Udaipur City Palace Dispute: क्या है उदयपुर का सिटी पैलेस, जो महाराणा प्रताज के वंशजों के लिए बना 'अखाड़ा'?
City Palace Udaipur Rajasthan: राजस्थान के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक झीलों की नगरी उदयपुर के बीच स्थित है सिटी पैलेस, जो 25 नवंबर 2024 से महाराणा प्रताप के वंशजों के बीच अखाड़ा बना हुआ है। विश्वराज सिंह मेवड़ा (Vishwaraj Singh Mewar) राजतिलक के बाद धूणी माता के दर्शन करने के लिए उदयपुर के सिटी पैलेस में प्रवेश करना चाह रहे थे, मगर अरविंद सिंह मेवाड़ (Arvind Singh Mewar) व उनके बेटे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ (Lakshyaraj Singh Mewar) ने सिटी पैलेस का दरवाजा बंद करवा दिया।
सिटी पैलेस उदयपुर आखिर है क्या? जो दो दिन से दो 'राजकुमारों' के बीच अखाड़ा बना हुआ है। पूर्व का वेनिस कहे जाने वाले उदयपुर में किसने और कब सिटी पैलेस की नींव रखी? उदयपुर के सिटी पैलेस में क्या खास है? आईए जानते इन सारे सवालों के जवाब।
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सिटी पैलेस उदयपुर का इतिहास (City Palace Udaipur History)
विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उदयपुर का सिटी पैलेस एक तरह का राज महल है, जिसका वर्तमान स्वरूप मेवाड़ राजवंश के कई शासकों के योगदान व करीब 400 साल की अवधि में बना है। मेवाड़ साम्राज की शुरुआत उदयपुर से 30 किलोमीटर नागदा से हुई थी। 8वीं शताब्दी में राजधानी को चित्तौड़गढ़ ले जाया गया, जहां से सिसोदिया राजपूतों ने करीब 800 साल तक राज किया। महाराजा उदयसिंह द्वितीय ने 1537 में मुगलों के साथ जंग में चित्तौड़ किले पर नियंत्रण खोने के संकेत मिलने लगे थे।
ऐसे में नए राज्य के लिए महाराणा उदयसिंह द्वितीय ने सन 1553 में अरावली पर्वत श्रृंखला में पिछोला झील के पूर्वी तट वाली जगह को चुना, क्योंकि यह स्थान जंगल, झीलों से चारों तरफ से सुरक्षित था। राजस्थानी राजपूत वास्तुकला से बने सिटी पैलेस में सबसे शाही ढांचा बनाया गया, जिसे रॉयल प्रांगण या राय आंगन नाम दिया गया। 1572 में उदय सिंह की मृत्यु के बाद उनके बेटे महाराणा प्रताप ने उदयपुर की सत्ता संभाली। 1576 में मुगल सम्राट अकबर के खिलाफ हल्दीघाटी के प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद राज्य की कमान अमर सिंह प्रथम के हाथ में आई।
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फिर 1761 तक मराठों के बढ़ते हमलों के कारण उदयपुर और मेवाड़ राज्य की स्थिति बहुत खराब हो गई और वे खंडहर में तब्दील हो गए। 1818 तक महाराणा भीम सिंह ने अंग्रेजों के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर किए और अन्य साम्राज्यों के खिलाफ उनकी सुरक्षा स्वीकार कर ली।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, मेवाड़ साम्राज्य, राजस्थान की अन्य रियासतों के साथ, 1949 में लोकतांत्रिक भारत में विलीन हो गया। मेवाड़ के राजाओं ने बाद में अपने विशेष शाही विशेषाधिकार और उपाधियाँ भी खो दीं। हालाँकि, बाद के महाराणाओं ने उदयपुर के सिटी पैलेस समेत अन्य महलों पर अपना स्वामित्व बनाए रखा। सिटी पैलेस उदयपुर के कुछ हिस्सों को हेरिटेज होटलों व संग्रहालय (City Palace Museum Udaipur) में बदल दिया, जो दुनिया सबसे खूबसूरत होटलों में से एक है।
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सिटी पैलेस उदयपुर में क्या-क्या है?
उदयपुर के सिटी पैलेस के अंदरूनी हिस्से में बालकनी, मीनारें और गुंबदों के साथ-साथ नाज़ुक दर्पण-कार्य, संगमरमर-कार्य, भित्ति चित्र, दीवार पेंटिंग, चांदी-कार्य, जड़ाऊ-कार्य और रंगीन कांच के अवशेष देखने लायक हैं।
सिटी पैलेस की ऊपरी छतों से झील और उदयपुर शहर का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है। परिसर के भीतर महल कई चौकों या चतुर्भुजों के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं जिनके गलियारे टेढ़े-मेढ़े हैं।
सिटी पैलेस में मोर चौक ( मोर प्रांगण), दिलखुश महल (दिल को प्रसन्न करने वाला), सूर्य चौपड़, शीश महल (कांच और दर्पणों का महल), मोती महल (मोतियों का महल), कृष्ण विलास (भगवान कृष्ण के नाम पर), शंभू निवास (अब शाही निवास), भीम विलास, अमर विलास (एक ऊंचे बगीचे के साथ) जो बड़ी महल (बड़ा महल), कृष्ण विलास, दरबार हॉल, फतहप्रकाश महल और शिव निवास पैलेस आदि हैं।
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उदयपुर सिटी पैलेस कैसे पहुंचे? (How To Reach Udaipur City Palace)
दिल्ली-जयपुर से बस, ट्रेन व हवाई जहाज के जरिए पहुंच आसान है। इसके बाद शहर से मुख्य प्रवेश 'बड़ी पोल' (बड़ा द्वार) से होते हुए सिटी पैलेस तक पहुंचा जा सकता है। सिटी पैलेस के मुख्य ब्लॉक में गणेश ड्योढ़ी छत से एक मामूली दरवाज़े के ज़रिए पहुँचा जा सकता है।
उदयपुर सिटी पैलेस विवाद पर क्या बोले विश्वराज सिंह मेवाड़?
25 नवंबर को उदयपुर सिटी पैलेस विवाद पर विश्वराज सिंह मेवाड़ ने मीडिया से बातचीत में कहा कि घटना दुखद है। ठेस पहुंची। हम केवल एकलिंगजी मंदिर और धूणी माता के धोक लगाने जा रहे थे। छोटी सी बात को बड़ा बना दिया गया। कुछ लोगों पर पत्थरबाजी भी की गई। सिटी पैलेस पजेशन उनका है। लड़ाई-झगड़ा न हो इसलिए मैं नहीं जा रहा हूं।

उदयपुर सिटी पैलेस विवाद क्या है? (What is Udaipur City Palace controversy)
दरअसल, साल 1955 में भगवंत सिंह मेवाड़ के महाराणा बने थे। उनके दो बेटे थे महेंद्र सिंह व अरविंद सिंह। महाराणा बनने के बाद भगवंत सिंह ने मेवाड़ में अपनी पैतृक संपत्तियों को बेचना या लीज पर देना शुरू किया था।
पैतृक संपत्तियों को बेचना या लीज पर देने की बात भगवंत सिंह के बड़े बेटे महेंद्र सिंह को पसंद नहीं आई तो वे उनसे नाराज हो गए और पैतृक संपत्तियों को हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत बांटने की मांग की। अपने पिता के खिलाफ केस तक दायर कर दिया।
भगवंत सिंह ने 15 मई 1984 को अपनी वसीयत में छोटे बेटे अरविंद सिंह को संपत्तियों का एक्ज्यूक्यूटर बना दिया। साथ ही महेंद्र सिंह को ट्रस्ट और संपत्ति से बेदखल कर दिया गया। 3 नवंबर 1984 को भगवंत सिंह का निधन हो गया था।
भगवंत सिंह के बेटे महेंद्र सिंह व अरविंद सिंह के परिवार के बीच 1984 से संपत्ति विवाद चल रहा था। अब यही विवाद महेंद्र सिंह बेटे विश्वराज सिंह और अरविंद सिंह के बेटे लक्ष्यराज सिंह तक पहुंच गया।
हुआ यूं कि पूर्व सांसद महेंद्र सिंह मेवाड़ का 10 नवंबर 2024 को निधन हो गया था। इस पर नाथद्वारा से भाजपा विधायक व उनके बेटे विश्वराज सिंह मेवाड़ 25 नवंबर को 2024 सुबह चितौड़गढ़ में महेंद्र सिंह मेवाड़ के 77वें उत्तराधिकारी के तौर पर विश्वराजसिंह मेवाड़ का राजतिलक दस्तूर हुआ।
राजतिलक के बाद विश्वराज सिंह मेवाड़ राजपरिवार की पंरपरा के उदयपुर सिटी पैलेस में धुणी माता के दर्शन करने पहुंचे। सिटी पैलेस विश्वराजसिंह मेवाड़ के चाचा अरविंद सिंह मेवाड़ व उनके बेटे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के पास है। अरविंद सिंह मेवाड़ ने सिटी पैलेस के दरवाजे बंद कर दिए और विश्वराजसिंह मेवाड़ को प्रवेश नहीं करने दिया। जिसके बाद से सिटी पैलेस राजपरिवारों के बीच अखाड़ा बना हुआ है।
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