कई मतदाताओं को 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' और 'अनमैप्ड कैटेगरी' में रखा गया है।
नोटिस जलाने के आरोप भी
इस विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने 9 फरवरी को यह भी साफ किया था कि SIR प्रक्रिया में किसी तरह की बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को निर्देश दिया था कि चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए नोटिस जलाने के आरोपों पर हलफनामा दाखिल करें।
पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया की अंतिम समयसीमा 28 फरवरी तय की गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से यह तय होगा कि मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को राहत मिलती है या नहीं।
FAQs (West Bengal SIR Case Update)
1. पश्चिम बंगाल में SIR क्या है?
SIR यानी Special Intensive Revision एक प्रक्रिया है जिसमें चुनाव आयोग मतदाता सूची की व्यापक जांच और संशोधन करता है।
2. सुप्रीम कोर्ट में मामला क्यों पहुंचा?
कई लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद प्रभावित मतदाताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है।
3. इस मामले की सुनवाई कौन कर रहा है?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ इस याचिका पर सुनवाई कर रही है।
4. कितने दावे और आपत्तियां सामने आई हैं?
चुनाव आयोग के अनुसार लगभग 80 लाख दावे और आपत्तियां दर्ज हुई हैं।
5. वोटर लिस्ट से नाम हटाने की वजह क्या बताई गई है?
कई मामलों में दस्तावेजों में गड़बड़ी, उम्र के अंतर में विसंगति और परिवारिक विवरण में मेल न खाने जैसी समस्याएं सामने आई हैं।
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