Prambanan Temple:गर्भगृह तक सीढ़िया-दीवारों पर अप्सराएं, मुस्लिम देश में किसने बनाया 156 फीट ऊंचा शिव मंदिर?
Prambanan Temple Indonesia: इंडोनेशिया का जावा द्वीप अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ प्राचीन हिंदू सभ्यता और आर्किटेक्चर का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। योग्याकार्टा शहर के पास स्थित प्रम्बानन मंदिर (Prambanan Temple) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अप्रैल के सूखे मौसम में इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने के लिए बड़ी संख्या में सैलानी पहुंचते हैं। इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए यह स्थान काफी महत्व रखता है। स्थानीय स्तर पर लोग इसे 'चंडी प्रम्बानन' के नाम से जानते हैं। यह विशाल मंदिर परिसर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।
9वीं शताब्दी में बना यह मंदिर वास्तुकला के क्षेत्र में वहां के प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर 'बोरोबुदुर' के समकालीन माना जाता है। किसी ज़माने में इस पूरे परिसर में 200 से अधिक छोटे-बड़े मंदिर हुआ करते थे, जो इस क्षेत्र में हिंदू धर्म के प्रसार की कहानी बया करते हैं। इसी मंदिर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 जुलाई को इंडोनेशियाई प्रधानमंत्री के साथ जाएंगे। ऐसे में इस मंदिर की खासियत और इतिहास आपको जरूर जानना चाहिए।

कब बना था मंदिर? किसने बनवाया?
इतिहास के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण करीब 856 ईस्वी में संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातन ने करवाया था। उस दौर में मताराम साम्राज्य में बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव के बीच इस हिंदू मंदिर को बनवाया गया था। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं था, बल्कि तत्कालीन शासन की सांस्कृतिक और रणनीतिक स्थिति को भी दर्शाता था।
लगभग 4,200 वर्ग फुट के क्षेत्र में फैले इस मंदिर परिसर का ढांचा पूरी तरह शानदार ढंग से डिजाइन किया गया है। इसके चारों ओर बने गलियारे और उनमें बने 240 छोटे शिवालय इसकी अनोखी कला को दर्शाते हैं। जावा के ज्वालामुखी मैदानों के बीच खड़ा यह स्ट्रक्टर इतिहास के कई बदलावों और राजवंशों के कालखंड का गवाह रहा है।
156 फीट ऊंचा शिव मंदिर और दीवारों पर उकेरी अप्सराएं
प्रम्बानन परिसर का मुख्य आकर्षण यहां का विशाल शिव मंदिर है, जो लगभग 156 फीट की ऊंचाई के साथ पूरे परिसर का सबसे ऊंचा ढांचा है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर उस दौर की इंजीनियरिंग और वास्तुकला के को दिखाता है। इसके गर्भगृह तक जाने के लिए संकरी सीढ़ियां बनाई गई हैं।
इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर की गई नक्काशी भारतीय महाकाव्य रामायण के दृश्यों को दर्शाती है। एंडेसाइट पत्थरों पर उकेरी गई अप्सराओं, देवताओं और अन्य आकृतियों में जेवनी कला और भारतीय संस्कृति का समन्वय साफ दिखाई देता है। धूप की रोशनी में इन पत्थरों की नक्काशी और आसपास का शांत वातावरण यहां आने वाले लोगों को प्रभावित करता है।
आपदाओं ने पहुंचाया नुकसान, फिर संवारने की कोशिश
जावा द्वीप भौगोलिक रूप से भूकंप और ज्वालामुखी गतिविधियों के प्रति संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। सदियों के दौरान इस मंदिर ने कई शक्तिशाली भूकंपों का सामना किया है। दीवारों पर मौजूद दरारें और पुनर्निर्माण के काम इसके लंबे संघर्ष को दिखाते हैं। साल 1991 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर घोषित किए जाने के बाद, इसके संरक्षण और मरम्मत के काम में तेज़ी आई।
आज यह मंदिर अपने पुराने स्वरूप को काफी हद तक सुरक्षित रखे हुए है। इस मंदिर की बनावट में दक्षिण भारतीय चोल और पल्लव राजवंशों की मंदिर निर्माण शैली का प्रभाव दिखाई देता है। इसके साथ ही, स्थानीय जेवनी कारीगरों ने इसमें अपनी क्षेत्रीय कला का ऐसा समावेश किया जिससे यह पूरी दुनिया में विशिष्ट बन गया।
कल्चरल हेरिटेज और टूरिस्ट स्पॉट
इंडोनेशिया जाने वाले भारतीय सैलानियों के लिए योग्याकार्टा एक बड़ी डेस्टिनेशनल बनकर उभरा है। यहां आकर आगंतुकों को अपनी संस्कृति और रामायण के प्रसंगों को एक नए रूप में देखने का अवसर मिलता है। शाम के समय मंदिर के खुले रंगमंच पर होने वाला 'रामायण बैले' नृत्य नाटक पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण होता है, जो भारत और जावा के ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित करता है। प्रम्बानन मंदिर केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति के ऐतिहासिक प्रभाव का जीवंत प्रमाण है। इतिहास, वास्तुकला और प्राचीन परंपराओं का यह संगम हर आगंतुक पर एक अमिट छाप छोड़ता है। योग्याकार्टा की यह यात्रा उस ऐतिहासिक सेतु को समझने का जरिया है जो भारत और इंडोनेशिया को जोड़ता है।
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