मायावती ने फिर रखा भतीजे आकाश आनंद के सिर पर हाथ, बीजेपी के लिए क्यों है गुड न्यूज?
UP News: लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद बहुजन समाज पार्टी में बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है। बसपा सुप्रीमो मायावती के भतीजे आकाश आनंद की फिर से धमाकेदार वापसी हुई है। मायावती का यह फैसला अगर पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने वाला है तो भाजपा के वर्ग के लिए भी उम्मीदों की किरण साबित हो सकता है।
शनिवार को बीएसपी ने उन्हें उत्तराखंड उपचुनाव के स्टार-प्रचारकों की लिस्ट में शामिल किया और रविवार को मायावती ने उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें दोबारा राष्ट्रीय संयोजक पद पर बहाल कर दिया और फिर से अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया।

मायावती ने 'पूर्ण परिपक्वता' आने तक के लिए भतीजे को हटाया था
लखनऊ में बीएसपी ने लोकसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को लेकर आयोजित दल के पदाधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक में इसकी घोषणा की है। लोकसभा चुनावों के दौरान मई में बीएसपी चीफ ने घोषणा की थी कि, 'पार्टी व मूवमेंट के व्यापक हित में पूर्ण परिपक्वता आने तक अभी उन्हें (आकाश आनंद) इन दोनों अहम जिम्मेदारियों से अलग किया जा रहा है।'
'हेट स्पीच' के आरोपों में घिर गए थे आकाश आनंद
दरअसल, चुनाव अभियान के दौरान आकाश बीजेपी और इसके नेताओं के खिलाफ अपने आक्रामक भाषणों की वजह से कार्यकर्ताओं के बीच काफी तेजी से लोकप्रिय होने लगे थे। लेकिन, इसकी वजह से वे 'हेट स्पीच' के आरोपों में भी घिर गए थे। हालांकि, उनकी आक्रमकता की वजह से उनकी सभाओं में भीड़ जुटने लगी थी।
तब कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना था कि करियर की शुरुआत में ही किसी संकट में उलझने से बचाने के लिए मायावती ने उनसे अहम जिम्मेदारियां छीन लेने में भलाई समझी।
आकाश आनंद पर बीएसपी चीफ की कार्रवाई का अन्य विपक्षी दलों ने उठाया फायदा
लेकिन, कुछ सियासी जानकार यह कहने लगे कि संभवत: मायावती सत्ताधारी दल से अपने रिश्ते ज्यादा बिगाड़ने के हक में नहीं थीं। जो भी हो मायावती के फैसले को अन्य विपक्षी दलों ने चुनावों में अपने हक में खूब भुनाया। इस तरह का संदेश फैलाया गया कि वह बीजेपी के इशारे पर काम कर रही हैं।
आकाश आनंद नहीं हटते तो भाजपा को हो सकता था फायदा
संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर देने के सपा-कांग्रेस के दावों ने पहले ही बीजेपी-विरोधी दलितों को चौकन्ना कर रखा था। जब नतीजे सामने आए तो सूत्रों के अनुसार भाजपा के अंदर एक वर्ग की यह राय बनी कि अगर आकाश आनंद भाजपा और उसके नेताओं पर आक्रमण करते रहते तो बीजेपी-विरोधी दलित वोट सपा और कांग्रेस को नहीं जाता।
जानकार मानते हैं कि आरक्षण का मुद्दा पहली बार यूपी में इतना संवेदनशील बना दिया गया कि दलित वोटरों को यादवों के साथ वोट डालते हुए देखा गया। भाजपा में आकाश आनंद फैक्टर को पार्टी की करारी हार से किस तरह जोड़ा गया, इसपर एक विस्तृत रिपोर्ट वनइंडिया 10 जून, 2024 को ही दे चुका है।
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ऐसे में अगर आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के चंद्रशेखर के नगीना सीट से जीतने के बाद मायावती अपने भतीजे को पार्टी की मुख्यधारा में वापस लाने को मजबूर हुई हैं तो यह उनकी पार्टी के साथ-साथ भाजपा के लिए भी कोई अच्छी खबर से कम नहीं है।












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