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10 मुद्दों में चुनिए 2018 का वह मुद्दा जो 2019 पर असर डालेगा

नई दिल्ली। 2019 के लिए आधार 2018 में तैयार हुआ। 2018 में सबसे बड़ी घटना कौन सी रही, जिसका 2019 पर असर पड़ना तय है? इसका जवाब तय करने से पहले उन घटनाओं को साथ रखते हैं जिसमें 2019 का मुद्दा बनने की स्पर्धा है। पहले नजर डालते हैं ऐसी 10 घटनाओं पर जिनमें 2019 को प्रभावित करने की क्षमता है :

10 मुद्दों में चुनिए 2018 का वह मुद्दा जो 2019 पर असर डालेगा

1. क्या वह लोकतंत्र के लिए 5 जजों का निकलना है जिसके साथ ही 2018 की शुरुआत हुई थी?
2. क्या वह मार्च में हुए गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव हैं जिसने योगी-मोदी मैजिक ध्वस्त कर दिया?
3. क्या वह बिहार में नीतीश कुमार का एनडीए में लौटने की घटना है जिससे बीजेपी में 2019 के लिए उम्मीद जगी?
4. क्या वह एन चंद्रबाबू नायडू का एनडीए छोड़ने की घटना है जिससे कांग्रेस को दक्षिण में नया साथी मिल गया?
5. क्या वह अखिलेश और मायावती के बीच की मुलाकात वह घटना है जिसने यूपी केंद्रित देश के सियासी समीकरण को बदल डाला है?
6. क्या वह राम मंदिर बनाने को लेकर हिन्दू धर्म सम्मेलन करने और धार्मिक फ़िजां तैयार करने की कोशिशें रहीं?
7. क्या वह कांग्रेस का हिन्दुत्व के लिए जागा प्रेम है जिसने बीजेपी को भी बदलने को मजबूर किया और 2019 में उसका असर पड़ने वाला है?
8. क्या वह हिन्दी हर्टलैंड के तीन राज्यों से बीजेपी का ताज छिन जाने की घटना है जिसने देश में बदलाव के लिए मचलती जनता की भावना का इजहार किया है?
9. क्या वह एससी-एसटी एक्ट पर सरकार के ढुलमुल रवैये के बाद सुप्रीम कोर्ट का आदेश और उसके बाद भारत बंद की वह घटना है?
10. क्या वह लगातार होते रहे किसान आंदोलन हैं जो 2019 में मुद्दा बनने को तैयार दिख रहे हैं और कर्जमाफ़ी की सियासत का जिससे जन्म हुआ है?

बौद्धिक जगत पर दिखा जज की ‘बगावत’ का असर

बौद्धिक जगत पर दिखा जज की ‘बगावत’ का असर

सुप्रीम कोर्ट के जजों का लोकतंत्र के लिए आवाज़ उठाने की घटना देश के संवेदनशील समाज को झकझोरने वाली घटना जरूर थी। यह नज़ीर बनी, मगर इस घटना से जुड़ा जनाधार चुनाव के बड़े फलक पर नगण्य है। हालांकि यह घटना इतनी गम्भीर जरूर थी कि केंद्र सरकार पर कई मामलों में लगाम कसने के ख्याल से असर डालती दिखी।

गोरखपुर-फूलपुर ने विपक्ष के हाथों में सौंपा दिव्यास्त्र

गोरखपुर-फूलपुर ने विपक्ष के हाथों में सौंपा दिव्यास्त्र

गोरखपुर और फूलपुर का उपचुनाव पहले और बाद में हुए उपचुनाव से कई मायनों में अलग था। इसने उन सीटों पर बीजेपी का गुमान ध्वस्त कर दिया जहां वह अजेय समझी जा रही थी। उपमुख्यमंत्रियों की लोकसभा सीट, वह सीट जहां 50 फीसदी से ज्यादा वोट बीजेपी को मिले- ऐसी सीट में हार अपने आप में अनोखी घटना थी। मगर, जिस अस्त्र के सामने बीजेपी निरस्त्र हो गयी वह 2019 के लिए विपक्ष का दिव्यास्त्र बन गया। इसने कई संदेश दिए। जैसे,

- बीजेपी को हराना है तो हर सीट से एकजुट उम्मीदवार दिया जाए।
- बीजेपी को हराना है तो आपसी मतभेदों को दूर रखा जाए।
- एसपी-बीएसपी मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं तो बाकी क्यों नहीं?

नीतीश से गठजोड़ ने एनडीए में बीजेपी के लिए धारणा बदल दी

नीतीश से गठजोड़ ने एनडीए में बीजेपी के लिए धारणा बदल दी

नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने की घटना का महत्व बीजेपी और जेडीयू के लिए। इसका कोई देश के स्तर पर संदेश गया हो या यह घटना कोई उदाहरण बन गयी हो, ऐसा नहीं लगता। बीजेपी-जेडीयू गठबंधन इस मायने में बीजेपी के ख़िलाफ़ ज़रूर है कि

- बीजेपी ने अपने वफादार घटक दल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को एनडीए छोड़ने को मजबूर कर दिया।
- बीजेपी इतनी मजबूर है कि वह 22 सीट जीतकर भी 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और दो सीटों वाला जेडीयू भी 17 सीटों पर ही चुनाव लड़ेगा।
- एलजेपी ने 6 लोकसभा सीट और एक राज्यसभा सीट बीजेपी से चुनाव के लिए हासिल कर यह उदाहरण सामने रखा कि मजबूर बीजेपी पर दबाव डालकर उससे कुछ भी मनाया जा सकता है।

चंद्रबाबू नायडू के गठबंधन छोड़ने का प्रभाव सीमित

चंद्रबाबू नायडू के गठबंधन छोड़ने का प्रभाव सीमित

एनडीए के संयोजक रहे एन चंद्रबाबू नायडू का गठबंधन छोड़ने का प्रभाव आन्ध्र प्रदेश की सीमा से बाहर निकलता नहीं दिखता। अगर तेलंगाना में नायडू-कांग्रेस गठबंधन कुछ कर पाता तो ज़रूरत यह प्रभाव बड़ा हो सकता था। लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

2018 की अनहोनी है अखिलेश-मायावती गठजोड़

2018 की अनहोनी है अखिलेश-मायावती गठजोड़

अखिलेश-मायावती की मुलाकात 2018 की अनहोनी घटना है। दोनों इससे पहले तक समय-समय पर बीजेपी या कांग्रेस के साथ तो रहे थे लेकिन एक-दूसरे के साथ कभी नहीं रहे थे। यह गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव के नतीजे के बाद पैदा हुआ विश्वास और उसके बाद उस विश्वास की कैराना में आजमाइश का नतीजा है। यूपी में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान भी यह कमेस्ट्री मजबूत हुई। लगातार अखिलेश-माया की करीबी बढ़ती चली गयी है। यह जोड़ी कांग्रेस के साथ रहे या कांग्रेस के ख़िलाफ़ रहे मगर भारतीय राजनीति में दखल देने की क्षमता रखती है। 2019 के आम चुनाव में और उस चुनाव के बाद भी इस जोड़ी की अहमियत बनी रहेगी बशर्ते जोड़ी बनी रहे।

हिन्दी पट्टी में भी बेअसर रहा राम मंदिर

हिन्दी पट्टी में भी बेअसर रहा राम मंदिर

राम मंदिर का मुद्दा गरम जरूर किया गया, हिन्दुत्व को भी उछाला गया और इस मुद्दे पर शिवसेना भी और मुखर होकर सामने आयी, लेकिन जिस तरीके से इन सबका कोई प्रभाव मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में देखने को नहीं मिला उसे देखते हुए ये बात साफ है कि अब बीजेपी इस मुद्दे को 2019 में आजमाने से डरेगी। राम मंदिर का मुद्दा हिन्दी पट्टी का मुद्दा माना जाता था, लेकिन वह हिन्दी पट्टी में भी बेअसर दिखा।

सॉफ्ट हिन्दुत्व पर अब दोबारा सोचेगी कांग्रेस

सॉफ्ट हिन्दुत्व पर अब दोबारा सोचेगी कांग्रेस

कांग्रेस को भी नये सिरे से अपने सॉफ्ट हिन्दुत्व पर विचार करने का संकेत गया है। उसने ऐसा करना शुरू भी कर दिया है। तीन तलाक पर कांग्रेस का जो रुख सामने दिखा है वह राम मंदिर मुद्दा या हिन्दुत्व के मुद्दे पर बीजेपी की असफलता से मिला हौंसला ही है।

हिन्दी हर्टलैंड में हार बीजेपी की सबसे बड़ी हार

हिन्दी हर्टलैंड में हार बीजेपी की सबसे बड़ी हार

हिन्दी हर्टलैंड में चुनाव हारना बीजेपी के लिए बड़ा धक्का है। इससे वह 2019 तक उबर नहीं पाएगी। इस हार के पीछे के कारण भी 2019 में चुनावी मुद्दे तय करती दिख रही है। एससी-एसटी का दूर होना, किसानों का दूर होना और ग्रामीण क्षेत्रों में बुरा प्रदर्शन ऐसे संकेत हैं जो बीजेपी के लिए भयावह हैं। हालांकि इस जीत से कांग्रेस उसी अनुपात में अपने लिए देश में सम्भावना के बारे में सोचे, तो यह सतही लगता है। मगर, बीजेपी को चोट का सबसे ज्यादा फायदा तो कांग्रेस को ही होना है, यह भी तय है। कांग्रेस ने तीन राज्यों में सरकार हासिल कर देश के पैमाने पर चुनाव लड़ने के लिए शक्तिवर्धक टॉनिक हासिल कर ली है। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता।

एससी-एसटी का मोदी सरकार के ख़िलाफ़ दिखा गुस्सा

एससी-एसटी का मोदी सरकार के ख़िलाफ़ दिखा गुस्सा

एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह से देशभर में एससी-एसटी ने प्रतिक्रिया दी, वह अप्रत्याशित था। यह मोदी सरकार के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया थी। स्वत:स्फूर्त ढंग से इस तरह देशबंद होना दशकों बाद देखा-सुना गया। इसमें प्रत्यक्ष रूप से कोई राजनीतिक दल शामिल नहीं था। मगर, प्रभाव इतना व्यापक पड़ा कि मोदी सरकार को यू टर्न लेना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूर्व की स्थिति बहाल करनी पड़ी। सवर्ण वर्ग में भी व्यापक नाराज़गी पैदा हुई जिसका ख़ामियाज़ा बीजेपी को मध्यप्रदेश में उठाना पड़ा।

आखिरकार मुद्दा बनने में कामयाब रहे किसान

आखिरकार मुद्दा बनने में कामयाब रहे किसान

जो किसान आंदोलन मोदी राज में लगातार उपेक्षित रहा, वही किसान आंदोलन 2018 में आखिरी चुनाव के मौके पर हिन्दी हर्ट लैंड में बीजेपी को हर्ट कर गया। किसानों को कर्जमाफ़ी का मुद्दा राहुल गांधी ने पकड़ लिया और उनके नेतृत्व में नयी जान आ गयी। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले भी यह मुद्दा चढ़ चुका है। इसलिए ये बात तय है कि 2019 में किसानों को अपने-अपने पक्ष में करने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ रहेगी।

अब बात समझ में आ चुकी होगी कि 2019 के लिए सबसे बड़ी बात जो 2018 में हुई वह समीकरण के स्तर पर एसपी-बीएसपी गठजोड़ और मुद्दे के तौर पर किसानों की दुर्दशा शामिल हैं। राजनीतिक घटना के तौर पर सबसे बड़ी घटना हिन्दी हर्ट लैंड में बीजेपी की हार और कांग्रेस की जीत है, तो सबसे चौंकाने वाली बात जो 2019 को प्रभावित करने वाली है वह है राम मंदिर या हिन्दुत्व के मुद्दे का पांच राज्यों के चुनाव में बेअसर रहना।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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