Indore News: इंदौर में गूंजी 'लोकतंत्र बचाओ 'की आवाज, अशोक वानखेडे ने कही बड़ी बात

इंदौर में लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में 'लोकतंत्र बचाओ समिति' ने आज इंदौर के जाल सभागृह में "जीवंत लोकतंत्र और हमारी भूमिका" विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया।

इस परिचर्चा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ गांधीवादी विचारक अनिल त्रिवेदी ने कहा कि, भारतीय समाज का दर्शन और विचार "बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय" का है, यही कल्याणकारी राज्य की आत्मा है।

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त्रिवेदी ने कहा की, आज की राजनीति पूंजीपतियों के चंगुल में चली गई है। युवाओं में बेरोजगारी का आलम यह है कि हमारे एक शीर्ष शिक्षा संस्थान आईआईटी बॉम्बे के ही 35 प्रतिशत डिग्री धारी छात्रों को नौकरी नहीं मिल पाई, अंदाजा लगाया जा सकता है कि अन्य संस्थानों के हालात क्या होंगे!

यह हमारी यानि भारत के नागरिकों की गलती है कि वो चकाचौंध से लड़ नहीं पा रहे हैं। इस चकाचौंध के पीछे जो अंधेरा है, उससे लड़ने का कलेजा हमारे पास होना चाहिए क्योंकि यह महात्मा गांधी का देश है जिन्होंने हमारे सामने अन्याय से लड़ने की मिसाल पेश की है। हमारे सामने नचिकेता का उदाहरण भी है, जो यमराज से शास्त्रार्थ करने का माद्दा रखता था, लेकिन आज यह स्थिति क्यों पैदा हो गई कि हम संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के बावजूद सत्ता से सवाल नहीं पूछ पा रहे हैं, आखिर इतना भय किस लिए, यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई, हमें विचार करना होगा।

परिचर्चा के मुख्य वक्ता अशोक वानखेडे ने अपने उद्बोधन का आरंभ संस्कृत के एक श्लोक से करते हुए आगे कहा कि इंदौर में लोकतंत्र की जो हत्या हुई है, मैं उसकी श्रद्धांजलि सभा में शिरकत करने आया हूं। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मुझे कभी अपने शहर में आकर ऐसी परिस्थितियों में अपने विचार व्यक्त करने पड़ेंगे।

उन्होंने कहा कि, मैं इंदौर में पला-बढ़ा हूं, यह एक ऐसा शहर रहा है, जहां राजनीतिक दलों और उनके नेताओं में मतभेद तो रहे हैं पर मनभेद कभी नहीं रहे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान दिल्ली में तानाशाही वृत्ति का जो वटवृक्ष पनपा, उसकी कुछ शाखाएं इंदौर तक आ गई हैं, जिससे इंदौर विषैला हो गया है।

मैं आज इंदौर को जगाने आया हूं कि एक ओर तो हम देश में नंबर एक के रूप में पहचाने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर क्या हमें लोकतंत्र की हत्या के पहले शहर के रूप में भी जाना जाएगा।

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