एक अनपढ़ हत्यारा इल्मुद्दीन, विद्वान अल्लामा इकबाल और इस्लामिक देश पाकिस्तान का जन्म
लगभग सौ साल के संघर्ष के बाद भारत को अंग्रेजों से आजादी तो मिली लेकिन वह खून में लथपथ होकर मिली। लाखों लोग अपने घरों से निकाल दिये गये या मार दिये गये। भारत के इतिहास ने ऐसी त्रासदी कभी नहीं देखी थी जब धर्म के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को उनके ही घर से दर-ब-दर कर दिया गया था। आजादी के 75 साल बाद भी वह घाव भरा नहीं है। उसकी पीड़ा और कसक आज भी रिस रही है।

स्वतंत्रता का सन सैंतालीस आने से पहले इतनी घटनाएं हैं कि जितना विचार करते जाओ, उतना उलझते जाओ। कौन सही, कौन गलत इसका कोई ठीक आंकलन किसी के पास नहीं। सब एक सिरे को पकड़कर उसका विश्लेषण करते हैं। लेकिन यहां हम एक ऐसी घटना और उस घटना से जुड़े लोगों का जिक्र कर रहे हैं जिसका उल्लेख बौद्धिक जगत में बहुत कम होता है। लेकिन इतिहास में जाएंगे तो पायेंगे कि इसी घटना ने और इस घटना से जुड़े लोगों ने पाकिस्तान की बुनियाद रखने का काम किया था।
1920 से 1922 के बीच लाहौर में तीन अलग अलग पुस्तिका छापी गयीं थीं। इनके नाम थे, "कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी", "सीता एक छिनाला" और "उन्नीसवीं सदी का एक लंपट महर्षि"। इन किताबों में न केवल हिन्दू देवी देवताओं का मजाक उड़ाया गया था बल्कि आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद को भी लंपट बताया गया था।
इन किताबों के लेखक और प्रकाशक अनाम थे। लेकिन जब लाहौर में इन किताबों की चर्चा शुरु हुई तब इसकी प्रतिक्रिया में एक आर्यसमाजी चमूपति शास्त्री ने 1923 में रंगीला रसूल नामक एक किताब लिखी जो मुसलमानों के पैगंबर के बारे में थी। इस किताब को एक अन्य आर्यसमाजी महाशय राजपाल के प्रताप प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।
किताब छपते ही लाहौर में मुसलमानों का गुस्सा भड़क गया। लाहौर जैसे उदार समाज में कई साल तक प्रताप प्रकाशन को बंद करने और लेखक को गिरफ्तार करने की मांग चलती रही। बात फैलते फैलते इल्मुद्दीन तक पहुंची। इल्मुद्दीन 20-22 साल का एक नौजवान था और एक लोहार की भट्टी पर काम करता था। वह पढा लिखा नहीं था। उसने सुना कि किसी राजपाल ने उनके नबी का अपमान किया है तो इल्मुद्दीन एक दिन उनके कार्यालय में पहुंचता है और अपने हथौड़े से मारकर महाशय राजपाल की हत्या कर देता है।
यह 1927 की घटना थी। राजपाल की हत्या के आरोप में इल्मुद्दीन गिरफ्तार हुआ। ब्रिटिश अदालत में उस पर हत्या का मुकदमा चला। लेकिन मुसलमानों ने उसे हत्यारा मानने की बजाय हीरो और गाजी माना। उसने किसी ऐसे व्यक्ति की हत्या की थी जिसने मुसलमानों के पैगंबर का कथित तौर पर अपमान किया था।
उस वक्त अल्लामा इकबाल इल्मुद्दीन के पक्ष में खुलकर खड़े हुए। अल्लामा इकबाल ने मोहम्मद अली जिन्ना से बात की कि वह इल्मुद्दीन का केस लड़े। मोहम्मद अली जिन्ना निचली अदालतों में नहीं जाते थे लेकिन अल्लामा इकबाल के कहने पर इल्मुद्दीन के लिए लाहौर की अदालत में खड़े हुए। हालांकि वह इल्मुद्दीन को बचा नहीं पाये और अक्टूबर 1929 में इल्मुद्दीन को फांसी दे दी गयी।
इस घटना ने "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" लिखनेवाले अल्लामा इकबाल को झकझोर कर रख दिया। अल्लामा इकबाल ने देश के दूसरे नवाबों और रसूखदार मुसलमानों से संपर्क किया और उन्हें इल्मुद्दीन के नमाज-ए-जनाजा में बुलाया। जब वहां अल्लामा इकबाल से कहा गया कि आप नमाज ए जनाजा की अगुवाई करें तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि, "इल्मुद्दीन इतने महान आदमी थे कि उनके नमाजे जनाजा की अगुवाई करने की पात्रता उनके अंदर नहीं है।"
एक अनपढ़ गंवार हत्यारे इल्मुद्दीन के सामने अल्लामा इकबाल जैसी शख्सियत खुद को इतनी बौनी क्यों मान रही थी? क्योंकि उसने मजहब के नाम पर एक ऐसे व्यक्ति की हत्या कर दिया था जिसके ऊपर आरोप लगा था कि उसने नबी निंदा की थी।
इस घटना ने अल्लामा इकबाल को प्रेरित किया कि वह ब्रिटिश हुकूमत से एक ऐसे इस्लामिक राज्य की मांग करें जहां इस्लाम के मुताबिक शासन चलाया जा सके। दिसंबर 1930 में अल्लामा इकबाल इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के जलसे में पहली बार अलग इस्लामिक राज्य की मांग सामने रखते हैं। अल्लामा इकबाल ने मुस्लिम लीग के सम्मेलन में कहा कि "व्यक्तिगत रूप से मैं चाहता हूं कि नार्थ वेस्ट फ्रंटियर, सिन्ध, पंजाब और बलूचिस्तान को मिलाकर एक इस्लामिक राज्य बनाया जाए।"
अल्लामा इकबाल ने पहली बार खुलकर यहां भारत के विभाजन की एक रूपरेखा प्रस्तुत की। हालांकि उस समय उन्होंने अलग देश नहीं बल्कि ब्रिटिश रूल में ही अलग इस्लामिक स्टेट मांगा था लेकिन आगे चलकर जिन्ना को लिखी चिट्ठी में वो अलग देश की वकालत भी करते हैं। अल्लामा इकबाल ने मुस्लिम लीग के इलाहाबाद वाले जलसे में अपनी मांग को सही ठहराते हुए कहा कि "यूरोप की डेमोक्रेसी भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज के लिए सफल नहीं होगी। इसलिए भारत के भीतर एक मुस्लिम राज्य की मांग पूरी तरह से जायज है।"
अल्लामा इकबाल यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक ओर जहां मुस्लिम लीग को प्रेरित किया कि वह अलग इस्लामिक राज्य की मांग तेज करे वहीं दूसरी ओर मोहम्मद अली जिन्ना से भी कहा कि उन्हें अलग इस्लामिक राज्य के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। मई 1937 में अल्लामा इकबाल ने जिन्ना को दो चिट्ठी लिखी थी।
इन दो चिट्ठियों में उन्होंने "हिन्दू साहूकारों" का हवाला देते हुए कहा था कि इनकी वजह से बीते दो सौ सालों से मुसलमानों की आर्थिक स्थिति लगातार खराब हुई है। उन्होंने जिन्ना से कहा कि नेहरु के समाजवाद से हिन्दुओं का ही कोई भला नहीं होगा तो फिर उसमें हम मुसलमानों का आर्थिक हित कैसे सुरक्षित कर सकते हैं? जिन्ना को लिखी चिट्ठी में अल्लामा इकबाल लिखते हैं, "भारत को एक संविधान के तहत एक गणराज्य बनाने के विचार से मैं सहमत नहीं हूं। एक अलग मुस्लिम राज्य ही मुसलमानों को गैर मुस्लिमों के प्रभुत्व से बचा सकता है।"
हालांकि 1938 में अल्लामा इकबाल मर गये लेकिन मुस्लिम लीग और जिन्ना को अलग मुस्लिम राज्य का जो विचार वो दे गये थे उसे मुस्लिम लीग के लाहौर जलसे में 1940 में अलग पाकिस्तान की मांग के रूप में सामने रखा गया। भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर रहे "सेकुलर" जिन्ना ने यहां से अलग पाकिस्तान की मांग को अपना मुद्दा बना लिया। इस तरह 15 अगस्त 1947 को देश तो आजाद हुआ लेकिन उसके तीन टुकड़े हो गये।
इल्मुद्दीन की फांसी के बाद 1930 में अल्लामा इकबाल ने जिस अलग "इस्लामिक राज्य" की मांग उठाई थी, वह 1947 में अलग देश पाकिस्तान के रूप में सामने आ गया।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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