OI Explained: ट्रंप की हरकतों से टूट रहा NATO? चीन की तरफ झुक रहे जर्मनी-इटली-फ्रांस, खाली होंगे अमेरिकी बेस?

OI Explained: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की हरकतों की वजह से अब उनके पुराने और भरोसेमंद सहयोगी अमेरिका से दूरी बनाते दिख रेह हैं। अगर ऐसा होता है तो ये अमेरिका के लिए आने वाले वक्त में बड़ा झटका होगा। क्योंकि यूरोपीय देश सिर्फ अमेरिका से दूरी नहीं बना रहे बल्कि उसके सबसे बड़े कॉम्प्टीटर चीन के साथ हाथ भी मिलाने की तैयारी में हैं। यूरोपीय देश चीन से डील कर वहां के बाजारों में अपनी एंट्री के रास्ते तलाश रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो अमेरिका के लिए यह वर्ल्ड वॉर-2 के बाद लगने वाला सबसे बड़ा झटका होगा। आइए पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

जर्मनी से शुरुआत, फ्रांस-इटली भी टारगेट

दरअसल इस सब की शुरुआत होती है ट्रंप के उस बयान से जिसमें वे जर्मनी समेत दूसरे देशों से अपने सैनिकों को कम करने की बात कहते हैं। अमेरिका के पास दुनिया के सबसे बड़े विदेशी सैन्य नेटवर्कों में से एक है और यूरोप लंबे समय से उसका सबसे अहम रणनीतिक केंद्र रहा है। जिसका फायदा NATO समेत बाकी यूरोपीय देशों को भी होता रहा है।

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यूरोप में कितने अमेरिकी सैनिक?

पूरे यूरोप में हजारों नहीं, बल्कि लाखों अमेरिकी सैनिक दर्जनों सैन्य ठिकानों पर तैनात हैं। इनमें बड़े कमांड मुख्यालय, फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस, ट्रेनिंग ग्राउंड और नौसैनिक सुविधाएं शामिल हैं। यह तैनाती द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई थी और शीत युद्ध से लेकर आज तक हो रहे मिलिट्री ऑपरेशन्स तक लगातार बढ़ती रही।

जर्मनी क्यों चढ़ा ट्रंप के निशाने पर

ट्रंप ने हाल ही में कहा कि वॉशिंगटन Germany में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटाने पर स्टडी और एनालिसिस कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस पर फैसला "बहुत जल्द" लिया जाएगा। यह समीक्षा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और कई यूरोपीय देशों के बीच राजनीतिक मतभेद बढ़ रहे हैं, खासकर ईरान संकट को लेकर। जर्मन चांसलर Friedrich Merz ने हाल में अमेरिकी नीति की आलोचना की थी और कहा था कि अमेरिकी मीडिएटर्स को अपमानित किया गया।

ट्रंप ने मर्ज़ को दिया जवाब

इसके बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से मर्ज़ की आलोचना की और उनसे कहा कि उन्हें Russia-Ukraine War पर ध्यान देना चाहिए। ट्रंप ने कहा कि इस मामले में जर्मन नेतृत्व अप्रभावी रहा है।

मेलोनी भी ट्रंप के निशाने पर

तनाव सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं है। जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या इटली और स्पेन में भी सैनिक कटौती हो सकती है, तो उन्होंने कहा, "शायद... मैं ऐसा क्यों न करूं? इटली ने हमारी कोई मदद नहीं की और स्पेन भयानक रहा है।" ट्रंप के निशाने पर यूरोपीय देश इसलिए आए क्योंकि उन्होंने Strait of Hormuz को फिर से खोलने के लिए नौसेना बल नहीं भेजे।

पुराने विवाद पर भिड़े NATO मेंबर्स

इन मतभेदों ने NATO के भीतर रक्षा खर्च और जिम्मेदारी बांटने के पुराने विवाद को फिर बढ़ा दिया है। ट्रंप पहले भी Spain पर व्यापार प्रतिबंध की धमकी दे चुके हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका पूरे यूरोप में करीब 100,000 सैनिक तैनात रखता है। यह संख्या 2022 से पहले की तुलना में काफी ज्यादा है, जब Russia के Ukraine पर हमले से पहले तैनाती कम थी, जिसे बाइडन ने बढ़ाया था।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद संख्या बढ़ी

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने नाटो के पूर्वी किनारे को मजबूत करने और सहयोगियों को भरोसा दिलाने के लिए सैनिक संख्या बढ़ाई। हालांकि कुल संख्या 100,000 के आसपास है, लेकिन इसका स्ट्रक्चर काफी अजीब है। जिसमें लगभग 68,000 सक्रिय ड्यूटी सैनिक यूरोप के विदेशी ठिकानों पर स्थायी रूप से तैनात हैं।

दुनिया भर में दो लाख से ज्यादा सैनिक भेजे

दिसंबर 2025 तक दुनिया भर में अमेरिकी सैन्य और नागरिक विदेशी उपस्थिति 221,599 लोगों की थी। इसमें 169,589 सक्रिय सैनिक, 23,169 रिजर्व/नेशनल गार्ड फोर्स और 28,841 सिविल डिफेंस वर्कर्स शामिल थे।

कांग्रेस ने कटौती पर लगाई लिमिट

2026 के National Defense Authorization Act (NDAA) के तहत यूरोप में सैनिक संख्या 76,000 से नीचे लाने से पहले पेंटागन को अमेरिकी कांग्रेस से परामर्श करना होगा। इस प्रावधान का मतलब है कि ट्रंप प्रशासन तुरंत बड़े पैमाने पर सैनिक नहीं हटा सकता। यानी कानूनी रूप से न्यूनतम लिमिट तय कर दी गई है।

जर्मनी क्यों है अमेरिका का सबसे बड़ा यूरोपीय बेस?

Germany यूरोप में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की रीढ़ बना हुआ है। यहां 36,000 से 39,000 सक्रिय सैनिक और लगभग 12,000 नागरिक कर्मचारी तैनात हैं। जर्मनी के Stuttgart में US European Command (EUCOM) और US Africa Command (AFRICOM) के मुख्यालय हैं।

जर्मनी में सैन्य अस्पताल भी

Landstuhl Regional Medical Center अमेरिकी क्षेत्र के बाहर सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य अस्पताल है।जर्मनी में अमेरिकी सेना 1945 से है, जब नाजी जर्मनी की हार के बाद वहां कब्जा किया गया था। उस समय करीब 1.6 मिलियन अमेरिकी सैनिक वहां थे।

शीत युद्ध में संख्या बढ़ी

बाद में शीत युद्ध के दौरान यह संख्या कई बार 250,000 से ऊपर पहुंची। उस समय अमेरिका के करीब 50 बड़े बेस और 800 से ज्यादा सैन्य स्थान जर्मनी में थे। लेकिन आज पुराने ठिकानों को लॉजिस्टिक हब और फॉरवर्ड ऑपरेटिंग सेंटर में बदला जा चुका है।

इटली में 12,500 से ज्यादा अमेरिकी कर्मी

Italy दक्षिणी यूरोप और भूमध्यसागर में अमेरिकी अभियानों का बड़ा केंद्र है। यहां 12,500 से 12,600 अमेरिकी कर्मी मौजूद हैं। विकेन्ज़ा में 173वीं एयरबोर्न ब्रिगेड है। Aviano Air Base में F-16 विमान तैनात हैं, जबकि Naples में US Naval Forces Europe और Sixth Fleet का मुख्यालय है।

सिसिली और स्पेन की भूमिकाSigonella ड्रोन और निगरानी अभियानों के लिए अहम है। Spain में करीब 3,800 अमेरिकी कर्मी हैं, लेकिन रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा है। Rota Naval Base में अमेरिकी गाइडेड मिसाइल विध्वंसक तैनात हैं। यहां चार से छह विध्वंसक बढ़ाने की योजना है। वहीं, Greece के Souda Bay से अमेरिका को लॉजिस्टिक और नौसैनिक समर्थन मिलता है।

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पोलैंड बना नया केंद्र

हाल के सालों में अमेरिकी ध्यान पूर्वी यूरोप की तरफ गया है। Poland में करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक हैं। पोज़्नान के Camp Kosciuszko को पोलैंड में पहला स्थायी अमेरिकी अड्डा माना जाता है। इसके अलावा Romania और Hungary में भी अमेरिकी सैनिक स्थायी और रोटेशनल आधार पर तैनात हैं। वहीं, बाल्टिक देशों, नॉर्वे और पूर्वी यूरोप के अन्य हिस्सों में अमेरिकी सैनिक रोटेशनल मॉडल पर मौजूद रहते हैं। Turkey में भी लगभग 2,000 अमेरिकी कर्मी हैं, जिनमें अधिकांश Incirlik Air Base पर तैनात हैं।

UK में 10,000 अमेरिकी कर्मी

United Kingdom अमेरिकी अभियानों का बड़ा भागीदार है। यहां करीब 10,000 अमेरिकी कर्मी मौजूद हैं। साथ ही, RAF Lakenheath यूरोप में अमेरिकी F-35A स्टील्थ फाइटर्स की पहली स्थायी तैनाती का केंद्र है। RAF Mildenhall हवाई ईंधन भरने और विशेष अभियानों के लिए अहम बेस है।

ट्रंप की समीक्षा से अनिश्चितता

ट्रंप ने अब इन सब सैनिकों की जगह मात्र 76,000 सैनिकों को तैनात करने का प्लान बनाया है जो पूरे यूरोप की सिक्योरिटी को खतरे में डाल सकता है। रूस से जुड़े सुरक्षा खतरे खासकर पूर्वी यूरोप में अभी भी मजबूत अमेरिकी मौजूदगी की मांग करते हैं।

किस बात पर बिगड़ रही?

रक्षा खर्च और राजनीतिक मतभेदों के कारण जर्मनी, इटली और स्पेन के साथ रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। इटली के रक्षा मंत्री Guido Crosetto ने कहा कि वह ट्रंप की टिप्पणियों का कारण नहीं समझते। उन्होंने कहा कि इटली ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मिलिट्री ऑपरेशन चलाने की पेशकश भी की थी, जिसकी अमेरिकी सेना ने सराहना की थी।

चीन की तरफ कैसे जा रहे NATO देश?

ट्रंप के इस तानाशाही भरे रवैये की वजह से NATO के तमाम मेंबर देश अब चीन की तरफ हाथ बढ़ाने लगे हैं। इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी 2024 में चीन जाकर आ चुकी हैं। जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों दिसंबर 2025 में चीन गए थे और एक बार फिर चीन जाने की तैयारी कर रहे हैं। जबकि जर्मनी के चांसलर फ्रैड्रिक मर्ज फरवरी 2026 में ही चीन के दौरे पर थे। इन तीनों देशों ने वहां पर आसानी से व्यापार करने पर चर्चा की जिसमें चीन भी सहमत दिखाई दिया। अगर आगे यूरोपीय देश ऐसे ही चीन की तरफ झुकते हैं तो ट्रंप के लिए आने वाला समय अच्छा नहीं कहा जा सकता। कुछ एक्सपर्ट इसे NATO के टूटने के पहली वाली घटनाओं को तौर पर माना है। हालांकि इसमें अभी लंबा वक्त लगेगा।

इस एक्सप्लेनर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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