मायावती के किस फैसले ने तोड़ दी भाजपा की कमर? रेत की तरह से हाथ से निकला यूपी

UP Lok Sabha Chunav Parinam 2024: उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम ने तीसरी बार मोदी सरकार को लेकर भारतीय जनता पार्टी के सभी मंसूबों पर पानी फेरने का काम किया है। अगर पार्टी 2019 वाला प्रदर्शन भी कर पाती तो केंद्र में उसे अपने दम पर भी बहुमत मिल सकता था।

अब भाजपा सूत्रों के हवाले से जो बातें छनकर सामने आ रही है, उससे पता चलता है के पार्टी नेताओं के बीच एक आम राय यह बन रही है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की इतनी बड़ी हार नहीं होती, अगर अप्रत्याशित रूप से दलित और पिछड़ा वोट इंडिया ब्लॉक को शिफ्ट नहीं होता और मुस्लिम वोटर एकतरफा उन्हें वोट देने नहीं पहुंचते।

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बसपा चीफ का ऐक्शन, भाजपा को मिली टेंशन!
इस तरह की थ्योरी तो राजनीति के अन्य विश्लेषकों की ओर से भी दी जा रही है। लेकिन, सबसे दिलचस्प बात है कि यूपी में पहली बार दलितों को यादवों के साथ वोट करने की जो बातें सुनने को मिल रही हैं, उसके लिए बीजेपी के अंदर बसपा चीफ मायावती के एक कदम को 'दोष' दिया जा रहा है।

संविधान बदलने के दावों ने बिगाड़ा सारा समीकरण
दरअसल, इस बार के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के अगुवाई वाले गठबंधन से यह बात खूब प्रचारित की गई कि बीजेपी सत्ता में आई तो संविधान बदल देगी, जिससे आरक्षण खत्म हो जाएगा। इसने ओबीसी और अनुसूचित जाति के मतदाताओं को विरोधी खेमे के पीछे गोलबंद कर दिया। इसमें बड़ी तादाद में वह ओबीसी और दलित वोटर भी शामिल है, जो आमतौर पर भाजपा को सहयोग करता रहा है।

भाजपा की पकड़ से रेत की तरह निकल गया आधा यूपी
विपक्ष की इस कहानी के खंडन के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक से कोशिश की गई। लेकिन, आरक्षण खत्म होने का डर इस तरह से फैलाया गया कि बसपा के दलित वोट बैंक का भी एक बड़ा हिस्सा सपा-कांग्रेस की ओर झुक गया और उन्हें देखकर मुस्लिम मतदाताओं ने भी बहुत ही रणनीतिक मतदान किया। भाजपा के अपने ओबीसी-दलित वोट विपक्षी दलों की ओर खिसकने और बसपा के वोट बैंक में सेंध लग जाने से पार्टी को बहुत बड़ा नुकसान हो गया।

भतीजे पर मायावती के ऐक्शन से हो गया भाजपा के साथ 'खेल'
भाजपा के अंदर यह मंथन चलने की बात है कि अगर वाकई बीएसपी के अकेले चुनाव लड़ने से त्रिकोणीय मुकाबला होता तो पार्टी की हालत इतनी बुरी नहीं होती। लेकिन, ऐसा क्या हो गया कि मायावती अपने कोर वोटर को भी नहीं रोक पाईं?

इसके बारे में कहा जा रहा है कि जिस तरह से बीएसपी चीफ ने बीच चुनाव अभियान के दौरान अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी और भतीजे आकाश आनंद को चुनावों से दूर कर दिया, उससे बीजेपी को बहुत नुकसान हो गया। वह भाजपा के खिलाफ बहुत ही ज्यादा हमलावर हो रहे थे। सपा-कांग्रेस ने मायावती के इस कदम का फायदा उठाया और यह आरोप लगाने लगे कि आकाश को बीजेपी के इशारे पर चुनावों से दूर किया गया है।

इस 'दोस्त' की 'दुश्मनी' भली!
सूत्रों का कहना है कि भाजपा में एक बड़े वर्ग को लगता है कि पार्टी को जोरदार निशाना बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी, उसके लिए ज्यादा कारगर साबित हो सकती है। ताकि बीजेपी-विरोधी दलित और मुस्लिम वोट विपक्षी खेमे की ओर गोलबंद न होने पाए। आने वाले समय में यूपी की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन दिख सकता है।

यूपी की 80 सीटों में से सपा की अगुवाई वाले इंडिया ब्लॉक को 43 और बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को 36 सीटें मिली हैं। जबकि, 2019 में बीजेपी अकेले यूपी में 63 सीटें जीती थी और उसकी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) को 2 सीटें मिली थी। जबकि, तब सपा और बसपा का गठबंधन भी था और तब भी वे कुल 15 सीट जीत सके थे और 1 सीट कांग्रेस के खाते में गई थी।

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