Ajit Pawar ने प्रदेश की राजनीति में और बढ़ाया अपना कद, अब यहां चाचा शरद पवार को दी मात
Ajit Pawar News: महाराष्ट्र की राजनीति में सहकारी चीनी मिलों की बड़ी भूमिका रही है। एक समय में बारामती में इन बोर्ड पर शरद पवार परिवार का कब्जा रहता था। चीनी मिल के बोर्ड चुनाव के नतीजे प्रदेश की राजनीति में धमक को बताने के लिए काफी होते थे। पवार परिवार में फूट के बाद इस बार सहकारी चीनी मिलों के बोर्ड का चुनाव अहम माना जा रहा था। हालांकि, यहां भी अजित पवार का जलवा नजर आया है। मालेगांव सहकारी चीनी मिल के 21 सदस्यीय बोर्ड के चुनाव नतीजों में कैटेगरी बी में अजित पवार विजेता बने हैं। महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम ने 101 में से 91 वोट हासिल किए, जबकि उनके विरोधी को केवल 10 वोट मिले थे।
Ajit Pawar के लिए यह चुनाव था प्रतिष्ठा का प्रश्न
बारामती में शुगर बॉडी पर सत्ता हासिल करना अजित पवार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न था। अपने गृहक्षेत्र में वह खुद को निर्विवाद नेता के तौर पर पेश करना चाहते हैं और विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद चीनी मिल की सत्ता पर अपना वर्चस्व दिखाकर उन्होंने इसे साबित कर दिया है। बारामती ही नहीं महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था और राजनीति में चीनी मिल दशकों से बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं और इसे प्रदेश की सत्ता के गलियारों का एक एक्सटेंशन ही समझा जाता है।

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एनसीपी नेता किरन गूजर ने बताया कि चुनाव में क्षेत्र के गन्ना किसानों के समूह 'ए' में 19,549 मतदाता शामिल थे। चीनी मिल से संबद्ध अलग-अलग सहकारी निकायों के सदस्यों वाले समूह 'बी' में 102 मतदाता थे। चुनाव 21 सदस्यीय निदेशक मंडल के लिए हो रहा था और विभिन्न पैनलों के बैनर तले चुनाव लड़ा गया था। अजित पवार के नेतृत्व वाला पैनल नीलकंठेश्वर था। यह चुनाव अजित पवार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहां भी उनका सामना चाचा शरद पवार से हुआ था। शरद पवार खुद सीधे तौर पर चुनाव में शामिल नहीं थे, लेकिन उनके समर्थन वाला पैनल बलिराजा सहकार शामिल हुआ था।
Ajit Pawar ने 1984 में लड़ा था चीनी मिल बोर्ड का चुनाव लड़ा
अजित पवार के लिए यह चुनाव क्यों महत्वपूर्ण था, इससे समझ सकते हैं कि आखिरी बार 1984 में चीनी मिल बोर्ड का चुनाव लड़ा था। तब उन्होंने बारामती क्षेत्र में छत्रपति सहकारी चीनी मिल के निदेशक मंडल में काम किया था। चार दशक के बाद वह चुनाव में शामिल हुए हैं। इसकी वजह है कि महाराष्ट्र की राजनीति में छोटे सहकारी समूह चुनावी गुणा-गणित में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन सहकारी समूहों और इनके पदाधिकारियों का स्थानीय राजनीति में अच्छा खासा दखल और प्रभाव होता है। यही वजह है कि अजित पवार डिप्टी सीएम रहते हुए इस बार खुद मैदान में उतरे हैं।
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