Diplomacy: चीन को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के तीखे तेवर की निकली हवा, भारत के कारोबारी वर्ग में बेचैनी क्यों है?
China-Donald Trump Relation: चीन ने पिछले हफ्ते भारतीय क्षेत्रों को मिलाकर नये काउंटी बनाने की घोषणा कर डाली, जिसके बाद भारत और चीन के बीच नये सिरे से विवाद शुरू हो गये हैं। चीन ने जो नये काउंटी बनाने की घोषणा की है, उनपर भारत का दावा है, कि वह लद्दाख का हिस्सा है।
भारत ने चीन की इस घोषणा का फौरन जवाब दिया। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, कि नई दिल्ली ने "इस क्षेत्र में भारतीय क्षेत्र पर अवैध चीनी कब्जे को कभी स्वीकार नहीं किया है।" उन्होंने कहा, कि चीन की घोषणा बीजिंग के क्षेत्रीय दावों को कोई "वैधता" नहीं देगी।

भारत और चीन के बीच ताजा विवाद क्या है? (India-China Conflict)
एशियाई दिग्गजों के बीच शुरू हुआ ताजा विवाद, अक्टूबर में उनके विवादित सीमा पर घोषित किए गए एक शांति समझौते की नाजुकता के बीच शुरू हुआ है। इस शांति समझौते के बाद दोनों पड़ोसियों ने अपने कई सैनिकों को विवादित प्वाइंट्स से वापस बुला लिया, भले ही उस भूमि के भविष्य के बारे में सवाल जो पहले भारतीय नियंत्रण में थी, लेकिन जिसे चीन ने 2020 से कथित तौर पर हड़प लिया है, दोनों पक्षों की तरफ से जवाब नहीं दिए गये हैं। विश्लेषकों का कहना है, कि अब भारत-चीन संबंध एक और बड़ी परीक्षा के लिए तैयार हैं, क्योंकि अमेरिका में 20 जनवरी को डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की चीन नीति पर चिंता क्यों? (Donald Trump Policy Towards China)
डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने अपने पहले कार्यकाल में चीन के साथ व्यापार युद्ध छेड़ दिया था, उन्होंने दूसरा कार्यकाल संभालने से पहले चीनी सामानों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "अच्छा आदमी" बताते हुए ट्रंप ने भारत के खिलाफ भी टैरिफ लगाने की धमकी दी है।
जैसे-जैसे उनके शपथ ग्रहण की तारीख, 20 जनवरी, नजदीक आ रही है, डोनाल्ड ट्रंप चीन को लेकर थोड़ा नरम पड़ते दिख रहे हैं, जो आने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के सहयोगी, अरबपति एलन मस्क का मुख्य व्यापारिक अड्डा है। एलन मस्क का ट्रंप प्रशासन में काफी दखल होने वाला है और यह सब भारत के रणनीतिक समुदाय के वर्गों में बेचैनी पैदा कर रहा है।
अलजजीरा की रिपोर्ट में पूर्व भारतीय राजनयिक जयंत प्रसाद कहते हैं, कि ट्रंप में "अपने दुश्मनों की चापलूसी करने और अपने दोस्तों को परेशान करने की आदत है"।
नवंबर में, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के तुरंत बाद, ट्रंप ने कहा था, कि वह चीनी स्वामित्व वाले सोशल मीडिया ऐप टिकटॉक को "बचाएंगे", जिस पर उन्होंने एक बार प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी आमंत्रित किया है। हालांकि अभी तक बीजिंग ने न तो निमंत्रण स्वीकार किया है और न ही अस्वीकार किया है, लेकिन कुछ विश्लेषकों ने कहा है कि शी जिनपिंग के आने की संभावना नहीं है।
दूसरी ओर, ट्रंप ने मोदी को ऐसा निमंत्रण नहीं भेजा है, जिनके साथ अमेरिकी नेता ने 2019 और 2020 में ह्यूस्टन और भारतीय शहर अहमदाबाद में दो रैलियां की थीं। भारतीय सोशल मीडिया मोदी का मजाक उड़ाने वाले मीम्स से भरा पड़ा है, जिसमें सुझाव दिया गया है, कि विदेश मंत्री एस जयशंकर की पिछले महीने के अंत में वाशिंगटन यात्रा का मकसद टीम ट्रंप से अपने प्रधानमंत्री के लिए निमंत्रण मांगना था।
डोनाल्ड ट्रंप की आदत से क्यों परेशान है दिल्ली? (Donald Trump Policy Towards India)
जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है, कि चीन के प्रति ट्रंप की दुविधा नई दिल्ली को परेशान करती है, उन्होंने चेतावनी दी कि वाशिंगटन की ओर से चीन विरोधी अभियान या बीजिंग के साथ समझौता, दोनों ही भारत के लिए बुरे होंगे।
स्टिमसन सेंटर के नॉन-रेजिडेंट फेलो और अल्बानी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर क्रिस्टोफर क्लेरी ने अलजजीरा से कहा, "दूसरे (ट्रंप) कार्यकाल में भारत के लिए दोहरे खतरे हैं।" उन्होंने अल जजीरा से कहा, "ट्रंप और उनकी टीम नई दिल्ली की प्राथमिकताओं की तुलना में ज्यादा आक्रामक हो सकती है, खासकर व्यापार और निवेश प्रवाह पर, जो भारत को ऐसे विकल्प चुनने के लिए मजबूर करता है जो वह नहीं चुनना चाहेगा।"
उन्होंने कहा, कि "वैकल्पिक रूप से, ट्रंप की टीम अंतिम सौदा करने वाले के रूप में अपनी साख को चमकाने के लिए चीन के साथ एक बड़ा सौदा करने की कोशिश कर सकती है। यह भारत को मुश्किल में डाल देगा।"
प्रसाद ने भी कहा, कि उन्हें उम्मीद है कि भारत-अमेरिका संबंध मजबूत बने रहेंगे, लेकिन अगर ट्रंप बीजिंग के साथ संबंधों को मजबूत करने का फैसला करते हैं तो इसमें रुकावटें आ सकती हैं।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने पिछले हफ्ते एक संपादकीय में बीजिंग और वाशिंगटन के बीच सहयोग पर ध्यान केंद्रित करने वाले संबंधों पर लंबा आख्यान लिखा है। राष्ट्रपति जो बाइडेन के नेतृत्व में अमेरिका ने चीनी टेक्नोलॉजी, खासकर सेमीकंडक्टर पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। चीन ने अमेरिका को महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात सहित अपने स्वयं के प्रतिबंधों के साथ जवाबी हमला किया है।
लेकिन फिलहाल भारत, अपने हिस्से के लिए, चीन के प्रति ट्रंप की पॉलिसी पर अनिश्चितता का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। मोदी से 2025 में क्वाड ग्रुपिंग के नेताओं के बीच एक बैठक की मेजबानी करने की उम्मीद है, जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, जिसके लिए नई दिल्ली चाहती है कि ट्रंप भारत की यात्रा करें। इस बीच, चीन इस साल शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, जिसके लिए मोदी वहां जा सकते हैं।
भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के पूर्व विशेष सचिव अमिताभ माथुर ने अललजीरा से कहा, कि उनका मानना है कि हाल के वर्षों में अमेरिका, चीन के प्रति अपने दृष्टिकोण में आक्रामक रहा है और एशिया प्रशांत क्षेत्र में खुद को एक अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित करने में सफल रहा है। इस क्षेत्र में बीजिंग के खिलाफ वाशिंगटन के प्रतिरोध में मजबूत यूएस-भारत संबंध केंद्रीय रहे हैं।
हालांकि, ज्यादातर एक्सपर्ट्स को उम्मीद है, कि डोनाल्ड ट्रंप भारत के साथ मजबूत संबंध को आगे ले जाएंगे, लेकिन कुछ लोगों का कहना है, कि उनकी टीम में मस्क जैसे सहयोगियों की मौजूदगी अमेरिकी राष्ट्रपति के कामों को प्रभावित कर सकती है।
रिटायर्ड भारतीय राजनयिक और रणनीतिक विश्लेषक अनिल त्रिगुणायत ने अलजजीरा से कहा, "मुझे लगता है कि भारत के प्रति अमेरिका का झुकाव व्यापक इंडो-पैसिफिक संदर्भ में बदलने की संभावना नहीं है, जबकि वह चीन के साथ बेहतर सौदा करने की कोशिश करेगा।" उन्होंने कहा, कि "मस्क और उनकी टीम के अन्य उद्योगपति निस्संदेह उनकी अत्यधिक टैरिफ योजनाओं से छेड़छाड़ करने की कोशिश करेंगे।"
लिहाजा, अब देखना होगा, कि अगर ट्रंप भारत पर टैरिफ लगाते हैं, तो नई दिल्ली की तरफ से कैसी प्रतिक्रिया दी जाएगी?
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