Trump की जासूसी करा रहे Netanyahu? किस बात को लेकर डगमगाया भरोसा? क्या जानने की फिराक में Israel?

Israel Spy America: अमेरिका और इजरायल अक्सर अपने रिश्तों को "आयरनक्लैड पार्टनरशिप" यानी बेहद मजबूत और अटूट साझेदारी बताते हैं। दोनों देशों के बीच दुनिया के सबसे करीबी सुरक्षा और रक्षा संबंधों में से एक माना जाता है। लेकिन अब अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट ने इन रिश्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारी इजरायली खुफिया एजेंसियों की गतिविधियों को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि वे ईरान के साथ बातचीत में शामिल अमेरिकी अधिकारियों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही हैं। आसान भाषा में कहें तो अमेरिका और ईरान में क्या बातचीत हो रही है इजरायल पर इसकी जासूसी करवाने का शक है।

ईरान वार्ता के बीच बढ़ी अमेरिकी चिंता

NBC News की रिपोर्ट के मुताबिक, यह खुफिया आकलन ऐसे समय सामने आया है जब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर इजरायल ईरान के साथ किसी संभावित समझौते या युद्धविराम की बातचीत को लेकर लगातार आपत्ति जता रहा है। इसी वजह से अमेरिकी एजेंसियों को आशंका है कि इजरायल अमेरिका की रणनीति और बातचीत की स्थिति को समझने के लिए अतिरिक्त खुफिया गतिविधियां चला रहा है।

क्या ट्रंप के करीबियों की जासूसी कर रहा है इजरायल?

अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक सबसे बड़ी चिंता यह है कि इजरायली एजेंसियां उन अमेरिकी अधिकारियों की निगरानी कर रही हैं जो तेहरान के साथ संभावित शांति समझौते पर काम कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस जासूसी का मकसद ईरान के साथ बातचीत में अमेरिका की वास्तविक स्थिति और रणनीति को समझना हो सकता है।

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किन अमेरिकी अधिकारियों को बनाया गया निशाना?

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों का फोकस अमेरिका के कुछ शीर्ष अधिकारियों पर था। इनमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रमुख ईरान वार्ताकार स्टीव विटकॉफ (Steve Witkoff), पेंटागन के शीर्ष नीति अधिकारी एल्ब्रिज ए. कोल्बी (Elbridge A. Colby) और उनके प्रमुख सहयोगियों में से एक माइकल पी. डिमिनो IV (Michael P. DiMino IV) शामिल बताए गए हैं।

अमेरिकी अधिकारियों ने कहा- इस बार सीमा पार हो गई

कुछ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका और इजरायल दोनों लंबे समय से एक-दूसरे पर खुफिया जानकारी जुटाते रहे हैं और यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन उनके मुताबिक, इस बार इजरायल द्वारा वॉशिंगटन की ईरान नीति को समझने के लिए किए जा रहे कथित प्रयासों ने एक सीमा पार कर दी है। अधिकारियों का मानना है कि मित्र देशों के बीच भी कुछ सीमाएं होती हैं जिन्हें पार नहीं किया जाना चाहिए।

सैन्य सहयोग के बावजूद बढ़ी बेचैनी

ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिकी सेना इजरायल को बड़ी मात्रा में ऑपरेशनल और खुफिया जानकारी साझा कर रही है। इसके बावजूद वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इजरायल सिर्फ सैन्य सूचनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह यह भी जानना चाहता है कि राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ बातचीत को लेकर वास्तव में क्या सोच रहे हैं और उनकी आगे की रणनीति क्या है।

खतरे का स्तर 'हाई' से बढ़ाकर 'क्रिटिकल' किया गया

रिपोर्ट के मुताबिक एक खुफिया आकलन में इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को "हाई" से बढ़ाकर "क्रिटिकल" कर दिया गया। यानी अमेरिकी एजेंसियों को अब पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर जोखिम महसूस हो रहा है। यह बदलाव अपने आप में अमेरिकी सुरक्षा तंत्र की बढ़ती चिंता को दर्शाता है।

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अमेरिकी रक्षा एजेंसी की रिपोर्ट में क्या कहा गया?

बताया गया है कि यह रिपोर्ट अमेरिकी रक्षा खुफिया एजेंसी (DIA) द्वारा तैयार की गई थी और इसमें सुरक्षा एजेंसियों का भी योगदान था। रिपोर्ट में कई ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है जिनमें इजरायल पर अमेरिकी सैन्य कर्मियों और सरकारी अधिकारियों की जासूसी करने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया।

फोन में संदिग्ध सॉफ्टवेयर मिलने का दावा

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, रिपोर्ट तैयार करने की एक वजह यह भी थी कि इजरायल में तैनात एक अमेरिकी रक्षा अधिकारी को पता चला कि उसके फोन में ऐसा सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किया गया था जो कथित तौर पर उसकी बातचीत और संचार को इंटरसेप्ट कर सकता था। इस घटना ने अमेरिकी एजेंसियों की चिंता को और बढ़ा दिया।

इजरायल ने सभी आरोपों को बताया झूठ

इन आरोपों पर इजरायल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। वॉशिंगटन स्थित इजरायली दूतावास ने कहा कि यह दावा पूरी तरह झूठा है। NBC News के मुताबिक, इजरायली प्रवक्ता ने कहा कि "इजरायल अमेरिकी संस्थाओं या अमेरिकी सरकारी अधिकारियों पर खुफिया जानकारी इकट्ठा नहीं करता।"

व्हाइट हाउस ने भी रिपोर्ट को खारिज किया

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के बाद व्हाइट हाउस की ओर से भी प्रतिक्रिया आई। अल जज़ीरा के मुताबिक, NBC News से बातचीत में एक व्हाइट हाउस अधिकारी ने कहा कि पूरी कहानी गलत है और यह ऐसे व्यक्ति के हवाले से बनाई गई है जिसे वास्तविक घटनाओं की कोई जानकारी नहीं है।

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अमेरिकी अधिकारियों को नहीं हुई ज्यादा हैरानी

कई वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि काउंटर-इंटेलिजेंस चेतावनी उनके लिए पूरी तरह चौंकाने वाली नहीं थी। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, उनका मानना है कि इजरायल लंबे समय से अपने विरोधियों के साथ-साथ अपने सहयोगी देशों पर भी व्यापक खुफिया निगरानी करता रहा है।

कुछ विरोधी देशों से भी ज्यादा बड़ा खतरा?

अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि वर्तमान समय में इजरायल से जुड़ा काउंटर-इंटेलिजेंस खतरा कई सहयोगी देशों से ज्यादा है। कुछ अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि यह खतरा कुछ विरोधी देशों से भी अधिक गंभीर माना जा रहा है। इसी वजह से इजरायल की कथित जासूसी गतिविधियां अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता का विषय बनी हुई हैं।

"अनहिंग्ड" बताया गया इजरायल का रवैया

रिपोर्ट के मुताबिक एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों के खिलाफ इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को "अनहिंग्ड" यानी बेहद आक्रामक और नियंत्रण से बाहर बताया। उनका मानना है कि हाल के वर्षों में यह गतिविधियां पहले से कहीं ज्यादा बढ़ी हैं।

अमेरिकी सैन्य अधिकारियों को पहले से थी जानकारी

दो सीनियर अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने बताया कि इजरायल में तैनात अमेरिकी सैनिकों और अधिकारियों को पहले से ही काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों के बारे में चेतावनी दी जाती रही है। इसलिए नई रिपोर्ट ने जरूर चिंता बढ़ाई है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह पूरी तरह नई बात नहीं है।

क्या पहले भी अमेरिका की जासूसी कर चुका है इजरायल?

विशेषज्ञों का कहना है कि इजरायल और अमेरिका के करीबी रिश्तों के बावजूद दोनों देशों के बीच जासूसी के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। हालांकि इन मामलों पर अक्सर ज्यादा सार्वजनिक चर्चा नहीं होती, क्योंकि दोनों देशों के रणनीतिक संबंध बहुत मजबूत हैं।

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जोनाथन पोलार्ड मामला आज भी सबसे बड़ा उदाहरण

अमेरिका-इजरायल जासूसी विवादों में सबसे चर्चित नाम जोनाथन पोलार्ड (Jonathan Pollard) का है। वह अमेरिकी नौसेना में खुफिया विश्लेषक था। उसे 1985 में इजरायल को बड़ी मात्रा में गोपनीय दस्तावेज देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उसने जासूसी के आरोप स्वीकार कर लिए थे। पोलार्ड ने करीब 30 साल जेल में बिताए और 2015 में पैरोल पर रिहा हुआ। यह मामला आज भी अमेरिका-इजरायल संबंधों के सबसे बड़े जासूसी विवादों में गिना जाता है।

एक्सपर्ट ने क्या कहा?

लंदन के किंग्स कॉलेज के सुरक्षा अध्ययन विभाग के प्रोफेसर एंड्रियास क्रेग (Andreas Krieg) ने अल जज़ीरा से कहा कि इजरायल का अमेरिका के भीतर खुफिया गतिविधियां चलाने का लंबा इतिहास रहा है। उनके मुताबिक, दशकों से इजरायल औपचारिक और अनौपचारिक नेटवर्क, लॉबिंग चैनलों और खुफिया तंत्र के जरिए अमेरिकी नीति-निर्माण से जुड़ी जानकारी हासिल करने की कोशिश करता रहा है।

ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों में भी आई है खटास

यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों में तनाव की खबरें भी सामने आ रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई बढ़ने के बाद ट्रंप ने निजी बातचीत में नेतन्याहू को लेकर नाराजगी जताई थी। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

अभी तक नहीं आया ट्रंप और नेतन्याहू का सीधा जवाब

जासूसी से जुड़े इन आरोपों पर अब तक न तो डोनाल्ड ट्रंप ने कोई सार्वजनिक बयान दिया है और न ही बेंजामिन नेतन्याहू ने सीधे तौर पर प्रतिक्रिया दी है। लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों ने दोनों देशों के रिश्तों, ईरान वार्ता और मिडिल ईस्ट की राजनीति को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और खुलासे सामने आ सकते हैं, जिन पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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