उत्तराखंड: सवर्णों ने दलित और दलितों ने सवर्ण भोजनमाता के हाथ का खाना क्यों नहीं खाया?

नई दिल्ली, 29 दिसंबर। उत्तराखंड में चंपावत जिले के सूखीढांग स्थित राजकीय इंटर कॉलेज में बच्चे दलित भोजनमाता को हटाए जाने से नाराज बताए जा रहे हैं. स्कूल के प्रिंसिपल प्रेम सिंह की तरफ से इस बारे में शिक्षा विभाग को एक पत्र भी भेजा गया है. सूखीढांग स्थित इस इंटर कॉलेज में बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है और छठी से आठवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए मध्याह्न भोजन यानी मिड डे मील की व्यवस्था की जाती है. दलित छात्रों के बीच में यह चर्चा है कि यदि दलित भोजनमाता का पकाया हुआ खाना सवर्ण छात्र नहीं खाएंगे तो सवर्ण भोजनामाता के हाथ का खाना वो भी नहीं खाएंगे.
स्कूल में छठी से आठवीं कक्षा तक के 66 छात्र-छात्राओं के लिए भोजन बनता है लेकिन शुक्रवार को अनुसूचित जाति के 23 बच्चों ने सवर्ण भोजनमाता के हाथों बना खाना खाने से इनकार कर दिया. शिक्षा विभाग ने इसकी जांच के आदेश दे दिए हैं. इससे पहले, दलित भोजनमाता प्रकरण की घटना के भी जांच के आदेश मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिए थे.
इस विद्यालय में गत 13 दिसंबर को दलित भोजनमाता की नियुक्ति हुई थी और अगले ही दिन से कुछ सवर्ण छात्रों ने उनके हाथ का बना भोजन करने से इनकार कर दिया था. धीरे-धीरे ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती गई और आखिरकार सभी सवर्ण बच्चों ने अपने घर से खाना लाना शुरू कर दिया और उनके अभिभावकों ने भी इस पर आपत्ति जताई. शिकायत मिलने पर चंपावत जिले के मुख्य शिक्षा अधिकारी आरसी पुरोहित ने 21 दिसंबर को भोजनमाता की नियुक्ति को अवैध बताते हुए उन्हें बर्खास्त कर दिया. बच्चों के अभिभावकों ने आरोप लगाया था कि भोजनमाता की नियुक्ति नियमों के विपरीत हुई थी.
इसके बाद से ही यह मामला न सिर्फ सुर्खियों में आ गया बल्कि गांव के लोग भी दो खेमे में बंट गए हैं. शनिवार को इस घटना को लेकर उस समय ग्रामसभा के सदस्यों में जातीय तनाव देखा गया जब ऊंची जाति के पांच ग्रामसभा सदस्यों ने गांव के दलित प्रधान का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया. ग्रामसभा सदस्यों का आरोप है कि फैसले लेते समय प्रधान उनसे सलाह नहीं लेते. हालांकि बाद में प्रशासनिक अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद इन सदस्यों ने इस्तीफे वापस ले लिए.
क्या है पूरी कहानी?
दरअसल, यह पूरा मामला स्कूल में भोजनमाता की नियुक्ति के साथ शुरू होता है. इस स्कूल में 66 बच्चों का भोजन बनाने के लिए भोजनमाता के दो पद हैं. 11 अक्टूबर तक यहां भोजनमाता के रूप में शकुंतला देवी और विमलेश उप्रेती काम कर रही थीं लेकिन शकुंतला देवी की उम्र 60 साल से ज्यादा होने के कारण उन्हें हटा दिया गया और दूसरी भोजनमाता की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हुई.
बताया जाता है कि विद्यालय प्रबंधन और अभिभावक संघ के लोगों ने जिस महिला की नियुक्ति की सिफारिश की थी वो सवर्ण वर्ग से थीं और गरीबी रेखा से ऊपर भी थीं इसलिए विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उसे मानकों के अनुसार न मानते हुए अपनी संस्तुति नहीं दी. बाद में दोबारा आवेदन निकाले गए और आवेदनों पर चर्चा के लिए एक कमेटी बनाई गई. उस कमेटी ने दलित महिला सुनीता देवी के नाम की संस्तुति की जो बीपीएल श्रेणी यानी गरीबी रेखा से नीचे वाली श्रेणी में आती हैं. इस कमेटी में विद्यालय के शिक्षकों के अलावा अभिभावक संघ के लोग और आस-पास के गांवों के प्रधान भी शामिल थे.
विद्यालय के एक शिक्षक बताते हैं कि भोजनमाता नियुक्ति की इस प्रक्रिया के लिए बुलाई गई बैठक में ही सदस्यों के बीच जमकर विवाद हुआ था और वहीं से ये मामला सवर्ण बनाम दलित बन गया था. उनके मुताबिक, "वहीं से ये बात तय हो गई कि यदि दलित महिला की नियुक्ति होती है तो सवर्ण अभिभावक अपने बच्चों को इस तरह के व्यवहार के लिए उकसाएंगे और आखिरकार वैसा ही हुआ."
हालांकि सुनीता देवी 13 दिसंबर से काम जरूर करने लगी थीं लेकिन उन्हें तब तक कोई नियुक्ति पत्र नहीं मिला था. सुनीता देवी बताती हैं, "पहले ही दिन से कई बच्चों ने खाना खाने से मना कर दिया और दो-तीन दिन बाद तो सिर्फ दलित बच्चे ही खाना खा रहे थे."
जाति या प्रक्रिया?
चंपावत में शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सुनीता देवी को भोजनमाता की नौकरी से हटाने के पीछे यह विवाद नहीं है बल्कि उन्हें हटाने के पीछे नियुक्ति प्रक्रिया में हुई गड़बड़ी है. लेकिन सुनीता देवी ने इस मामले में खुद के उत्पीड़न को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.
वहीं इस विवाद के सामने आने के बाद दिल्ली सरकार ने उन्हें नौकरी देने का वादा किया लेकिन सुनीता देवी का कहना है कि उन्होंने इस बारे में सिर्फ सुना है, उनसे किसी ने संपर्क करके ऐसा आश्वासन नहीं दिया है. सुनीता देवी कहती हैं, "मेरे द्वारा पकाए गए भोजन को खाने से बच्चों के इनकार करने और उनके अभिभावकों के व्यवहार से मैं आहत और अपमानित महसूस कर रही हूं और मैंने इसकी शिकायत भी पुलिस में दर्ज कराई है."
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं लेकिन सवाल यह भी है कि क्या दलित भोजनमाता को सिर्फ नियुक्ति प्रक्रिया में खामी की वजह से ही निकाल दिया गया. अभिभावक संघ के एक सदस्य नीरज जोशी कहते हैं कि यदि पूरी प्रक्रिया के तहत भी दलित महिला की नियुक्ति हुई होती, तब भी यही स्थिति आती. उनके मुताबिक, "यदि दोबारा दलित महिला की नियुक्ति होती है तब भी बच्चे नहीं खाएंगे और यदि ऐसा करने पर बाध्य किया गया तो लोग अपने बच्चों को वहां पढ़ने भी नहीं भेजेंगे."
हालांकि कुछ स्थानीय लोग इस विवाद को लेकर काफी व्यथित भी हैं. चंपावत जिले में एक रिटायर्ड शिक्षक जगदीश चंद्र नेगी कहते हैं, "जिस उम्र में बच्चों को जाति-धर्म की हर दीवार से ऊपर उठकर मानवता की शिक्षा दी जानी चाहिए, उस उम्र में उन्हें ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी मध्यकालीन बुराइयों की कुशिक्षा दी जा रही है जो न सिर्फ उनके जीवन के लिए बल्कि देश और समाज के लिए भी बहुत ही घातक है. मैंने 32 साल अध्यापन किया, हर जाति-धर्म के बच्चे आते थे, उस वक्त समाज में ऐसी प्रथाएं आमतौर पर प्रचलित थीं लेकिन शिक्षक धर्म निभाते हुए हम लोग बराबरी की समझ विकसित करते रहे और कभी किसी अभिभावक ने इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं की."
देश भर में हो रही हैं ऐसी घटनाएं
उत्तराखंड के चंपावत के स्कूल में यह अकेली घटना नहीं है बल्कि देश के दूसरे राज्यों से भी इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं. जानकारों का कहना है कि बच्चों में इस तरह की प्रतिक्रियावादी भावना तभी आती है जब उनके अभिभावकों की ओर से उन्हें यह बताया जाता है. बच्चे अपने स्तर पर इस तरह का कोई फैसला करते हैं, ऐसा कहना मुश्किल है.
यूपी के एक कॉलेज में समाजशास्त्र पढ़ाने डॉक्टर संतोष भदौरिया कहते हैं, "बच्चों का घर-परिवार और आस-पास के माहौल में जो सामाजिक प्रशिक्षण होता है, उनकी मानसिकता उसी के अनुसार ढल जाती है. जहां तक मध्याह्न भोजन वाली घटनाएं हैं तो इसके लिए काफी हद तक ग्रामीण समाज और राजनीति जिम्मेदार है. यही लोग जब बाहर जाते हैं तो किसी रेस्टोरेंट और ढाबे में खाना खाते वक्त यह कभी नहीं देखते कि किस जाति के व्यक्ति ने इसे बनाया है और किस जाति का व्यक्ति परोस रहा है. सीधी सी बात है कि ऐसी वर्जनाएं सिर्फ कुछ राजनीतिक स्वार्थों के लिए ही प्रोत्साहित की जा रही हैं."
देश भर में गरीब बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से मध्याह्न भोजन योजना की शुरुआत हुई थी. 15 अगस्त 1995 को यह योजना देश के 2408 ब्लॉकों में एक केन्द्रीय प्रायोजित स्कीम के रूप में शुरू की गई थी और साल 1997-98 तक यह कार्यक्रम देश के सभी ब्लाकों में शुरू कर दिया गया. इसे हर राज्य के आठवीं तक के सरकारी स्कूलों में केंद्र सरकार की मदद से चलाया जा रहा है.
मौजूदा समय में यह योजना देश भर के 11.20 लाख स्कूलों में चलाई जा रही है और इससे करीब 12 करोड़ छात्र लाभान्वित हो रहे हैं. 10.74 लाख स्कूलों में उनकी खुद की रसोई है जहां बच्चों की संख्या के मुताबिक रसोइयों यानी भोजनमाता की नियुक्ति की जाती है जबकि बाकी स्कूलों में 300 गैर सरकारी संगठनों की मदद से पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है. इन संगठनों में अक्षय पात्र और इस्कॉन जैसी संस्थाएं प्रमुख हैं.
Source: DW
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