AI का खौफनाक सच! 100 शब्द लिखने में ChatGPT-Gemini पी जाता है 1 लीटर पानी, क्यों इतने 'प्यासे' हैं AI Servers?
AI Water Consumption: क्या आपको पता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल में कितना पानी बर्बाद हो रहा है, आप जिस स्पीड से AI से सवाल पूछ रहे हैं, उसी स्पीड से धरती अपना फ्रेशवॉटर (पीने का पानी) खो रही है। स्क्रीन पर दिखने वाली इस स्मार्ट दुनिया के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है,जिसके बारे में शायद बहुत कम ही लोगों को पता है। जब आप AI से एक सवाल पूछते हैं, तो आपका हर शब्द पानी खर्च करता है।
इसको ऐसे समझिए कि आप जब ChatGPT, Claude या Gemini जैसे AI ऐप पर अगर आप सिर्फ 100 शब्द भी टाइप करते है तो उसके लिए एक पानी की बोतल जितना पानी इस्तेमाल होता है। AI का इस्तेमाल हमें वॉटर क्राइसिस की ओर धकेल सकता है। आइए इस पूरे मामले को हर डिटेल का ब्रेकडाउन करके समझते हैं।

दुनिया के कुल पानी में सिर्फ 3% ही फ्रेश वॉटर है, यानी ऐसा पानी जो इंसानों के इस्तेमाल लायक माना जाता है। इसमें भी सिर्फ 0.5% पानी ऐसा है, जो आसानी से उपलब्ध और पीने के लिए सुरक्षित है। इंसान बिना पानी के औसतन सिर्फ 3 दिन तक ही जिंदा रह सकता है।
दुनियाभर में सूखा और पानी की कमी लगातार बढ़ रही है, जिससे फ्रेश वॉटर का संकट गहरा रहा है। दूसरी तरफ AI और इंटरनेट चलाने वाले बड़े-बड़े Data Centers भारी मात्रा में पानी इस्तेमाल कर रहे हैं।
▶️AI का हर सवाल आपका कितना पानी इस्तेमाल कर रहा है? (AI Water Consumption)
eesi.org के मुताबिक डेटा सेंटर्स रोजाना करीब 50 लाख gallons पानी इस्तेमाल कर रहे हैं। जो 10,000 से 50,000 लोगों वाले शहर की पानी की खपत के बराबर है। ये डेटा सेंटर अपने सर्वर और प्रोसेसर को ठंडा रखने के लिए जमीन के नीचे के पानी और झील-नदियों के पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। AI जितना ज्यादा इस्तेमाल होगा, उतना ज्यादा सर्वर काम करेंगे और उतना ज्यादा पानी लगेगा।
डेटा सेंटर्स की पानी की खपत सीधे उनकी एनर्जी यूज और कार्बन डाइऑक्साइड से जुड़ी होती है। जैसे-जैसे AI और एनर्जी यूज की डिमांड बढ़ती है,वैसे-वैसे सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है, जिससे पर्यावरण पर दबाव और बढ़ जाता है।
एक मीडियम साइज डेटा सेंटर सालभर में करीब 11 करोड़ (110 मिलियन) गैलन पानी खर्च कर सकता है। यह पानी लगभग 1000 घरों की सालाना जरूरत के बराबर माना जाता है। बड़े AI डेटा सेंटर की खपत और भी डराने वाली है। कुछ बड़े डेटा सेंटर हर रोज 50 लाख गैलन तक पानी इस्तेमाल कर सकते हैं। यानी एक दिन में उतना पानी, जितना 10 हजार से 50 हजार लोगों का पूरा शहर इस्तेमाल करता है।
अमेरिका में इस समय 5,400 से ज्यादा डेटा सेंटर मौजूद हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में अमेरिकी डेटा सेंटर हर दिन करीब 44.9 करोड़ गैलन पानी इस्तेमाल कर रहे थे। सालभर में यह आंकड़ा 163 अरब गैलन से ज्यादा पहुंच जाता है। चिंता की बात यह है कि कई ऑपरेटर्स अभी भी पूरी तरह वॉटर यूज को ट्रैक नहीं करते।

▶️AI को दिया गया हर 100 शब्दों का एक Prompt मतलब 1 लीटर पानी का इस्तेमाल
चौंकाने वाली बात यह भी है कि 2016 की एक रिपोर्ट में पता चला था कि एक-तिहाई से भी कम डेटा सेंटर कंपनियां अपने पानी के इस्तेमाल को ट्रैक करती हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, रिवरसाइड के वैज्ञानिकों के मुताबिक AI को दिया गया हर 100 शब्दों का एक Prompt लगभग 1 पानी की बोतल जितना पानी खर्च करता है।
यानी अगर करोड़ों लोग हर मिनट ChatGPT जैसे AI टूल्स इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पानी की खपत कितनी तेजी से बढ़ रही होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
AI मॉडल्स को चलाने के लिए बहुत ज्यादा कैलकुलेशन करनी पड़ती है। इससे सर्वर गर्म हो जाते हैं, जिन्हें ठंडा रखने के लिए Liquid Cooling Systems का इस्तेमाल किया जाता है। यही Cooling System सबसे ज्यादा पानी खपत करते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में AI का विस्तार जितनी तेजी से होगा, पानी और बिजली की खपत भी उतनी ही तेजी से बढ़ेगी।

▶️ Data Centers में पानी और कहां-कहां यूज होता है?
डेटा सेंटर का पानी सिर्फ सर्वर ठंडा करने में ही नहीं लगता, बल्कि बिजली बनाने और चिप तैयार करने में भी भारी मात्रा में पानी खर्च होता है। किसी डेटा सेंटर का कुल "Water Footprint" तीन चीजों से मिलकर बनता है, डेटा सेंटर के अंदर इस्तेमाल होने वाला पानी, बिजली बनाने वाले पावर प्लांट्स में इस्तेमाल होने वाला पानी और चिप और प्रोसेसर बनाने में लगने वाला पानी।
डेटा सेंटर पानी कई स्रोतों से लेते हैं। नदियां, झील और भूजल, नगर निगम का पानी और रिसाइकल या साफ किया गया गंदा पानी। कई कंपनियां अब पीने लायक पानी बचाने के लिए रिसाइकल्ड या Non-Potable Water का इस्तेमाल कर रही हैं। खासकर उन इलाकों में जहां सूखा ज्यादा पड़ता है।
Water Consumption" का मतलब सिर्फ पानी लेना नहीं होता। इसका मतलब है जितना पानी लिया गया, उसमें से कितना पानी वापस सिस्टम में नहीं लौटा। ज्यादातर पानी कुलिंग के दौरान भाप बनकर उड़ जाता है। अगर डेटा सेंटक लगातार जमीन के नीचे से पानी निकालते रहें, तो ग्राउंड वाटर खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है।
टेक कंपनियां लगातार बड़े और ज्यादा ताकतवर AI डेटा सेंटर्स बना रही हैं। हर नया AI मॉडल ज्यादा चिप्स, ज्यादा बिजली और ज्यादा कूलिंग की मांग करता है। डेटा सेंटर के अंदर हजारों सर्वर एक साथ काम करते हैं। इनमें लगे GPU और CPU लगातार गर्मी पैदा करते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए पानी आधारित कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं। कई डेटा सेंटर्स में "इवेपोरेटिव कूलिंग" तकनीक इस्तेमाल होती है, जिसमें पानी भाप बनकर उड़ जाता है।

अनुमान है कि डेटा सेंटर्स द्वारा इस्तेमाल किए गए करीब 80% पानी का इवैपोरेशन में हो जाता है। सिर्फ सर्वर ही नहीं, बल्कि डेटा सेंटर्स को बिजली देने वाले कोयला और गैस आधारित पावर प्लांट भी भारी मात्रा में पानी इस्तेमाल करते हैं। यानी AI की पानी की खपत केवल डेटा सेंटर तक सीमित नहीं रहती। इसके अलावा सेमीकंडक्टर चिप्स बनाने की प्रक्रिया भी बेहद ज्यादा पानी मांगती है। एक चिप फैक्ट्री रोज़ाना करीब 1 करोड़ gallons अल्ट्राप्योर पानी इस्तेमाल कर सकती है।
अमेरिका में डेटा सेंटर की 56% बिजली अभी भी Fossil Fuel Power Plants से आती है। कोल और गैस पावर प्लांट में स्टीम बनाने के लिए भारी मात्रा में पानी चाहिए होता है। एक सरकारी रिपोर्ट मुताबिक 2023 में डेटा सेंटर्स ने लगभग 176 टेरावाट-घंटे बिजली इस्तेमाल की, जिससे अनुमान लगाया गया कि हर 1 किलोवाट-घंटे बिजली पर लगभग 1.2 गैलन पानी खर्च होता है। अंदाजा है कि 2030 तक डेटा सेंटर्स का बिजली इस्तेमाल बढ़कर 1,050 टेरावाट-घंटे तक पहुंच सकता है, जिससे पानी की खपत भी उतनी ही बढ़ जाएगी।
▶️क्या डेटा सेंटर्स अब शहरों का पानी पीने लगे हैं?
डेटा सेंटर्स की यह प्यास अब आसपास रहने वाले लोगों पर असर डालने लगी है। वर्जीनिया (Virginia) का नॉर्दर्न वर्जीनिया आज दुनिया की डेटा सेंटर कैपिटल माना जाता है। यहां 300 से ज्यादा डेटा सेंटर्स मौजूद हैं। 2023 में इन सेंटर्स ने करीब 2 बिलियन गैलेन पानी इस्तेमाल किया, जो 2019 के मुकाबले 63% ज्यादा था। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि स्थानीय वॉटर अथॉरिटी को रिक्लेम्ड वॉटर छोड़कर पोटेबल वॉटर इस्तेमाल करना पड़ा। यानी वही पानी जो सीधे लोगों के पीने और घरेलू इस्तेमाल के काम आता है।
एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही रफ्तार रही तो भविष्य में कई इलाकों में इंडस्ट्रीज और कम्युनिटीज के बीच पानी को लेकर टकराव बढ़ सकता है। अब यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, बल्कि एनवायरनमेंटल जस्टिस का सवाल बन चुका है। क्योंकि अक्सर डेटा सेंटर्स वहां बनाए जाते हैं जहां जमीन सस्ती हो और पानी आसानी से उपलब्ध हो लेकिन उसका असर स्थानीय लोगों को झेलना पड़ता है।

▶️भारत में कितने डेटा सेंटर्स हैं?
भारत दुनिया के करीब 20% डेटा बनाता है लेकिन इसके मुकाबले यहां डेटा सेंटर की कैपेसिटी अभी कम है, इसलिए तेजी से नए डेटा सेंटर्स बनाए जा रहे हैं। भारत में कई हाइपरस्केल और एज डेटा सेंटर्स मौजूद हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 1.5 GW IT लोड के आसपास है। ये डेटा सेंटर्स मुख्य रूप से नवी मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली-NCR, हैदराबाद और नोएडा जैसे बड़े शहरों में हैं। अनुमान है कि 2030 तक यह इंडस्ट्री लगभग 4 गुना तक बढ़ सकती है,जिससे पानी और बिजली की मांग में भी काफी तेज बढ़ोतरी होगी|
2025 में भारत के डेटा सेंटर्स ने मिलकर लगभग 150 अरब लीटर पानी इस्तेमाल किया। कई डेटा सेंटर्स ऐसे शहरों में स्थित हैं जहां पहले से ही पानी की कमी (water shortage) है, जैसे बेंगलुरु, जिससे स्थानीय लोगों और डेटा सेंटर्स के बीच पानी को लेकर मारामारी बढ़ रही है। कई जगहों पर डेटा सेंटर्स ग्राउंड वाटर और नगर निगम पानी दोनों का इस्तेमाल करते हैं और सूखे वाले इलाकों में टैंकर वॉटर भी लेते हैं, जिससे लोकल वॉटर रिसोर्स पर और दबाव पड़ता है।
हम साइंस और टेक्नोलॉजी की ग्रोथ को लेकर इतने ज्यादा उत्साहित हो चुके हैं कि जो लोग इसकी वजह से परेशान हो रहे हैं,उन्हें कहीं न कहीं नजरअंदाज कर रहे हैं। हालांकि यह सच है कि साइंस और AI भविष्य के लिए जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसकी कीमत धरती और पानी से चुकाई जानी चाहिए?
▶️क्या इसका कोई समाधान है?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि डेटा सेंटर्स को पूरी तरह बंद करना समाधान नहीं है, लेकिन उन्हें ज्यादा सस्टेनेबल बनाना जरूरी है। इसके लिए नई टेक्नोलॉजीज पर काम किया जा रहा है।
1️⃣इमर्शन कूलिंग: इसमें सर्वर्स को स्पेशल लिक्विड में डुबोया जाता है, जिससे गर्मी (heat) सोख ली जाती है और पानी की जरूरत कम हो जाती है।
2️⃣डायरेक्ट-टू-चिप कूलिंग: इसमें कूलेंट सीधे चिप तक पहुंचाया जाता है, जिससे पारंपरिक कूलिंग के मुकाबले कम पानी खर्च होता है।
3️⃣ट्रीटेड वेस्टवॉटर और नॉन-पोटेबल वॉटर का इस्तेमाल:कई कंपनियां गंदे या रीसाइकल किए गए पानी का इस्तेमाल कर रही हैं ताकि फ्रेशवॉटर की खपत कम हो सके।
4️⃣रिन्यूएबल एनर्जी आधारित डेटा सेंटर्स: सोलर और विंड एनर्जी से चलने वाले डेटा सेंटर्स, फॉसिल फ्यूल पावर प्लांट्स की तुलना में बहुत कम पानी इस्तेमाल करते हैं।












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