Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

COP 27: जलवायु परिवर्तन रोकने में असफल क्यों साबित हो रहे हैं पर्यावरण सम्मेलन?

COP 27: जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में कॉप-27 नाम से होने वाला शिखर सम्मेलन अभी हाल में मिस्र के शहर शर्म अल शेख में संपन्न हुआ। इसमें 100 से ज्यादा देशों ने तथा 35000 से ज्यादा अन्य संस्थाओं तथा प्रतिभागियो ने हिस्सा लिया।

climate change conference cop27 failed by environmental conferences

करीब 15 दिन चले इस सम्मेलन में निश्चित तौर पर जलवायु परिवर्तन संबंधी चर्चा हुई और उसके परिणाम को टालने हेतु कुछ ठोस करने की जरूरत भी महसूस की गई। 'लॉस एंड डैमेज फंड' की स्थापना इस सम्मेलन की ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कुछ हद तक कम करने में यह फंड सहायक होने की उम्मीद है।

क्या है यह कॉप ?

संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों ने यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के अंतर्गत जलवायु परिवर्तन का सामना करने हेतु 1992 में एक करार किया जो 1994 में अमल में आया। अब इसके 198 सदस्य है।

Recommended Video

    Weather Update: Delhi NCR के तापमान में आई गिरावट, यहां चलेगी शीतलहर | वनइंडिया हिंदी |*News

    आपसी सहयोग का यह एक जरिया था जिससे जलवायु परिवर्तन की समस्या का हल निकल सके और ऐसी नीतियां निर्धारित की जा सके जिससे पर्यावरण को बचाते हुए चिरस्थायी आर्थिक विकास हो सके। यूएनएफ़सीसीसी की नीति तय करने वाली सर्वोच्च संस्था को ही कॉप (Conference of Parties) अथवा सदस्यों का सम्मेलन कहा जाता है।

    इसके तहत 1995 से सम्मेलन होते रहे है। इस साल मिस्र में 27 वीं बार यह सम्मेलन हुआ है। सभी देश पर्यावरण में हो रहे बदलाव को गंभीरता से लेंगे और जिम्मेवारी से इस ओर प्रयत्न करेंगे ऐसा मानकर यह सम्मेलन होता है।

    जलवायु परिवर्तन का मूल कारण

    यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन का मूल कारण गत 300-400 वर्षों से विकास के नाम पर जो मानवीय गतिविधियाँ बढ़ी हैं, उससे वायुमंडलीय संतुलन बिगड़ा है, परिणामस्वरूप पृथ्वी का वातावरण गरम हो रहा है। यह माना जा रहा है कि अगर धरती की गरमाहट 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नहीं रोकी गई तो उसके भयंकर परिणाम हो सकते है। बस यही बात सभी को मानकर इस बढ़ते तापमान को रोकने की कोशिश करनी थी, लेकिन बात इतनी आसान नहीं थी।

    मानव ने जो विकास किया है, उसकी दिशा पूरी तरह बदलना संभव नहीं है। जो देश इस विकास में आगे रहे हैं उनके सहयोग के बिना तापमान का बढ़ना रोका नहीं जा सकता। कॉप जैसे सम्मेलन के बाद भी विकसित देश दूषित वायु का उत्सर्जन कम करने में असफल साबित हो रहे हैं। जिन देशों को जलवायु परिवर्तन से नुकसान हो रहा है, उनको मुआवजा देने में असहयोग भी बना हुआ है। यही चिंता का कारण है।

    अब तक क्या हुआ

    संयुक्त राष्ट्र संघ के यूएनएफ़सीसीसी के शुरुआती दौर में ही यह जरूरत महसूस की गई कि वातावरण दूषित करने वाली गैसों का उत्सर्जन कम हो। जो अमीर देश इन गैसों का ज्यादा उत्सर्जन कर रहे हैं, वो उन देशों को मुआवजा दें जिनका कोई दोष न होते हुए भी जो जलवायु परिवर्तन के परिणाम भुगत रहे है। इस सम्मेलन में गैसों का उत्सर्जन कम करने हेतु चर्चाएँ काफी हुई, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी।

    मुआवजे की बात भी गत सम्मेलन तक टाली जाती रही, लेकिन अब मिस्र के कॉप-27 में 'लॉस एंड डैमेज फ़ंड' की स्थापना एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। लेकिन अभी इस पर बहुत काम होना बाकी है। सिर्फ यह तय हुआ है कि यह फंड वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ के जरिये अमल में लाया जाएगा। अभी किसने कितना फंड देना है और किसको कितना मुआवजा देना है, इस पर निर्णय होना बाकी है। आने वाले दो तीन साल में यह बात सुलझने की उम्मीद कर सकते है।

    सम्मेलनों का असफल दौर

    जहां तक गैसों के उत्सर्जन को रोकने की बात है, विकसित सदस्य देश जिसमें अमरीका, जापान और यूरोपियन देश शामिल है, साल 2000 तक अपने ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 1990 के स्तर पर लाने की बात थी। लेकिन कॉप-1(1995) में ही यह सामने आया कि इतना पर्याप्त नहीं है। इस संदर्भ में आज तक हुए 27 सम्मेलनों में कॉप-3 (1997) और कॉप-22 (2015) महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं।

    कॉप-3 सम्मेलन जापान में हुआ जो 'क्योटो प्रोटोकॉल' नाम से प्रसिद्ध है। उसके बाद कॉप-22 फ्रांस में हुआ जो 'पेरिस समझौता' कहलाया। 'क्योटो प्रोटोकॉल' ने सात ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की कमी के बारे में निर्णय तय किया। यह सात गैसें हैं कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ2), मिथेन (सीएच4), नाइट्रस ऑक्साइड (एन2ओ), हायड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी), परफ्लूरोकार्बन (पीएफ़सी), सल्फर हेक्साफ्लोराइड (एसएफ़6) और नाइट्रोजन ट्राई फ्लोराइड (एनएफ़3)।

    कॉप-22 सम्मेलन पेरिस में यह माना गया कि ग्लोबल वार्मिंग कम करने के लिए तापमान को 2 या 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म होने से रोकना है। इसलिए दूषित वायु उत्सर्जन के लक्ष्य के बदले तापमान कम करने पर ज़ोर दिया गया। बाद में बहुत सी चर्चाएं होती रहीं और कुछ देश, जिसमें यूरोपीय देश शामिल थे, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के कड़े लक्ष्य की बात करते रहे।

    अमरीका, जापान, कनाडा, औस्ट्रेलिया जैसे कुछ देश लचीले लक्ष्य की बात दुहराते रहे। लेकिन अमरीका ने इस 'क्योटो प्रोटोकॉल' को नहीं माना। चर्चाएँ होती रही और दूषित गैसों का उत्सर्जन तथा तापमान भी बढ़ता रहा। इससे यह कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन के परिणाम को रोकने की बात ज्यादातर भाषणों तक सीमित रहा। विकसित देश जितना बोलते हैं उतना करते नहीं।

    जलवायु परिवर्तन रोकने में सभी का सहयोग आवश्यक

    जलवायु परिवर्तन एक गंभीर मुद्दा है और समाज के हर घटक का पर्यावरण अनुकूल व्यवस्था बनाने में सहयोग आवश्यक है, तभी जलवायु परिवर्तन का सामना हो सकेगा। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन में तापमान का बढ़ना मुख्य है और बढ़ते तापमान को रोकना अहम मुद्दा। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि तापमान बढ़ना रुका तो भी बढ़ी हुई गर्मी से होने वाले नुकसान को रोकना मुश्किल होगा। फिर भी दुनिया में संशोधन हो रहा है और ऐसी स्थिति से बचने के उपाय ढूंढे जा रहे हैं।

    पेट्रोलियम, कोयला और प्राकृतिक गैस का उपयोग कम कर सौर ऊर्जा जैसे स्त्रोतों पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन अभी इसमें गति नहीं आयी है। यह तय है कि सभी को पर्यावरण अनुकूल नई जीवन शैली अपनानी होगी तथा उसके अनुरूप अर्थव्यवस्था चलानी होगी। इसमें सरकार, व्यक्ति और समाज सभी को एक दूसरे के साथ चलना होगा।

    सरकारों को भी इस जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेना होगा और राजनीति से परे हट कर इस पर काम करना होगा। सिर्फ भाषण से या मुआवजे की बात कर जलवायु परिवर्तन के परिणाम टाले नहीं जा सकते।

    यह भी पढ़ें: CoP27: जलवायु परिवर्तन रोकने में नाकाम क्यों हो रहे हैं दुनियाभर के देश?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    More From
    Prev
    Next
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+