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Sheikh Hasina: शेख हसीना को किसी भी हाल में बांग्लादेश को नहीं सौंपेगा भारत, लेकिन क्या दलील देगा? जानिए

Sheikh Hasina News: अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को जब 1996 में तालिबान ने फांसी पर लटका दिया था, तो कई ऑब्जर्वर्स ने भारत की इसलिए आलोचना की थी, क्योंकि भारत उन्हें बचाने में नाकाम रहा था। नजीबुल्लाह, भारत के काफी करीबी थे और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है, कि शेख हसीना के मामले में भारत वैसी गलती नहीं दोहरा सकता है।

पिछले महीने पूर्व डिप्लोमेट और प्रोफेसर एसडी मुनि ने Oneindia.com से खास बातचीत में साफ शब्दों में कहा था, कि "भारत को किसी भी हाल में शेख हसीना को बांग्लादेश को नहीं सौपना चाहिए और अगर भारत ऐसा करता है, तो वो ऐतिहासिक गलती होगी।" उन्होंने कहा, कि "भारत किसी भी हाल में शेख हसीना को बांग्लादेश को नहीं सौंपेगा।"

india bangladesh extradition

एसडी मुनि के अलावा भी अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का एक मत है, कि शेख हसीना भारत की दोस्त रही हैं और अगर मोहम्मद यूनुस के प्रशासन को लगता है, कि शेख हसीना को भारत प्रत्यर्पित करेगा, तो वो उनका भ्रम हो सकता है।

वहीं बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने पहली बार डिप्लोमेटिक नोट भेजकर शेख हसीना को प्रत्यर्पित करने की मांग की है। ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है, कि आखिर भारत शेख हसीना के प्रत्यर्पण से इनकार किन बातों को आधार बनाकर करेगा। आइये समझते हैं।

भारत और बांग्लादेश के बीच है प्रत्यर्पण संधि (What is India-Bangladesh extradition treaty)

भारत और बांग्लादेश ने साल 2013 में एक प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए थे और इस संधि का मकसद ये था, कि दोनों ही देशों के भगोड़ों को एक दूसरे को सौंपना। लेकिन संधि के अस्तित्व में आने का मतलब यह नहीं है, कि नई दिल्ली को शेख हसीना को ढाका को सौंपना ही होगा।

संधि के मुताबिक, अगर अपराध "राजनीतिक प्रकृति" का है, तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है, हालांकि ऐसे अपराधों की सूची काफी लंबी है, जिन्हें "राजनीतिक" नहीं माना जा सकता है।

शेख हसीना पर जिन अपराधों के तहत मामला दर्ज किया गया है, उनमें से कई धाराएं हत्या, जबरन गायब करना और यातना के हैं और संधि में राजनीतिक अपराधों की परिभाषा से बाहर रखे गए हैं।

वहीं, प्रत्यर्पण प्रक्रिया को सरल और तेज करने के लिए 2016 में संधि में संशोधन किया गया था।

संधि के अनुच्छेद 10 (3) में संशोधन ने प्रत्यर्पण चाहने वाले देश के लिए किए गए अपराध का सबूत देने की आवश्यकता को खत्म कर दिया गया।

अब प्रत्यर्पण के लिए सिर्फ उस देश के सक्षम न्यायालय द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट की आवश्यकता होती है। शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश में ऐसे कई वारंट हैं।

ऐसा कहा जाता है, कि संधि अभी भी प्रत्यर्पण अनुरोधों को खारिज करने के लिए अन्य आधार प्रदान करती है।

अनुच्छेद 8 में इनकार के लिए कई आधार बताए गये हैं, जिनमें ऐसे मामले शामिल हैं, जिनमें आरोप "न्याय के हित में सद्भावनापूर्वक नहीं लगाया गया है" या सैन्य अपराध जो "सामान्य आपराधिक कानून के तहत अपराध नहीं हैं।"

इसलिए, भारत के पास इस आधार पर बांग्लादेश के शेख हसीना के प्रत्यर्पण के अनुरोध को खारिज करने का विकल्प है, कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप "न्याय के हित में सद्भावनापूर्वक नहीं हैं"। हालांकि इससे नई दिल्ली और ढाका के बीच संबंधों में और तनाव आ सकता है।

लेकिन, प्रत्यर्पण संधि की बारीकियों के बावजूद, ढाका के प्रत्यर्पण अनुरोध को स्वीकार करने का फैसला एक राजनीतिक निर्णय होगा।

बांग्लादेश के साथ करीबी से काम करने वाले रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के एक पूर्व अधिकारी ने पहले इंडियन एक्सप्रेस को बताया है, कि "क्या हसीना को बांग्लादेश को सौंपने में हमारे महत्वपूर्ण हित निहित हैं? नहीं। संधि की कानूनी बातें मायने नहीं रखतीं।"

इस क्षेत्र में सेवा देने वाले एक पूर्व राजनयिक ने कहा, "प्रत्यर्पण अनुरोध लंबित होने के बावजूद दो देशों के बीच संबंधों के स्वस्थ होने के कई उदाहरण हैं।"

आपको बता दें, कि बांग्लादेश के साथ संधि के तहत भारत को 2015 में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के शीर्ष नेता अनूप चेतिया को सफलतापूर्वक प्रत्यर्पित करने का मौका मिला था।

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