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Mahakumbh Aur Roshni: लालटेन से सोलर लाइट तक, 70 साल में कैसे बदल गया कुंभ मेले का रंग-रूप?

Mahakumbh Aur Roshni: प्रयागराज में 13 जनवरी से शुरू होने वाले महाकुंभ के लिए तैयारियां जोरों पर हैं। संगम नगरी का हर कोना रोशनी से नहाया हुआ है। सूरज ढलने के बाद भी, यहां का नजारा बिल्कुल स्वर्ग सा लगता है। इस बार 40 करोड़ तीर्थयात्रियों के स्वागत के लिए 7,000 करोड़ रुपये की लागत से बनाई गई सुपरसिटी महज 45 दिनों में तैयार की गई है।

क्या आपने कभी सोचा है कि 70 साल पहले प्रयागराज के कुंभ मेले में रोशनी कैसी होती होगी? आज जहां LED और हाईब्रिड सोलर लाइट से मेला जगमगाता है, वहीं कभी लालटेन और पेट्रोमैक्स की हल्की रोशनी से काम चलाया जाता था। आइए जानते हैं, कैसे बदलते वक्त के साथ महाकुंभ में रोशनी की दुनिया का कायाकल्प हुआ....

Mahakumbh Aur Roshni

अतीत की रोशनी: लालटेन और पेट्रोमैक्स का दौर

1940 और 50 के दशक में प्रयागराज के कुंभ मेले में रोशनी की व्यवस्था बेहद सीमित थी। उन दिनों लालटेन और पेट्रोमैक्स का उपयोग मुख्य रूप से किया जाता था। मेला क्षेत्र के बड़े हिस्से में घना अंधेरा रहता था और तीर्थयात्रियों को अपनी लालटेन लेकर चलना पड़ता था। साधुओं के अखाड़े और तंबुओं में तेल के दीयों का उपयोग होता था। यह मेला अधिकतर दिन के समय पर ही निर्भर करता था, क्योंकि रात में रोशनी की कमी के कारण गतिविधियां सीमित रहती थीं।

1954: संगम की रेती पर पहली बार बिजली, जनरेटर की शुरुआत

  • 1954 में पहली बार प्रयागराज के कुंभ मेले में बिजली के बल्ब जले थे। यह आजादी के बाद का पहला कुंभ था, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी हिस्सा लिया। उस समय बिजली एक बड़ी उपलब्धि थी, जो मेले के पूरे स्वरूप को बदलने वाली थी।
  • 1970 के दशक में बिजली के बल्बों और जनरेटर का प्रयोग शुरू हुआ। बल्बों की रोशनी ने मेला क्षेत्र को थोड़ा और रोशन किया। हालांकि, यह व्यवस्था भी सीमित थी और केवल महत्वपूर्ण स्थानों पर ही रोशनी उपलब्ध थी, जैसे संगम स्थल, मुख्य प्रवेश द्वार और प्रमुख अखाड़े।
  • 1990 के दशक में जब कुंभ का दायरा बढ़ा, तब रोशनी की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अस्थायी पोल और बड़े जनरेटर लगाए गए। मेले के दौरान रात में भीड़ प्रबंधन को सुगम बनाने के लिए अधिक क्षेत्रों में रोशनी की व्यवस्था की गई।

आधुनिक युग: LED और सोलर लाइट का जादू

2000 के दशक के बाद से महाकुंभ में क्रांतिकारी बदलाव आया। LED लाइट्स ने पारंपरिक बल्बों की जगह ले ली, जिससे बिजली की खपत कम हुई और रोशनी की गुणवत्ता बेहतर हुई। इसके अलावा, सोलर लाइटिंग तकनीक ने मेला क्षेत्र में स्थायी रोशनी की व्यवस्था को संभव बनाया। धीरे-धीरे ट्यूबलाइट्स, हेलोजन और अब LED लाइट्स ने मेले को रात में भी दिन जैसा उजाला देने में मदद की।

2019 के कुंभ मेले में, प्रयागराज को 'लाइट सिटी' में तब्दील कर दिया गया था। हजारों हाइब्रिड सोलर लाइट्स और LED लाइट्स ने मेला क्षेत्र को रात में जगमग कर दिया। 2025 के महाकुंभ में इस व्यवस्था को और भी उन्नत किया गया है। पूरे क्षेत्र में स्मार्ट लाइटिंग सिस्टम लगाए गए हैं, जो न केवल ऊर्जा की बचत करते हैं, बल्कि रोशनी को जरूरत के अनुसार नियंत्रित भी करते हैं।

महाकुंभ 2025: हाईब्रिड सोलर लाइट का युग

2025 के महाकुंभ के लिए, 7,000 करोड़ रुपये की लागत से 40 करोड़ तीर्थयात्रियों के लिए एक अस्थायी 'सुपरसिटी' बनाई गई है। यहां आधुनिक तकनीक का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। शाम ढलते ही संगम नगरी में सांस्कृतिक प्रकाश प्रदर्शन और डिजिटल प्रोजेक्शन से आस्था और तकनीकी का मेल देखने को मिलता है।

महाकुंभ 2025 में, 4,000 हेक्टेयर क्षेत्र में 2,004 हाईब्रिड सोलर लाइट्स लगाई जाएंगी। ये लाइटें बिजली कटौती रोकने में मदद करेंगी। मेला क्षेत्र में 68,000 एलईडी लाइट्स, 85 जेनरेटर और 50,000 खंभे लगाए जा रहे हैं। इस व्यवस्था पर 209 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

आस्था और तकनीक का संगम

महाकुंभ में प्रकाश व्यवस्था का यह सफर न केवल तकनीकी प्रगति की कहानी है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे भारत ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा है। लालटेन से लेकर LED और सोलर तक की यह यात्रा हमें न केवल हमारे अतीत की याद दिलाती है, बल्कि भविष्य के प्रति भी आशान्वित करती है।

बिजली विभाग ने मेले की सभी तैयारियां पूरी करने के लिए 1,543 किलोमीटर लंबी लाइन बिछाई है, जिसमें 1,405 किलोमीटर एलटी लाइन और 138 किलोमीटर एचटी लाइन शामिल हैं। इसके अलावा, 85 अस्थायी बिजली घर, 15 आरएमयू और 42 नए ट्रांसफार्मर भी लगाए जाएंगे।

पुराने समय से जुड़े किस्से

1954 में, जब कुंभ मेले में पंडित नेहरू ने मौनी अमावस्या पर स्नान किया, तो भगदड़ मच गई थी। उस समय गंगा पर सैनिकों ने अस्थायी पुल बनाया था। बुलडोजर का इस्तेमाल स्नान घाट तैयार करने के लिए किया गया था। आज जहां चाट-पकौड़ी की दुकानें और झूले आम बात हैं, वहीं तब भी छोटी दुकानें लगती थीं, हालांकि झूले नहीं दिखते थे।

डाक्यूमेंट्री में पुरानी यादें

1954 के कुंभ पर बनी एक डाक्यूमेंट्री यूट्यूब पर वायरल हुई है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक करोड़ श्रद्धालु उस समय मेले में आए थे। नागा संन्यासियों के दर्शन, गंगा घाट की झलक और आनंद भवन जैसे स्थलों को भी इसमें कैद किया गया है।

विदेशी श्रद्धालुओं का जुड़ाव

महाकुंभ की महिमा केवल भारत तक सीमित नहीं रही। अमेरिका में रहने वाले ओम ने लिखा, "मैं अमेरिकन हिंदू हूं और पहली बार अपने बेटे के साथ कुंभ मेले में आऊंगा।" इस्कॉन के एक सदस्य ने भी 2025 के कुंभ में हिस्सा लेने की इच्छा जताई।

महाकुंभ 2025 से जुड़ी रोचक बातें (Mahakumbh 2025 Interesting Facts)

  • 4.25 लाख बिजली कनेक्शन दिए जाएंगे।
  • 67,000 स्ट्रीट लाइट्स पूरे मेला क्षेत्र को रोशन करेंगी।
  • 209 करोड़ रुपये बिजली की व्यवस्था पर खर्च किए जाएंगे।
  • 85 अस्थायी बिजली घर और 68,000 एलईडी लगाए जाएंगे।
  • 2,004 हाईब्रिड सोलर लाइट्स बिजली कटौती को रोकेंगी।

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