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Israel Iran War: खामनेई का घमंड ले डूबेगा ईरान को? मुस्लिम देश भी नहीं आ रहे खुलकर साथ

Israel Iran War: इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष दूसरे हफ्ते में भी जारी है और दोनों देश एक-दूसरे पर कहर बनकर टूट रहे हैं। अब इस युद्ध में अमेरिका की भी सीधी एंट्री हो चुकी है। अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर प्लांट को बंकर बम बरसाकर पूरी तरह से तबाह कर दिया है। दूसरी ओर ईरान ने भी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। एक ओर इजरायल के साथ अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देश हैं, तो दूसरी ओर ईरान इस युद्ध में अब तक अकेला ही नजर आ रहा है।

मुस्लिम देशों ने भी अब तक सिर्फ निंदा की है, लेकिन खुलकर ईरान का समर्थन नहीं किया है। पाकिस्तान ने एसेंबली में ईरान की मदद का दावा किया था, लेकिन असीम मुनीर युद्ध के दौरान भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ डिनर मीट कर चुके हैं।

Israel Iran War

Israel Iran War: वैश्विक परिस्थितियां भी नहीं हैं ईरान के पक्ष में

ईरान के अलग-थलग पड़ने के लिए वैश्विक परिस्थितियों के साथ ही ईरान की अपनी राजनीतिक रणनीति और खामनेई प्रशासन भी जिम्मेदार है। खामनेई ने गाजा पर इजरायल के हमले के बाद से बढ़-चढ़कर बयान दिए हैं। अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के साथ ही उन्होंने अमेरिका और इजरायल को बर्बाद करने जैसे दावे भी किए हैं। ईरान की इसी बागी प्रतिक्रियाओं ने उसे काफी हद तक मु्स्लिम देशों की सहानुभूति से भी दूर कर दिया है।

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ईरान की 'Axis of Resistance' हुई नाकाम

ईरान ने बीते चार दशकों में हिज़बुल्लाह, हमास, हूती और इराकी शिया मिलिशिया जैसे संगठनों पर भारी निवेश किया था, ताकि इजरायल और अमेरिका को घेरा जा सके। अब जब खुद ईरान पर हमला हुआ है, तो इन सहयोगियों की अपनी ताकत काफी कम हो चुकी है और ये अपनी समस्याओं में उलझे हुए हैं।

- हिजबुल्लाह के प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत ने संगठन की क्षमता को कमजोर किया है। हिज्बुल्लाह की पूरी टॉप लीडरशिप को इजरायल पिछले एक साल में बर्बाद कर चुका है और इसकी पूरी सैन्य क्षमता तहस-नहस हो चुकी है।

- सीरिया में बशर अल-असद की सत्ता नहीं है और वह खुद रूस में शरण लिए हुए हैं। सीरिया का मार्ग बंद होने की वजह से हिजबुल्लाह को अब वहां से मदद नहीं मिल पा रही। अक्टूबर 2023 से हमास खुद इजरायली हमलों का सामना कर रहा है। ऐसे में हमास ईरान की मदद करने की स्थिति में नहीं है।

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- पहले इजरायल पर मिसाइलें दागने वाले हूतियों को ईरान पर हमला करने से पहले ही इजरायल तबाह कर चुका है। अप्रैल में अमेरिका के हमलों में उनकी मिसाइल क्षमताएं प्रभावित हुईं, जिससे वे सतर्क हो गए हैं।

- ईरान में पहले अमेरिका विरोधी भूमिका निभाने वाली शिया मिलिशिया अब सक्रिय नहीं हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में यहां तक कहा जा रहा है कि शिया मिलिशिया अब ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं, ताकि वह अपने कारोबार को विस्तार दे सकें। ईरान फिलहाल वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।

- इराक के प्रधानमंत्री मोहम्मद अल-सुदानी ने तटस्थ रहने का ऐलान कर दिया है और अब इराक के पास पहले जैसी सैन्य क्षमता भी नहीं है।

- अब तक सिर्फ कताएब हिजबुल्लाह ने अमेरिका पर कार्रवाई की चेतावनी दी है, लेकिन उसने भी कई तरह की शर्तें लगाई हैं।

रूस और चीन वेट एंड वॉच की भूमिका में

रूस और चीन ने इजरायली हमलों की आलोचना जरूर की है, लेकिन सीधी सैन्य भागीदारी से दूर हैं। दोनों देश ईरान के रणनीतिक सहयोगी हैं, मगर हालात में मौजूदा तटस्थता बनाए रखे हुए हैं। रूस खुद तीन साल से ज्यादा वक्त से युद्ध लड़ रहा है और चीन टैरिफ वॉर और आर्थिक स्थितियों को देखकर अभी मौन साधे है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ईरान में खामनेई सत्ता के लिए देश के अंदर भी असंतोष का भाव है। ईरान पिछले एक दशक से अमेरिका और इजरायल को धमकाने से लेकर तबाह करने जैसी धमकियां देता रहा है। खामनेई का बड़बोलापन भी ईरान की अंतरराष्ट्रीय साख के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है। साथ ही, इजरायल के हमलों के बावजूद भी उसे वैसी वैश्विक सहानुभूति नहीं मिल रही है।

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