Kanshi Ram: दलित राजनीति का सूत्रपात करने वाले दिग्गज नेता की दास्तान
9 अक्टूबर को मान्यवर कांशीराम का परिनिर्वाण दिवस है। इसी दिन 2006 में लंबी बीमारी के बाद मान्यवर कांशीराम का निधन हो गया था। डॉ भीमराव अंबेडकर के बाद उत्तर भारत में अगर कोई दूसरा बड़ा दलित नेता हुआ तो वह कांशीराम ही थे।

कांशीराम दलित शक्ति के प्रस्फुटन, राजनीतिक उन्नयन और सत्तारोहण के प्रतीक बने। कांशीराम ने अपने जीवन में दलितों को संगठित किया और समाज के दलित और पिछड़े वर्ग के लिए एक ऐसी जमीन तैयार की जहां वह अपने हित के लिए लड़ सके।
आजीवन अविवाहित रहे कांशीराम ने पूरा जीवन पिछड़े वर्ग के लोगों को एक मजबूत और संगठित आवाज देने के लिए समर्पित किया तथा बहुजन समाजपार्टी पार्टी की स्थापना की।
बामसेफ और डीएस-4 की स्थापना
कांशीराम स्नातक होने के बाद डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ), पुणे में नौकरी करने लगे थे। इसी दौरान अंबेडकर जयंती पर छुट्टी न मिलने को लेकर कांशीराम का अधिकारियों से विवाद हो गया और उन्होंने ऐलान किया कि 'बाबा साहब आंबेडकर की जयंती पर छुट्टी न देने वाले की जब तक छुट्टी न कर दूं, तब तक चैन से नहीं बैठ सकता।'
इस घटना के बाद कांशीराम ने दलितों के लिए लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया। 1971 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। अपने एक सहकर्मी के साथ मिलकर अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक कर्मचारी कल्याण संस्था की स्थापना की। हालांकि इस संस्था का गठन पीड़ित समाज के कर्मचारियों का शोषण रोकने हेतु किया गया था, लेकिन इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था लोगों को जाति प्रथा के बारे में जागृत करना। धीरे-धीरे इस संस्था से अधिक से अधिक लोग जुड़ते गए जिससे यह काफी सफल रही।
इसके बाद कांशीराम ने अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर बैकवार्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉई फेडरेशन की स्थापना की जिसे संक्षेप में बामसेफ कहा जाता है। यह संस्था 1980 तक दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का विशाल संघ बन चुका था।
बामसेफ ने कांशीराम का आर्थिक आधार मजबूत किया। इसके पश्चात कांशीराम ने अपना प्रसार तंत्र मजबूत किया और लोगों को जाति प्रथा, भारत में इसकी उपज और अंबेडकर के विचारों के बारे में जागरूक किया।
कांशीराम जहां-जहां गए, उन्होंने अपनी बात का प्रचार किया और उन्हें बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ। सन् 1980 में उन्होंने 'अंबेडकर मेला' नाम से पद यात्रा शुरू की। इसमें अंबेडकर के जीवन और उनके विचारों को चित्रों और कहानी के माध्यम से दर्शाया गया।
दलितों में बढ़ रहे प्रभाव से उत्साहित कांशीराम ने 1981 में डीएस-4 अर्थात 'दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन किया। इसका नारा था 'ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-4'।
डीएस-4 के जरिए कांशीराम न सिर्फ दलितों बल्कि अल्पसंख्यकों के बीच भी एक तरह की गोलबंदी कर रहे थे। डीएस-4 के तहत ही उन्होंने जनसंपर्क अभियान चलाया। साइकिल मार्च निकाला, जिसने सात राज्यों में लगभग 3,000 किलोमीटर की यात्रा की।
अगड़ी जाति के खिलाफ नारों के जरिए वे दलितों, पिछड़ों को लामबंद करने का प्रयास करते रहे। यह राजनीतिक संगठन न होने के बाद भी कांशीराम ने हरियाणा में 1982 में विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े किए। इस चुनाव में कांशीराम के संगठन को 57,588 मत मिले। इस प्रयोग ने कांशीराम को बड़ी राजनैतिक पारी खेलने की ताकत दी।
पूना पैक्ट के पचासवें वर्ष में राजनीतिक अभियान
कांशराम ने पूना पैक्ट के 50 वर्ष पूरे होने पर 24 सितंबर 1982 से अपने राजनीतिक अभियान की शुरूआत की। इस वर्ष देश के चारों कोनो से पूना पैक्ट धिक्कार रैली निकाली गई, जो पूना में जा कर समाप्त हुई। इस रैली ने दलित वर्गो में ब्राम्हणवाद के खिलाफ उस चेतना को उभार दिया, जिसे समय और तात्कालिक राजनीतिक दबावों में दबा दिया था।
कांशीराम अपने अभियान से घोर दलितवाद उभारना चाहते थे। कांशीराम का मकसद कांग्रेस के खिलाफ दलित वर्ग में गुस्सा उतारना था, जिससे कांग्रेस का दलित वोट बैक खत्म हो सके। उनका राजनीतिक मकसद कांग्रेस को कमजोर कर रिपब्लिकन पार्टी का विकल्प खड़ा करना था, जिसमें वह सफल हुए। कांशीराम का मानना था कि 'राजनीतिक सत्ता ऐसी चाभी है जिससे सभी ताले खोले जा सकते हैं'।
कांशीराम ने सत्ता की राजनीति की और कदम बढ़ाते हुए 1984 में बसपा का गठन किया। बसपा को चुनाव चिन्ह आबंटित होने से पहले कांशीराम ने 1984 में अविभाजित मध्य प्रदेश की जांजगीर-चांपा लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा था। कांशीराम को पहले लोकसभा चुनाव के दौरान इस दलित बाहुल्य सीट से हार का सामना करना पड़ा था। तब बसपा को मान्यता नहीं मिली थी, फिर भी उन्हें 32,135 वोट मिले।
उत्तर प्रदेश में प्रभुत्व वाली समाज व्यवस्था की वजह से कांशीराम के दलित आंदोलन ने पीड़ित दलित वर्गो में आसानी से अपनी जगह बना ली। दलितों के राजनैतिक शून्य को बसपा ने भरा। सामाजिक और राजनीतिक दोनों आंदोलनों की जमीन पहले से तैयार थी।
दलित वर्ग के लोग न नीला झंडा भूले थे और न हाथी के निशान को। कांशीराम की बसपा ने इसी का लाभ उठाते हुए न सिर्फ पार्टी के झंडे का रंग नीला रखा, बल्कि चुनाव निशान भी हाथी रखा।
कांशीराम की राजनीति के तीन सिद्धांत
कांशीराम ने अपने राजनीतिक आंदोलन को तीन सिद्धांतों पर विकसित किया। पहला जातीय सम्मान, दूसरा भागीदारी और तीसरा वोट को लुटने और बिकने से बचाना। सामाजिक परिवर्तन और नवजागरण के जन नायकों को उन्होंने जातीय सम्मान और स्वाभिमान आंदोलन से जोड़ने की मुहिम चलाई।
शाहू महाराज, महात्मा ज्योतिबा फुले, पेरियार रामास्वामी, रैदास, झलकारी बाई इत्यादि विभूतियों को कांशीराम ने दलित वर्गो का नायक बना दिया।
भागीदारी आंदोलन के तहत कांशीराम ने नारा दिया 'वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा।' कांशीराम ने दलितों को समझाया कि बहुजन की संख्या 85 प्रतिशत है, पर 15 प्रतिशत अल्प आबादी वाला सवर्ण वर्ग उस पर राज कर रहा है। कांशीराम ने 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी भागीदारी' का तर्क देते हुए आबादी के अनुपात में बहुजन समाज की भागीदारी की मांग की।
तीसरे सिद्धांत के तहत कांशीराम ने दलित वर्ग को वोट की कीमत का अहसास कराया। कांशीराम ने कहा कि लोकतंत्र में वोटों की ताकत से शासक पैदा होता है, और अभी तक दलित वर्ग इसलिए शासक नहीं बन सका क्योकि उसने अपनी वोट की ताकत को पहचाना नहीं। उसका वोट खरीदा जाता रहा और लूटा जाता रहा।
कांशीराम ने दलितों में यह एहसास पैदा किया कि यदि दलित वर्ग को शासक बनना है तो उसे अपने वोट को न लुटते देना है, न बेचने देना है बल्कि बहुजन समाज पार्टी को देकर अपनी ताकत बनाना है।
यह कांशीराम ही थे जिनके राजनीतिक आंदोलन ने दलित वर्ग को उत्तर प्रदेश में एक ताकत दी और उत्साह भर दिया। दलितों का इतना विशाल ध्रुवीकरण पहले कभी नहीं हुआ था। कांशीराम ने 1988 में इलाहबाद से लोकसभा चुनाव वीपी सिंह के खिलाफ लड़ा और हार गए। कांशीराम तीसरे नंबर पर रहे लेकिन अच्छे खासे 70 हजार वोट ले आए। कांशीराम उस समय 54 साल के थे।
इसके बाद कांशीराम मुलायम की मदद से 1991 में इटावा से लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुचे। नब्बे के दशक में उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम ने हाथ मिलाया और उसके बाद उत्तर प्रदेश में "मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्री राम" का नारा लगने लगा था।
खराब स्वास्थ के चलते कांशीराम ने 2004 के बाद सार्वजनिक जीवन छोड़ दिया। 9 अक्टूबर 2006 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। कांशीराम की अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार बौद्ध रीति-रिवाज से किया गया था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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