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क्या है अमेरिका का H-1B Visa? जिसके लिए देना होगा 88 लाख, क्यों भारत के लिए है बड़ा झटका

America H-1B Visa 2025: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा को लेकर बड़ा फैसला लिया है, जिसका असर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और कंपनियों पर गहरा पड़ सकता है। अब नए आवेदन के साथ कंपनियों को 100,000 डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस चुकानी होगी।

भारत जैसे देशों के प्रोफेशनल्स, जो H-1B वीजा पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं, अब इस बदलाव के कारण बड़ी मुश्किलों का सामना कर सकते हैं। इस रिपोर्ट में हम जानेंगे कि H-1B वीजा क्या है, ट्रंप ने यह कदम क्यों उठाया, और भारत के लिए इसे क्यों एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

America H-1B Visa 2025

H-1B वीजा क्या है?

बोलचाल की भाषा में H-1B वीजा समझें तो यह अमेरिका का एक वर्क वीजा है, जो खासतौर पर विदेशी प्रोफेशनल्स को काम करने की अनुमति देता है। हर साल 65,000 वीजा सामान्य श्रेणी के लिए और एडवांस डिग्री वालों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा मिलते हैं। यह तीन से छह साल के लिए होता है और कंपनियां अपने कर्मचारियों को स्पॉन्सर करती हैं। Basically, इसे लेकर विदेशी प्रोफेशनल्स अमेरिका में नौकरी कर सकते हैं और कंपनियों के लिए यह टैलेंट लाने का तरीका है।

ट्रंप के फैसले से क्यों मचा बवाल?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 19 सितंबर 2025 को H-1B वीजा कार्यक्रम में बड़ा बदलाव किया है। अब कंपनियों को H-1B वीजा के लिए हर कर्मचारी पर $100,000 (लगभग ₹88 लाख) की भारी-भरकम वार्षिक फीस चुकानी होगी। यह नया शुल्क पहले के $215 पंजीकरण शुल्क और $780 याचिका शुल्क की तुलना में बहुत अधिक है।

ट्रंप के फैसले के पीछे की मुख्य रणनीति

  • अमेरिकी रोजगार की सुरक्षा - ट्रंप का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी कर्मचारियों की वजह से अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां प्रभावित न हों। उच्च शुल्क लगाकर केवल अत्यधिक योग्य प्रोफेशनल्स ही अमेरिका में काम के लिए आएं।
  • वीज़ा प्रणाली में पारदर्शिता - H-1B वीजा सिस्टम में लंबे समय से दुरुपयोग हो रहा था। कंपनियां कभी-कभी कम वेतन में विदेशी कर्मचारियों को रखते थे। नए नियम से यह रोकने की कोशिश की जा रही है।
  • बड़ी कंपनियों और स्टार्टअप्स का संतुलन - भारी शुल्क बड़ी टेक कंपनियों के लिए मुश्किल नहीं है, लेकिन छोटे स्टार्टअप्स को सोचने पर मजबूर किया जाएगा। इसका मकसद अमेरिकी कंपनियों को अमेरिकी टैलेंट पर अधिक भरोसा करने के लिए प्रेरित करना है।
  • राजनीतिक और आर्थिक संदेश - यह कदम अमेरिका के लिए "पहले अमेरिकी" (America First) नीति का हिस्सा है। यह दिखाता है कि प्रशासन अमेरिकी श्रमिकों और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है।

ये भी पढे़ं: डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय को दिया एक और बड़ा झटका, अमेरिकी H-1B VISA के लिए देना होगा 88 लाख रुपये

भारत के लिए क्यों माना जा रहा है झटका?

भारतीय प्रोफेशनल्स H-1B वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल H-1B वीजा पाने वालों में 71% भारतीय थे। आईटी और कंप्यूटिंग क्षेत्र में भारतीयों की मजबूत पकड़ है। नए नियमों के बाद, अमेरिकी कंपनियों को हर कर्मचारी के लिए 100,000 डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) देने होंगे, जिससे भारतीय प्रोफेशनल्स को अमेरिका जाने के लिए पहले से अधिक खर्च और कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इस वजह से इसे भारत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि अधिकांश भारतीय पेशेवर इसी वीजा पर अमेरिका में रोजगार हासिल करते हैं।

ये भी पढे़ं: 'संप्रभुता से समझौता नहीं', भारत के बाद अब इस देश ने अमेरिकी टैरिफ का किया विरोध, Trump को दी चेतावनी

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