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Diplomacy: मिडिल ईस्ट में इस बार बदल जाएगी डोनाल्ड ट्रंप की डिप्लोमेसी? सऊदी अरब-इजराइल बनेंगे दोस्त?

Donald Trump Middle East Diplomacy: डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण के लिए अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में जोरशोर से तैयारियां चल रही हैं और 20 जनवरी को वो अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति बन जाएंगे। डोनाल्ड ट्रंप का शासन आने के साथ ही चर्चा इस बात की हो रही है, कि उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान उनकी डिप्लोमेसी कैसी रहने वाली है?

हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए जैसी टीम चुनी है, उसमें उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान की गई गलतियों से बचने की कोशिश की है और अपने विश्वासपात्रों को ही अपनी कैबिनेट में शामिल किया है। जिससे माना जा रहा है, उनकी विदेश नीति, उनके पिछले कार्यकाल के मुकाबले काफी अलग होने वाली है।

Donald Trump s Middle East Diplomacy

डोनाल्ड ट्रंप की मिडिल ईस्ट डिप्लोमेसी कैसी होगी? (What will Donald Trump's Middle East diplomacy be like?)

डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत एक बेहद अस्थिर और युद्ध में फंसे मिडिल ईस्ट से कर रहे हैं, जहां इजराइल और हमास के बीच लंबे समय से युद्ध चल रहा है और सीरिया में उनके आने से ठीक पहले राष्ट्रपति बशर अल-असद की सत्ता गिर गई है और विद्रोहियों ने देश की सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है।

वहीं, बताया जा रहा है, कि मौजूदा बाइडेन प्रशासन, इजराइल और हमास के बीच वार्ता में महत्वपूर्ण सफलता के कगार पर है। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप की हालिया धमकियों, कि अगर वे फिर से सत्ता में आते हैं, और अगर इजराइली बंधकों को रिहा नहीं किया गया तो "गंभीर परिणाम" होंगे, उसने नाजुक स्थिति पर अनिश्चितता की छाया डाल दी है। हालांकि, अमेरिका ने इस पूरे युद्ध के दौरान इजराइल का साथ दिया है, लेकिन इस दौरान इजराइल पर बाइडेन प्रशासन ने युद्ध रोकने के लिए काफी ज्यादा दबाव भी बनाए हैं। लेकिन, इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप के बीच काफी करीबी रिश्ते हैं, जिसका निश्चित तौर पर गाजा युद्ध में असर दिखेगा।

अपने पिछले कार्यकाल में, ट्रंप की मध्य पूर्व नीति (Middle East Policy) ने ईरान के खिलाफ कड़े रुख को बढ़ावा दिया था और सऊदी अरब और यूएई के साथ उन्होंने काफे मजबूत संबंध कामय किए थे। उन्होंने अमेरिका के ईरान के साथ परमाणु समझौते से बाहर निकाल लिया और उसके खिलाफ काफी सख्त प्रतिबंध लगाए। इसके अलावा, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGS) को आतंकवादी संगठन के रूप में लेबल कर दिया।

वहीं, ट्रंप के पिछले कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि ऐतिहासिक अब्राहम समझौता था, जो संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इजराइल के बीच हुआ था। इस समझौते के तहत, UAE ने पहली बार इजराइल को मान्यता देते हुए उसके साथ डिप्लोमेटिक संबंध बनाए थे। इस दौरान कई और अरब मुस्लिम देशों ने इजराइल को लेकर नरम रवैया अपनाया था और बात तो यहां तक की जा रही थी, कि सऊदी अरब भी इजराइल को मान्यता दे सकता है।

हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि डोनाल्ड ट्रंप के लिए इस कार्यकाल के दौरान मिडिल ईस्ट की चुनौतियां काफी अलग होंगी, क्योंकि इस क्षेत्र में सऊदी अरब और ईरान के संबंधों में भी नरमी आ चुकी है। वहीं, गाजा युद्ध ने अरब मुस्लिम देशों को इजराइल के खिलाफ खड़ा कर दिया है, जिससे अब्राहम समझौता 2.0 में दिक्कतें आने की पूरी संभावना है।

बाइडेन प्रशासन के चार सालों के दौरान, एक वक्त तो यहां तक आया, कि सऊदी अरब ईरान के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी का रियाद में स्वागत करने तक के लिए तैयार हो गया था, जो निश्चित तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की मिडिल ईस्ट नीतियों के लिए चुनौतियां पेश करेगा।

सऊदी, UAE के साथ नया गठबंधन बना पाएंगे ट्रंप? (Donald Trump Saudi Arabia Relation)

डोनाल्ड ट्रंप ने लंबे अर्से से बार बार विदेशी संघर्षों में अमेरिका की भागीदारी के खिलाफ बयान दिए हैं, लेकिन उन्होंने इजराइल को पूर्ण समर्थन देने की बात भी कही है, जो डोनाल्ड ट्रंप की अपनी ही नीति का विरोध करती हैं। लेकिन, ऐसे संकेत मिल रहे हैं, कि इजराइल को लगातार वित्तीय सहायता के बावजूद, ट्रंप प्रशासन के लिए बिना शर्त समर्थन काफी मुश्किल होने वाली है।

माना जा रहा है, कि ट्रंप प्रशासन भी चाहेगा, कि इजराइल-हमास की लड़ाई जल्द बंद हो, ताकि वो सऊदी अरब और चीन के बीच बढ़ती नजदीकी को रोक सके। पिछले कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप की सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और यूएई के नेता मुहम्मद बिन जायद के साथ बना गठबंधन, ईरान को काउंटर करने के लिए था, लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। वहीं, बाइडेन ने सत्ता में आने के साथ ही जिस तरह से सऊदी पत्रकार जमाक खशोगी की हत्या के लिए क्राउन प्रिंस को दोषी ठहराया था, उसने अमेरिका और सऊदी के संबंध को काफी खराब कर दिए थे और नौबत यहां तक पहुंच गई, कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद जब, जो बाइडेन ने मोहम्मद बिन सलमान को फोन लगाया था, तो उन्होंने फोन तक रिसीव नहीं किया था। और अगले चार सालों के दौरान, जो बाइडेन, सऊदी अरब के साथ अमेरिका के रिश्तों को पटरी पर लाने की जद्दोजहद ही करते रहे और दूसरी तरफ, क्राउन प्रिंस ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए रेट कार्पेट बिछा दिया।

निश्चित तौर पर, डोनाल्ड ट्रंप के लिए पुरानी वाली स्थिति पर पहुंचना काफी मुश्किल होगा।

लिहाजा, जैसे-जैसे ट्रंप अपने राष्ट्रपति पद की तैयारी कर रहे हैं, दुनिया इस बात पर बारीकी से नजर रख रही है, कि उनके कार्यकाल के बाद से महत्वपूर्ण बदलाव देखने वाले क्षेत्र में उनकी नीतियां कैसे सामने आएंगी?

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