Mamata Banerjee की TMC हो गई खाली? तिल-तिलकर कैसे टूटे 64 MLA-22 MP, एक झटके में 28 साल पीछे 'दीदी' को धकेला
Mamata Banerjee TMC Rebel: पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूकंप आ गया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC), जो 2011 से लगातार सत्ता में है और 28 साल पहले कांग्रेस से अलग होकर बनी थी, अब तिल-तिलकर टूट रही है। एक सप्ताह के अंदर 58 विधायक अलग, 20 लोकसभा सांसद बागी और 2 राज्यसभा सांसद इस्तीफा दे चुके। कुल 64 विधायक, 22 सांसद, यानी पार्टी का आधा से ज्यादा संसदीय बल खाली हो गया।
काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले बागी गुट ने 19 लोकसभा सांसदों की लिस्ट जारी कर दी, जिसमें ममता की करीबी सायोनी घोष, यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नाम शामिल हैं। क्या यह 'दीदी' के 28 साल पुराने साम्राज्य का अंत है? या सिर्फ एक बड़ा झटका? आइए इस पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं - टूट की टाइमलाइन, बागियों के नाम, TMC का जन्म, और वो 5 बड़ी वजहें, जिन्होंने पार्टी को अंदर से खोखला कर दिया...

Mamata Banerjee TMC Rebel Timeline: टूट की ताजा टाइमलाइन, 3 दिन में तबाही
8 जून को काकोली घोष ने दावा किया कि उन्होंने 20 लोकसभा सांसदों के समर्थन वाला पत्र स्पीकर ओम बिरला को भेज दिया है। 10 जून को राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और पद दोनों से इस्तीफा दे दिया। इससे पहले 8 जून को ही सुखेंदु शेखर रॉय (13 साल तक TMC के राज्यसभा मुख्य सचेतक) ने इस्तीफा दिया। लोकसभा में TMC के कुल 28 सांसद थे। बागी गुट का दावा है कि 20 सांसद अब उनके साथ हैं। जारी लिस्ट में 19 नाम ही शामिल हैं। आइए जानते हैं...
1. Sayani Ghosh (जादवपुर)

सायोनी घोष पश्चिम बंगाल की अभिनेत्री, टीवी प्रस्तोता और तृणमूल कांग्रेस की युवा नेता हैं। उनका जन्म 1993 में कोलकाता में हुआ। उन्होंने बंगाली फिल्मों और धारावाहिकों से पहचान बनाई। 2021 में वे तृणमूल कांग्रेस की युवा इकाई की अध्यक्ष बनीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जादवपुर सीट से जीत दर्ज की। सायोनी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और युवाओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के करीबी नेताओं में उनकी गिनती होती है। राजनीति में आने से पहले वे मनोरंजन जगत का जाना-पहचाना चेहरा थीं।
2. Mala Roy

माला रॉय तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और कोलकाता दक्षिण लोकसभा सीट से सांसद हैं। उन्होंने स्थानीय निकाय राजनीति से अपना करियर शुरू किया और कोलकाता नगर निगम में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। 2019 और 2024 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। वे शहरी विकास, महिला कल्याण और नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाती हैं। पार्टी संगठन में भी उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में उन्हें अनुभवी और जमीनी नेता के रूप में जाना जाता है।
3. Yusuf Pathan

यूसुफ पठान भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व ऑलराउंडर हैं। 2007 टी-20 विश्व कप और 2011 क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहे। 2024 में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें बहारामपुर से उम्मीदवार बनाया, जहां उन्होंने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को हराकर बड़ी जीत हासिल की। गुजरात के बड़ौदा से आने वाले यूसुफ खेल जगत की लोकप्रिय हस्ती हैं। राजनीति में उनका प्रवेश तृणमूल की नई रणनीति का हिस्सा माना गया। वे खेल और युवा विकास से जुड़े मुद्दों पर विशेष रुचि रखते हैं।
4. Abu Taher Khan

अबू ताहेर खान पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद क्षेत्र के अनुभवी नेता हैं। वे लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हुए हैं और अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में मजबूत जनाधार रखते हैं। 2024 में उन्होंने मुर्शिदाबाद लोकसभा सीट से जीत हासिल की। स्थानीय राजनीति में संगठन निर्माण और जनसंपर्क उनकी प्रमुख ताकत मानी जाती है। वे क्षेत्रीय विकास, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं। पार्टी नेतृत्व के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें जिले के प्रमुख नेताओं में शामिल करती है।
5. Partha Bhowmick
पार्थ भौमिक तृणमूल कांग्रेस के युवा और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। वे पहले पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। 2024 में उन्होंने रानाघाट लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। उत्तर 24 परगना जिले की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। संगठनात्मक क्षमता और चुनावी प्रबंधन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। अभिषेक बनर्जी के करीबी नेताओं में भी उनका नाम लिया जाता है। वे राज्य और केंद्र के बीच विकास योजनाओं को लेकर सक्रिय रहते हैं।
6. Jagadish Chandra Barma Basunia
जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया कूचबिहार क्षेत्र के प्रमुख तृणमूल नेता हैं। वे राजबंशी समुदाय से आते हैं और उत्तर बंगाल की राजनीति में प्रभाव रखते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कूचबिहार सीट जीती। किसान, सीमावर्ती इलाकों के विकास और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है। पार्टी ने उन्हें उत्तर बंगाल में संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी भी दी है। वे जमीनी राजनीति और स्थानीय जनसमस्याओं को संसद तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं।
7. Kalipada Soren
कालिपदा सोरेन झारग्राम क्षेत्र से सांसद हैं और आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। 2024 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल कर संसद पहुंचे। आदिवासी अधिकार, वन संसाधन, शिक्षा और रोजगार उनके प्रमुख मुद्दे हैं। पश्चिम मेदिनीपुर और झारग्राम के ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। वे राज्य सरकार की जनकल्याण योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।
8. Dev Adhikari
देव अधिकारी, जिन्हें फिल्मी दुनिया में "देव" के नाम से जाना जाता है, बंगाली सिनेमा के सुपरस्टार हैं। उन्होंने 2014 से राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की और कई बार सांसद चुने गए। 2024 में घाटाल सीट से फिर जीत हासिल की। अभिनय, फिल्म निर्माण और राजनीति-तीनों क्षेत्रों में उनकी पहचान है। वे युवा मतदाताओं में बेहद लोकप्रिय हैं। तृणमूल कांग्रेस उन्हें पार्टी के स्टार प्रचारकों में शामिल करती है। सामाजिक कार्यों और राहत अभियानों में भी उनकी भागीदारी देखी जाती है।
9. Arup Chakraborty
अरूप चक्रवर्ती पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा क्षेत्र से सांसद हैं। वे संगठनात्मक राजनीति से उभरकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। 2024 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। ग्रामीण विकास, सड़क, सिंचाई और रोजगार उनके प्रमुख मुद्दे हैं। बांकुड़ा जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में उन्होंने पार्टी का आधार मजबूत करने में भूमिका निभाई है। वे पार्टी के जमीनी नेताओं में गिने जाते हैं और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।
10. Bapi Haldar
बापी हलदार दक्षिण 24 परगना जिले के प्रमुख तृणमूल नेता हैं। 2024 में मथुरापुर लोकसभा सीट से जीतकर सांसद बने। वे लंबे समय से संगठन और पंचायत राजनीति में सक्रिय रहे हैं। सुंदरबन क्षेत्र के विकास, मत्स्य उद्योग, तटीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन उनके प्रमुख मुद्दे हैं। स्थानीय स्तर पर जनता से सीधे संवाद और संगठन विस्तार के लिए वे जाने जाते हैं। पार्टी नेतृत्व ने उन्हें दक्षिण बंगाल में मजबूत जनाधार वाले नेताओं में शामिल किया है।
11. Kakoli Ghosh Dastidar

काकोली घोष दस्तीदार पेशे से चिकित्सक हैं और तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ सांसद हैं। वे 2009 से लगातार बारासात लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। संसद में स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दों पर मुखर रही हैं। चिकित्सा क्षेत्र की बैकग्राउंड होने के कारण स्वास्थ्य नीति पर उनकी विशेष पकड़ मानी जाती है। वे पार्टी की प्रमुख महिला चेहरों में शामिल हैं और ममता बनर्जी की विश्वसनीय नेताओं में गिनी जाती हैं।
12. June Malia

जून मालिया बंगाली फिल्म और टेलीविजन जगत की प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं। उन्होंने सामाजिक कार्यों से शुरुआत कर राजनीति में प्रवेश किया। 2021 में पहली बार विधायक बनीं और 2024 में मेदिनीपुर लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल को हराकर सुर्खियां बटोरीं। ममता बनर्जी की सांस्कृतिक और महिला नेतृत्व रणनीति का महत्वपूर्ण चेहरा मानी जाती हैं। कला, संस्कृति और महिला सशक्तिकरण उनके प्रमुख विषय हैं।
13. Shatrughan Sinha

शत्रुघ्न सिन्हा हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और अनुभवी राजनेता हैं। वे पहले भाजपा में रहे, बाद में कांग्रेस और फिर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए। 2022 के उपचुनाव और 2024 के चुनाव में आसनसोल से सांसद बने। "खामोश" संवाद के लिए मशहूर शत्रुघ्न सिन्हा राष्ट्रीय राजनीति में चार दशक से अधिक समय से सक्रिय हैं। वे केंद्र सरकार के मंत्री भी रह चुके हैं। संसदीय अनुभव और जनसंपर्क उनकी प्रमुख ताकत है।
14. Sharmila Sarkar

शर्मिला सरकार पूर्वी बर्धमान क्षेत्र से सांसद हैं। वे लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस संगठन से जुड़ी रही हैं। 2024 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। संगठनात्मक कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। स्थानीय स्तर पर महिला नेतृत्व को मजबूत करने में भी उन्होंने काम किया है।
15.

16. Satabdi Roy

सताब्दी रॉय बंगाली फिल्म उद्योग की चर्चित अभिनेत्री और तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ सांसद हैं। 2009 से लगातार बीरभूम लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। वे पार्टी की सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिनी जाती हैं। संसद में महिला अधिकार, ग्रामीण विकास और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को उठाती रही हैं। फिल्मी लोकप्रियता और राजनीतिक अनुभव का अनूठा मिश्रण उनकी पहचान है।
17. Mitali Bag
मिताली बाग तृणमूल कांग्रेस की युवा महिला नेता हैं। 2024 में आरामबाग लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं। उन्होंने जमीनी राजनीति और संगठनात्मक कार्यों के जरिए अपनी पहचान बनाई। ग्रामीण महिलाओं, किसानों और सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। पार्टी उन्हें नई पीढ़ी के नेतृत्व का प्रतिनिधि मानती है। क्षेत्रीय विकास और रोजगार सृजन उनके प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल हैं।
18. Asit Kumar Mal
असित कुमार माल पश्चिम बंगाल के बोलपुर क्षेत्र से सांसद हैं। वे पहले भी लोकसभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ग्रामीण विकास, कृषि और आदिवासी क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर उनकी सक्रियता देखी जाती है। संगठनात्मक राजनीति में लंबे अनुभव के कारण उन्हें पार्टी का मजबूत जमीनी नेता माना जाता है। वे संसद में स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं और क्षेत्रीय विकास योजनाओं की निगरानी में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
19. Khalilur Rahaman
खलीलुर रहमान पश्चिम बंगाल के जंगीपुर क्षेत्र से सांसद हैं। वे लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हुए हैं और मुर्शिदाबाद क्षेत्र में मजबूत राजनीतिक प्रभाव रखते हैं। शिक्षा, अल्पसंख्यक कल्याण, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास के मुद्दों पर उनकी विशेष रुचि है। स्थानीय राजनीति में उनकी पहचान एक सुलभ और जमीनी नेता की रही है। पार्टी संगठन और क्षेत्रीय जनसंपर्क में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
विधानसभा में स्थिति और गंभीर है। TMC के 80 विधायकों में से 58 ने 3 जून को अलग गुट बना लिया। अब 10 जून को टीएमसी के ही नेता ऋतब्रता बनर्जी (Ritabrata Banerjee) बनर्जी ने दावा किया कि अभी संख्या 64 है। ये लोग स्पीकर को पत्र सौंपेंगे। बागी गुट खुलकर कह रहा है कि वे कांग्रेस में विलय नहीं कर रहे, बल्कि अलग ताकत बनाएंगे। राज्यसभा में TMC के 13 सांसद थे, अब 2 इस्तीफे हो चुके। कुल 22 सांसद TMC से अलग हो चुके। यह आंकड़ा पार्टी के लिए करारी चोट है।
राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे: तीखे हमले
सुष्मिता देव असम की सिलचर से पूर्व कांग्रेस सांसद रह चुकी हैं। 2019 में हार के बाद TMC जॉइन की, तेजी से ऊपर आईं और राष्ट्रीय प्रवक्ता बनीं। उनका इस्तीफा ममता खेमे के लिए बड़ा झटका है।
सुखेंदु शेखर रॉय ने इस्तीफा पत्र में ममता को सीधा निशाना बनाया। उन्होंने लिखा कि बंगाल की जनता ने पार्टी के व्यापक भ्रष्टाचार, महिलाओं पर घोर उत्पीड़न, शिक्षा-स्वास्थ्य-उद्योग-रोजगार और कानून व्यवस्था में अराजकता को अस्वीकार कर दिया है। यह पत्र TMC के अंदरूनी गुस्से को उजागर करता है।

अब एक नजर डालते हैं TMC की बुनियाद पर...
TMC का जन्म: कांग्रेस से बगावत का 28 साल पुराना इतिहास
ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर All India Trinamool Congress (TMC) का गठन किया। तब वे पश्चिम बंगाल कांग्रेस की आक्रामक चेहरा थीं। उनका आरोप था कि कांग्रेस वाम मोर्चे (खासकर CPM) के खिलाफ सही लड़ाई नहीं लड़ रही।
'तृणमूल' नाम का मतलब ही 'जमीनी स्तर' या 'घास की जड़ें' है। पार्टी का चुनाव चिह्न 'घास-फूल' इसी का प्रतीक बना। ममता ने आम लोगों, किसानों और निम्न-मध्यम वर्ग को अपना आधार बनाया। शुरुआती सालों में TMC ने BJP के NDA के साथ गठबंधन भी किया था। 1998-99 के लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया और ममता केंद्र में रेल मंत्री बनीं।
सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट सिंगूर (2006) और नंदीग्राम (2007) आंदोलन थे। इन किसान आंदोलनों ने ममता को ग्रामीण बंगाल में मजबूत जनसमर्थन दिलाया। 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर TMC ने 34 साल पुराने वाम शासन को उखाड़ फेंका। ममता बनर्जी पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। तब से TMC बंगाल की सबसे बड़ी ताकत बनी रही। टूट और बगावत के बाद अब वही पार्टी 28 साल बाद लगभग उसी स्थिति में दिख रही है, जैसे प्रारंभिक दौर में थी।
TMC में फूट क्यों? 5 बड़ी वजहें
- विधानसभा चुनाव में भारी हार: हालिया चुनावी हार ने पार्टी में असंतोष को भड़का दिया। कई नेताओं ने हार के लिए संगठनात्मक कमियों और गलत रणनीति को जिम्मेदार ठहराया।
- अभिषेक बनर्जी का बढ़ता विरोध: बागी गुट खुलकर अभिषेक बनर्जी (ममता के भतीजे) के एकाधिकार वाले फैसलों पर सवाल उठा रहा है। उन्हें लगता है कि पार्टी अब कुछ लोगों के परिवार तक सिमट गई है।
- नेता प्रतिपक्ष का विवाद: ममता गुट और बागी गुट ने अलग-अलग नाम आगे बढ़ाए। कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले ने आग में घी डाला।
- भ्रष्टाचार और अराजकता का आरोप: बागी नेता खुले तौर पर भ्रष्टाचार, महिलाओं पर अत्याचार, शिक्षा-स्वास्थ्य में विफलता और कानून व्यवस्था की बदहाली का जिक्र कर रहे हैं। सुखेंदु शेखर रॉय का पत्र इसी का प्रमाण है।
- लंबा असंतोष और गुटबाजी: विधायकों-सांसदों में सालों से खीज थी। चुनावी हार ने इसे खुली बगावत में बदल दिया।
'दीदी' पर क्या असर?
ममता बनर्जी TMC की संस्थापक, राष्ट्रीय अध्यक्ष और सबसे बड़ा चेहरा हैं। लेकिन इस टूट ने उनकी एकछत्र सत्ता को चुनौती दी है। अगर 58 विधायक स्पीकर के सामने पेश होते हैं तो विधानसभा में भी संकट गहरा सकता है। लोकसभा में 20 सांसदों के बागी होने से संसद में TMC की ताकत आधी से कम हो गई।
आगे क्या?
बागी गुट अभी कांग्रेस में विलय से इनकार कर रहा है। वे खुद को अलग ताकत के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। ममता गुट अब अपनी बची हुई ताकत को संभालने और नुकसान कम करने की कोशिश में जुटा है।
यह टूट सिर्फ संख्याओं की नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति के बदलते समीकरण की कहानी है। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर साम्राज्य बनाने वाली ममता, 2026 में अपनी ही पार्टी के टूटने का दर्द महसूस कर रही हैं। क्या 'दीदी' इस संकट से उबर पाएंगी? या TMC का 'तृणमूल' अब सचमुच जड़ों से हिल गया है? बंगाल की राजनीति फिर से रोमांचक दौर में प्रवेश कर चुकी है।













Click it and Unblock the Notifications