30 दिन जेल में रहे तो PM-CM की कुर्सी जाएगी? संसद में आने वाला PM-CM Removal Bill क्या है? जिसपर हो रहा बवाल
Parliament monsoon session (PM-CM removal bill): संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। इस मानसून सत्र में कई बड़े विधेयकों पर चर्चा होने की उम्मीद है, लेकिन जिस प्रस्ताव ने सबसे ज्यादा राजनीतिक और संवैधानिक बहस छेड़ दी है, वह है संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025।
इस बिल में ऐसा प्रावधान रखा गया है कि अगर प्रधानमंत्री, किसी राज्य के मुख्यमंत्री या केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें पद छोड़ना होगा। अगर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं, तो 31वें दिन उनका पद अपने आप खत्म हो जाएगा।

यही वजह है कि विपक्ष इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि सत्ता के सबसे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय करने के लिए ऐसे कानून की जरूरत है। अब सबकी नजर 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र और उससे पहले 17 जुलाई को होने वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक पर है। ऐसे में आइए जानते हैं कि संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 क्या है।
What is PM-CM Removal Bill: क्या है 130वां संविधान संशोधन बिल और इसकी शर्तें?
इस बिल का साफ नियम यह है कि अगर किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या खुद प्रधानमंत्री पर कोई ऐसा गंभीर आपराधिक आरोप लगता है जिसमें 5 साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान हो, और वे इस मामले में लगातार 30 दिनों तक जेल में बंद रहते हैं, तो उन्हें पद छोड़ना पड़ेगा।
संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 का मकसद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के पद से जुड़े नियमों में बदलाव करना है। प्रस्ताव के मुताबिक यह नियम सिर्फ किसी गिरफ्तारी पर लागू नहीं होगा बल्कि दो शर्तें पूरी होने पर ही लागू होगा।
पहली शर्त यह है कि मामला ऐसा हो जिसमें 5 साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान हो। दूसरी शर्त यह है कि संबंधित व्यक्ति लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहे।
अगर यह दोनों शर्तें पूरी होती हैं, तो राष्ट्रपति या राज्यपाल प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्री को पद से हटा सकते हैं।
वहीं प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के मामले में 30 दिन पूरे होने पर इस्तीफा देना होगा। ऐसा नहीं करने पर 31वें दिन पद खत्म हो जाएगा। दिल्ली के साथ-साथ पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्र शासित प्रदेशों के लिए भी इसी तरह के अलग विधेयक लाए गए हैं।
सरकार का तर्क है कि देश के सबसे बड़े पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और दागी चेहरों को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है। लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह बिल 'जब तक दोष साबित न हो, तब तक हर कोई बेगुनाह है' के बुनियादी कानूनी सिद्धांत के खिलाफ जाता है।
जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी इस बिल पर देगी फाइनल फैसला
इस बिल को जांचने के लिए बनाई गई जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) 17 जुलाई को अपनी बैठक में रिपोर्ट को फाइनल करने वाली है। कमेटी इस बिल के कड़े नियमों को हटाने के मूड में बिल्कुल नहीं है, यानी 30 दिन जेल वाला नियम बना रहेगा।
हालांकि विपक्षी दलों के कड़े विरोध और इस डर को देखते हुए कि कोई भी सरकार विरोधियों को फंसाने के लिए इसका गलत इस्तेमाल कर सकती है। कमेटी कुछ सुरक्षा उपाय (Safeguards) जोड़ने की सिफारिश कर सकती है।
केंद्र सरकार ने संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक बुलाया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दोनों सदनों का सत्र बुलाने को मंजूरी दे दी है।
130वां संविधान संशोधन बिल में सबसे बड़ा विवाद आखिर किस बात पर है?
इस विधेयक पर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या किसी व्यक्ति को सिर्फ गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत के आधार पर पद से हटाया जा सकता है, जबकि अदालत ने अभी उसे दोषी भी नहीं ठहराया हो।
विपक्षी दलों का कहना है कि भारतीय कानून का सिद्धांत है कि जब तक अदालत किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है। ऐसे में सिर्फ गिरफ्तारी के आधार पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को हटाने का रास्ता खोलना राजनीतिक हथियार बन सकता है। आलोचकों का तर्क है कि अगर किसी सरकार के खिलाफ जांच एजेंसियों का इस्तेमाल हुआ, तो केवल गिरफ्तारी के जरिए चुनी हुई सरकार को अस्थिर किया जा सकता है।
इस बिल को लेकर क्या उठ रहे हैं 4 बड़े सवाल?
विपक्ष का कहना है कि यह नया बिल भारतीय संविधान के 'बेसिक स्ट्रक्चर' को चोट पहुंचा सकता है। संसद के पास भी यह ताकत नहीं है कि वह संविधान के बुनियादी ढांचे को बदल सके। इस बिल को लेकर 4 बड़े सवाल या आपत्तियां सामने आई हैं।
- 1. संसदीय व्यवस्था पर असर (Parliamentary Form): भारत में नियम है कि लोकसभा या विधानसभा के पास प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को चुनने और हटाने की ताकत होती है। यह नया कानून इस ताकत को कमजोर करता है।
- 2. शक्तियों का बंटवारा (Separation of Powers): इस कानून के आने से जांच एजेंसियों (जो सरकार के अधीन काम करती हैं) के पास इतनी ताकत आ जाएगी कि वे किसी भी पीएम या सीएम को 30 दिन जेल में रखकर पूरी सरकार गिरा देंगी। यह कार्यपालिका और विधायिका के संतुलन को बिगाड़ सकता है।
- 3. संघीय ढांचा (Federalism): इसके तहत राज्यों की एजेंसियां किसी केंद्रीय मंत्री को या केंद्र की एजेंसियां किसी राज्य के मुख्यमंत्री को निशाना बना सकती हैं, जिससे केंद्र-राज्य संबंध हमेशा के लिए खराब हो सकते हैं।
- 4. कानून का राज (Rule of Law): महज 30 दिन जेल में रहने के आधार पर पद से हटा देना जल्दबाजी और मनमाना फैसला लग सकता है, क्योंकि इस स्टेज पर कोर्ट ने तय नहीं किया होता कि व्यक्ति सच में दोषी है या नहीं।
क्या संसद में पास हो पाएगा यह बिल?
इस बिल को कानून बनाना मोदी सरकार के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं रहने वाला है। यह एक संविधान संशोधन बिल है, इसलिए इसे आम बिल की तरह साधारण बहुमत से पास नहीं कराया जा सकता। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत 'विशेष बहुमत' की जरूरत होगी।
विशेष बहुमत का मतलब है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अलग-अलग वोटिंग होगी। बिल को पास कराने के लिए सदन के कुल सदस्यों के बहुमत के साथ-साथ वोटिंग के दिन मौजूद और वोट करने वाले कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों का समर्थन जरूरी है। इतना ही नहीं यह सीधे तौर पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों से जुड़ा मामला है, इसलिए संसद से पास होने के बाद देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से भी इसे पास कराना होगा।
पिछले सत्र में बीजेपी के पास इन बड़े बदलावों के लिए जरूरी जादुई आंकड़ा नहीं था। हालांकि हाल के दिनों में हुए दलबदल और क्षेत्रीय दलों के समर्थन से सरकार ने अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की है। इसी तरह का एक और बिल (131वां संशोधन बिल), जो महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा था, वह अप्रैल में नंबरों की कमी के कारण अटक गया था। ऐसे में यह मानसून सत्र इस बात की असली परीक्षा होगा कि सरकार इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए बाकी दलों को साथ ला पाती है या नहीं।














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