बुद्ध और अंबेडकर का नाम, माओवादियों का अलगाववादी काम
भारत की राजधानी, दिल्ली में पिछले दिनों एक चौंकानेवाली घटना हुई। सैकड़ों की संख्या वाला जनसमूह एक स्थान पर एकत्रित हुआ और उन्होंने भगवान बुद्ध और डॉ. भीम राव अंबेडकर के नाम पर हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने की प्रतिज्ञा ली। इस दौरान हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं और मान्यताओं को भी त्यागने की कसमें खाई गयी।

इस कार्यक्रम का संचालन मंच पर भगवा रंग के कपडे पहने राजरत्न अंबेडकर कर रहे थे जोकि बाबासाहब भीमराव अंबेडकर के परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। राजरत्न राजनैतिक रूप से बेहद सक्रिय हैं और 2014 में महाराष्ट्र की नांदेड़ सीट से लोकसभा का असफल चुनाव भी लड़ चुके है। यह चुनाव उन्होंने 'बहुजन मुक्ति पार्टी' नाम के एक राजनैतिक दल के टिकट पर लड़ा था। इसी कार्यक्रम में आम आदमी पार्टी के विधायक और दिल्ली सरकार में मंत्री राजेंद्र पाल गौतम भी मंच पर मौजूद थे।
माओवादी बौद्ध
बहुजन मुक्ति पार्टी ने साल 2014 में एक मुस्लिम अधिवेशन का आयोजन किया था जिसमें जमियत इस्लामी-ए-हिन्द सहित मूल निवासी मुस्लिम मंच नाम के संगठन भी शामिल हुए थे। जमियत का प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) से नाता जगजाहिर है जबकि मूलनिवासी मुस्लिम मंच (Mulnivasi Muslim Manch) ने कई बार सिमी पर प्रतिबन्ध हटाने की वकालत की है।
दिसंबर 2017 में 'एलगार (एल्गार) परिषद' नाम से पुणे में एक सार्वजानिक सभा का आयोजन किया गया था। भीमा कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह पर आयोजित इस सभा के बाद वहां दंगे भड़क गए थे। नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (NIA) की छानबीन में इस सभा के पीछे प्रतिबंधित माओवादी संगठनों का हाथ सामने आया।
अतः एनआईए ने स्टेन स्वामी, वरवरा राव और सुधा भारद्वाज जैसे अन्य कई माओवादी संगठनों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। मूलनिवासी मुस्लिम मंच भी एलगार परिषद के प्रमुख आयोजकों में से एक था। इसका राष्ट्रीय अध्यक्ष अंजुम ईमानदार 2014 में पुणे की शिवाजीनगर विधानसभा से बहुजन मुक्ति पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ चुका है।
कुछ दिनों पहले जब पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के आतंकी संबंधों की खोजबीन के सन्दर्भ में एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी हुई थी तो राजरत्न अंबेडकर ने केंद्र सरकार के इस कदम का विरोध जताया था। बाद में भारत सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर पीएफआई को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में डाल दिया था।
इससे साबित होता है कि दिल्ली में जो जनसमूह एकत्रित हुआ उसे इस बात का बिलकुल अंदाजा नहीं था कि मंच पर जो लोग उन्हें धर्म परिवर्तन की शपथ दिला रहे थे, उनके सम्बन्ध प्रतिबंधित आतंकी एवं माओवादी संगठनों से है। अब बात करते हैं उस बौद्ध धर्म की जिसके नाम पर देवी देवताओं को न मानने की यहां कसम खायी गयी।
बुद्ध और भारतीय सनातन संस्कृति
भारत की सनातन सांस्कृतिक यात्रा में बौद्ध धर्म एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। अपने जीवनकाल में उन्होंने जो उपदेश दिए, उनका अनुसरण करने वाले उनके अनुयाइयों ने बौद्ध मत की स्थापना की। इसी दौरान समकालीन ग्रीक शासकों ने सिन्धु नदी के पार रहने वाले लोगों को 'हिन्दू' शब्द से संबोधित करना शुरू किया। इस प्रकार अगली कई सदियों तक यह हिन्दू देश मानव जाति के समग्र महानतम विचारों के साथ फलता-फूलता रहा।
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जब भारत पर अलेक्जेंडर (सिकंदर) ने 326 ईसा पूर्व में हमला किया तो उस दौरान भारत में शक्तिशाली सम्राट चंदगुप्त का शासन था। सिकंदर का यह भारत अभियान असफल रहा लेकिन उसके बाद कई ग्रीक दार्शनिकों ने भारत की यात्रा की। इसमें सबसे महत्वपूर्ण नाम मेगस्थनीज का था।
अपनी पुस्तक 'इंडिका' में वह सनातन धर्म और उसके दर्शन के सन्दर्भ में लिखता है, "इन लोगों का साहित्य भगवान के समान है। वे भाषण नहीं बल्कि तर्कों का प्रवचन करते हैं, जिससे ज्ञान के छिपे रहस्यों को समझा जाता है।"
भारत की इसी ज्ञान परंपरा में भगवान बुद्ध भी शामिल हो गए। किसी भी प्रकार का कोई विभाजन नहीं था। इसी सांस्कृतिक समग्रता के दीवाने सिर्फ ग्रीक ही नहीं बल्कि दुनियाभर के साम्राज्यों के दार्शनिक थे। कई सदियों के बाद, चीनी बौद्ध संत फाहियान 399 से 414 ईसवीं तक भारत में रहे। इस दौर में भारत पर गुप्त साम्राज्य के महान सम्राटों का शासन था और वे सभी वैष्णव दर्शन का अनुसरण करते थे।
फाहियान की भारत यात्रा से जुड़े एक संस्मरण का उल्लेख राधाकुमुद मुखर्जी की पुस्तक 'द गुप्त एम्पायर' में इस प्रकार मिलता है, "यहाँ के लोग धनवान है। एक-दूसरे के धर्म यानि ड्यूटी (duty) के प्रति उनके हृदय में अनुकरण की भावना रहती है। जब पांच मंजिला ऊँचे चार पहियों वाले रथ का जुलूस निकलता है तो बौद्धों को ब्राह्मणों द्वारा आमंत्रित किया जाता है।"
फाहियान ने संभवतः पुरी की जगन्नाथ यात्रा का वर्णन किया है। इसके बाद एक अन्य चीनी दार्शनिक ह्वेन त्सांग सातवीं शताब्दी में भारत आया तो उसने भी अपनी यात्रा से जुड़े कई संस्मरणों को लिपिबद्ध किया। प्रसिद्द इतिहासकार आरसी मजूमदार साल 1952 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'एंसियंट इंडिया' में ह्वेन त्सांग के नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े एक संस्मरण का जिक्र इस प्रकार करते है, "नालंदा जैसे हजारों संस्थान भारत में थे लेकिन नालंदा जैसा वैभव किसी के पास नहीं है। वहां दस हजार विद्यार्थी न सिर्फ बौद्ध साहित्य बल्कि वेद, तर्क, व्याकरण, चिकित्सा, सांख्य दर्शन इत्यादि का भी अध्ययन कर रहे है। प्रश्नोत्तर के लिए एक दिन भी कम पड़ जाता है। सुबह से लेकर रात तक वे सभी शास्त्रार्थ में व्यस्त रहते है; बूढ़े और जवान परस्पर एक दूसरे की मदद करते हैं।"
यह भारत की वास्तविकता है जोकि कई सदियों से निरंतर चली आ रही थी। जहाँ सम्राटों के अलग दर्शन के बावजूद बौद्ध दर्शन को लेकर किसी के मन में कोई राग-द्वेष नहीं था। एक तर्क आधारित व्यवस्थित समाज था। इन सभी तथ्यों का उल्लेख किसी भारतीय ने नहीं बल्कि विदेशी दार्शनिकों ने किया है।
अंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया?
दिल्ली की इस सभा में मंच पर मौजूद सभी नेतागण - राजरत्न अंबेडकर और राजेंद्र पाल गौतम बार-बार बाबासाहब अंबेडकर का नाम लेकर लोगों को अपने विश्वास में लेते हुए दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कभी भारत के संविधान का तो कभी बाबासाहब अंबेडकर द्वारा कही गयी हिन्दू धर्म से जुड़ी बुराइयों का हवाला दिया। मगर अपने भाषण देने की कला में ऊँची आवाज का समावेश कर उन सभी इस तथ्य को एकदम छुपा दिया कि बाबासाहब ने बौद्ध धर्म को क्यों अपनाया था?
राजरत्न अंबेडकर, 'द बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ़ इंडिया' नाम की एक संस्था के भी राष्ट्रीय अध्यक्ष है। भारतीय बौद्ध महासभा के नाम से भी पहचानी जाने वाली इस संस्था की स्थापना बाबासाहब अंबेडकर ने 4 मई 1955 को मुंबई में की थी। तब से अभी तक यह संस्था बाबासाहब के परिवारजनों के ही नियंत्रण में है। संस्था की वेबसाइट पर बाबासाहब अंबेडकर की तस्वीर के साथ इसके उद्देश्य लिखे गए हैं, जिसके अनुसार इस संस्था का मुख्य काम बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना है।
बाबासाहब अंबेडकर पर सबसे प्रमाणित शोधपूर्ण अध्ययन धनंजय कीर ने किया है। इन्हें साल 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार में पद्म भूषण सम्मान दिया गया था। वे अपनी पुस्तक 'बीआर अंबेडकर : लाइफ एंड मिशन' में लिखते है, "साल 1954 में अंबेडकर बुद्धिस्ट वर्ल्ड कांफ्रेंस में हिस्सा लेने रंगून गए। उनके साथ उनकी पत्नी और निजी सचिव भी मौजूद थे। उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं था फिर भी उन्होंने कांफ्रेंस को संबोधित किया। भाषण के दौरान उनके गालों पर आंसू स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे।"
डॉ अंबेडकर की यह पीड़ा बौद्ध मत के विघटन को लेकर थी। उन्होंने इसी सभा में बर्मा (अब म्यांमार) और सीलोन (अब श्रीलंका) के बौद्धों को कहा कि वे अन्य देशों में बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार करे। उन्होंने आगे कहा कि भारत में बौद्ध मत को प्रचारित करने का जिम्मा मैं उठाऊंगा।
इसी भाषण में उन्होंने भारत के संविधान में पाली भाषा का प्रावधान, राष्ट्रपति भवन में बौद्ध सूक्तियां को लगाना, भारत में अशोक चक्र को अधिकारिक दर्जा देना और बुद्ध जयंती पर सरकारी अवकाश जैसे कार्यों का भी उल्लेख किया।
अगले साल उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया और भारत में बौद्ध मत को फिर से पुनर्जीवित करने के प्रयास शुरू कर दिए। इस क्रम में उन्हें सबसे पहला सहयोग मैसूर के महाराजा का मिला जोकि हिन्दू धर्म का अनुसरण करते थे। फिर जापान के एक अध्येता डॉ फ्लिक्स वलई का समर्थन मिला। दोनों मिलकर बौद्ध दर्शन पर शोध के लिए भारत और जापान के सहयोग से एक अध्ययन केंद्र खोलना चाहते थे। इसमें उन्हें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राधाकृष्णन का पूरा समर्थन प्राप्त हुआ।
उनके इस कदम का वीर सावरकर ने सटीक रूप से विश्लेषण किया है जिसे धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक में इस प्रकार लिखा है, "डॉ अंबेडकर का यह कदम हिन्दुइज्म के अंतर्गत ही था। बस अब अंबेडकर हिंदू से बौद्ध हो गए और उन्होंने हिंदुत्व के अंतर्गत गैर-वैदिक परंपरा के भारतीय धर्म को अपनाया है।"
डॉ अंबेडकर और कम्युमिज्म
इसी दौरान यानि 1956 में बाबासाहब अंबेडकर ने 'बुद्धा एंड बुद्धिज्म' नाम से एक पुस्तक लिखी। वे इसके अलावा दो अन्य पुस्तकों - 'रेवोलुशन एंड काउंटर रेवोलुशन इन इंडिया' और 'बुद्धा एंड कार्ल मार्क्स' पर 1951 से काम कर रहे थे लेकिन यह दोनों ही पुस्तक अधूरी रह गयी और 6 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया। हालाँकि, अपने निधन से पहले मई 1956 में बीबीसी के साथ एक बातचीत में उन्होंने समकालीन राजनैतिक स्थिति पर खुलकर अपने विचार रखे।
'साम्यवादी (कम्युनिज्म एवं वामपंथी) विचारों और कार्ल मार्क्स का एकमात्र उत्तर बौद्ध दर्शन के पास है', ऐसा कहते हुए बाबासाहब अंबेडकर ने बीबीसी को बताया, "बौद्ध देशों ने साम्यवाद को अपना लिया है जबकि उन्हें साम्यवाद की सच्चाई नहीं पता है। साम्यवाद का सम्बन्ध रूस से है जोकि खूनी संघर्ष में विश्वास रखता है। अब बिना खून-खराबे वाली क्रांति के लिए बौद्ध कम्युनिज्म लाना होगा। दक्षिण-पूर्वी देशों को रूस के इस षड्यंत्र से बचकर चलना होगा। इसलिए बुद्ध के विचारों को राजनैतिक स्वरुप देना पड़ेगा।"
वास्तव में, साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव को लेकर बाबासाहब अंबेडकर बेहद चिंतित थे। इसके अलावा उनकी चिंताएं और अधिक बढ़ गयी जब उन्होंने देखा कि जिन दक्षिण-पूर्व के देशों ने एक ज़माने में बौद्ध दर्शन को अपने दैनिक जीवन हिस्सा बनाया वे सभी अब साम्यवाद के कुचक्र में फंसकर रह गए है। ऐसा ही भारत में हो रहा था। वे प्रधानमंत्री नेहरू की सोवियत रूस के प्रति झुकाव की नीति के आलोचक थे। इन्ही कारणों से वे बौद्ध दर्शन का राजनैतिक प्रयोग करना चाहते थे जिससे भारतीय विचारों की ज्ञान-परंपरा को फिर से पुनर्जीवित किया जा सके।
मगर आज बाबासाहब अंबेडकर के अनुयायी वामपंथ की उसी खूनी क्रांति के स्वरुप - माओवाद और उसके जिहादी गठबंधन के पुरजोर समर्थक बन बैठे है, जिसका डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन में हमेशा विरोध किया था।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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