जर्मन सेना का 'सबसे लंबा, महंगा और घातक' अभियान खत्म
बर्लिन, 30 जून। जर्मनी के 570 सैनिक अफगानिस्तान से निकल गए हैं. सुरक्षा के लिहाज से खराब होते हालात के बीच लगभग बीस साल चला यह अभियान खत्म हो गया है. पिछले हफ्ते जर्मन रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि 570 सैनिक बाकी हैं जो मजार में हैं. मंगलवार को वे भी वापस आ गए. इनमें स्पेशल केएसके फोर्स के वे सैनिक भी शामिल हैं जिन्हें कैंप की सुरक्षा में तैनात किया गया था.

मंगलवार को जर्मन रक्षा मंत्री आनेग्रेट क्रांप कारेनबावर ने ट्विटर पर लिखा कि सैनिक घर वापसी के लिए निकल गए हैं. उन्होंने लिखा, "यह एक ऐतिहासिक अध्याय का अंत है – एक ऐसी तैनाती जिसने चुनौतियां पेश की और हमें बदला भी."
क्रांप कारेनबावर ने अफगानिस्तान में अपने कर्तव्यों को 'पेशवराना तरीके से और पूरी निष्ठा के साथ निभाने के लिए' सैनिकों का धन्यवाद किया. उन्होंने संकल्प लिया कि इस अभियान की समीक्षा होगी और इस बात पर विमर्श होगा कि "क्या अच्छा था, क्या अच्छा नहीं था और क्या सबक रहे."
तस्वीरों मेंः सैन्य अभियानों में शामिल रहे ये मशहूर कुत्ते
मई में जर्मन सैनिकों की वापसी का काम शुरू हुआ था. तब मजार में 1,100 सैनिक थे. सुरक्षा कारणों से जर्मन सेना ने अपनी वापसी की सूचनाओं को स्पष्ट नहीं किया था. मंगलवार तक यह जाहिर नहीं था कि आखिरी दस्ते की वापसी कब होगी.
अब क्या होगा?
आधिकारिक पुष्टि से कुछ ही घंटे पहले क्रांप कारेनबावर ने कहा कि वापसी का काम व्यवस्थित तरीके से लेकिन पूरी तेजी से चल रहा है. बाद में जर्मन सेना ने कहा कि आखिरी सैनिक भी मजार छोड़ चुका है. उनका पुराना कैंप अफगान सैनिकों को दे दिया जाएगा.
जर्मन सैनिक बुधवार को तबिलिसी होते हुए स्वदेश पहुंचेंगे. जर्मनी पहुंचने के बाद सैनिकों को दो हफ्ते के अनिवार्य एकांतवास में रहना होगा ताकि कोरोनावायरस के बेहद संक्रामक डेल्टा वेरिएंट के खतरे को टाला जा सके. पत्रिका डेर श्पीगल के मुताबिक कम से कम एक जर्मन सैनिक को इस महीने की शुरुआत में कोविड हो गया था.
लगभग दो दशक
11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर पर हुए आतंकवादी हमले के बाद जर्मनी ने अपनी फौजों को अफगानिस्तान में तैनात किया था. जर्मनी के सैनिक पहली बार जनवरी 2002 में काबुल पहुंचे थे. शुरुआत में उनसे कहा गया था कि उनकी जिम्मेदारी देश में स्थिरता बनाए रखना है ना कि तालीबान से लड़ना.
इन दो दशकों में एक लाख 50 हजार से ज्यादा जर्मन सैनिक अफगानिस्तान का दौरा कर चुके हैं. बहुत से तो एक से ज्यादा बार अफगानिस्तान में तैनात रहे. 2020 के आखिर तक जर्मन फौज की इस तैनाती पर लगभग 12.5 अरब यूरो यानी करीब 11 खरब रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके थे.
तस्वीरों मेंः ऐसे होते हैं अफगान
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी का यह सबसे लंबा और घातक सैन्य अभियान था. इस दौरान 59 जर्मन सैनिकों की जान गई. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक 2009 से अफगानिस्तान में 39 हजार लोगों की जानें गई हैं. ज्यादातर नागरिक तालीबान द्वारा मारे गए लेकिन अंतरराष्ट्रीय फौजों ने भी नागरिकों की जान ली है, खासकर हवाई हमलों में. अमेरिका ने इस अभियान में अपने 2,442 सैनिक खोए हैं.
अफगानिस्तान में हालात
जर्मन सेना का यह अभियान ऐसे वक्त में खत्म हुआ है जबकि अफगानिस्तान में तालीबान का कब्जा एक बार फिर तेजी से बढ़ रहा है. अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत डेबरा ल्योन्स का कहना है कि मई से अब तक देश के 370 में से 50 जिलों पर तालिबान का कब्जा हो चुका है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को उन्होंने बताया, "जो जिले उन्होंने कब्जाए हैं वे प्रांतों की राजधानियों के इर्द गिर्द हैं. इससे संकेत मिलता है कि तालिबान रणनीतिक जगह बना रहा है और विदेशी फौजों के पूरी तरह चले जाने के बाद इन राजधानियों पर कब्जा करने की कोशिश कर सकता है.'
नाटो सेनाओं की 11 सितंबर तक अफगानिस्तान छोड़ देने की योजना है. इसका अर्थ यह होगा कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय सेना के हाथ में होगी.
रिपोर्टः डार्को यान्येविच
Source: DW
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