जज का इस्तीफा भी नहीं आएगा काम? जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के प्रस्ताव पर संसद में मचेगा घमासान,क्या है नियम?
Justice Yashwant Varma: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद भी उनके खिलाफ शुरू हुई कार्रवाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अब सबकी नजर 20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र पर है, जहां उनके खिलाफ जांच करने वाली तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट लोकसभा में पेश की जाएगी।
इसके बाद आगे क्या कदम उठाया जाए, इसका फैसला सदन करेगा। यही वजह है कि यह मामला अब कानूनी और संवैधानिक दोनों स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

लोकसभा में पेश होगी जांच रिपोर्ट
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने साफ किया है कि जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ बनी तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट मानसून सत्र के दौरान सदन के पटल पर रखी जाएगी। यह समिति सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार की अगुवाई में बनाई गई थी। रिपोर्ट पेश होने के बाद आगे की कार्रवाई क्या होगी, इसका फैसला लोकसभा करेगी।
जस्टिस वर्मा के खिलाफ हटाने के प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। इस प्रस्ताव पर 146 से ज्यादा सांसदों का समर्थन बताया गया है। इनमें कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और भाजपा के रविशंकर प्रसाद तथा अनुराग सिंह ठाकुर जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं।
क्या था जस्टिस यशवंत वर्मा का बंगला अग्निकांड जिससे खुला राज?
इस पूरे मामले की शुरुआत पिछले साल मार्च में हुई थी, जब नई दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी बंगले के एक बाहरी हिस्से (आउटहाउस) में अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे आपातकालीन सुरक्षाकर्मियों को वहां जले हुए और नष्ट किए गए नोटों की गड्डियों का भारी जखीरा मिला। इस घटना के बाद हड़कंप मच गया और उन पर बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगे।
जिस वक्त यह बात सामने आई, उस समय वह दिल्ली हाई कोर्ट में जज थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्हें उनके पैरेंट कैडर यानी इलाहाबाद हाई कोर्ट वापस भेज दिया गया। तब के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना द्वारा बनाई गई इन-हाउस जांच कमेटी और बाद में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित समिति के सामने जस्टिस वर्मा ने खुद को बेकसूर बताया था।
उन्होंने दावा किया था कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि उनके घर में इतना बेहिसाब पैसा कहां से आया। आखिरकार, दबाव बढ़ता देख उन्होंने इसी साल अप्रैल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया था।
इस्तीफे के बाद क्यों फंसा है कानूनी पेच?
कानूनी जानकारों के बीच इस समय सबसे बड़ी बहस यही है कि जब एक जज ने पहले ही इस्तीफा दे दिया है, तो फिर जज जांच अधिनियम (Judges Inquiry Act) के तहत उन्हें हटाने वाले प्रस्ताव का क्या मतलब रह जाता है? कई विशेषज्ञों का मानना है कि पद छोड़ने के बाद यह प्रस्ताव अपने आप बेअसर (Infructuous) हो जाता है।
लेकिन दिल्ली के सियासी और कानूनी गलियारों से आ रही खबरें बताती हैं कि यह मामला पूरी तरह से एक 'ग्रे एरिया' (यानी कानून की धुंधली लकीर) बना हुआ है। इसके पीछे दो बड़े तर्क दिए जा रहे हैं:
- पहला यह कि जस्टिस वर्मा के पद छोड़ने के बाद भी जांच कमेटी ने अपनी कार्यवाही नहीं रोकी और अपनी पूरी रिपोर्ट तैयार करके लोकसभा स्पीकर को सौंपी।
- दूसरा बड़ा पेच यह है कि इस्तीफा देने के इतने दिनों बाद भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के आधिकारिक पोर्टल पर सर्विंग जजेस (वर्तमान न्यायाधीशों) की लिस्ट में अभी भी जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम दिखाई दे रहा है। ऐसे में सदन इस पर अंतिम फैसला लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
इस पूरे मामले से जुड़े कुछ बड़े सवाल
सवाल 1: क्या इस्तीफा दे चुके जज के खिलाफ संसद में हटाने का प्रस्ताव पास हो सकता है?
जवाब: भारतीय इतिहास में ऐसा मामला बेहद दुर्लभ है। आमतौर पर संसद में वोटिंग से ठीक पहले आरोपी जज इस्तीफा दे देते हैं जिससे प्रक्रिया रुक जाती है। लेकिन तकनीकी रूप से यदि कोई जज अभी भी आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल है या सदन चाहे, तो रिपोर्ट पर चर्चा कराकर अपनी राय तय कर सकता है।
सवाल 2: जजों को हटाने के लिए संसद में कितने वोटों की जरूरत होती है?
जवाब: भारत में किसी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में विशेष बहुमत (2/3rd Majority) की जरूरत होती है। साथ ही वोट देने वाले सदस्यों की संख्या कुल सदन की संख्या के आधे से अधिक होनी चाहिए।
सवाल 3: इस मामले में आगे क्या होने की उम्मीद है?
जवाब: 20 जुलाई को मानसून सत्र शुरू होते ही जब लोकसभा अध्यक्ष इस रिपोर्ट को सदन के सामने रखेंगे, तो दोनों पक्षों के सांसदों की सहमति से यह तय होगा कि क्या इस पर बहस कराई जाए या इस्तीफा स्वीकार होने के कारण मामले को यहीं बंद कर दिया जाए।














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