TMC के 20 सांसद ने NCPI को क्यों चुनी? कौन है पार्टी चीफ पवन दास? इनसाइड स्टोरी,जो कानून की धज्जियां उड़ा देगी
Why TMC Rebel MPs Choose NCPI: भारतीय राजनीति में कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। अभी पिछले हफ्ते तक जिस पार्टी का नाम त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों के बाहर किसी ने सुना तक नहीं था, आज वह अचानक देश की संसद में एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है। हम बात कर रहे हैं 'नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया' यानी NCPI की। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने अचानक इस 6 साल पुरानी क्षेत्रीय पार्टी में शामिल होने का ऐलान कर सबको चौंका दिया।
इस एक फैसले ने न सिर्फ ममता बनर्जी की नींद उड़ा दी है, बल्कि केंद्र की बीजेपी-नीत NDA गठबंधन को बिना मांगे एक नया और बड़ा साथी थमा दिया है। आइए समझते हैं कि इस पूरी राजनीतिक पिक्चर का असली विलेन, हीरो और सस्पेंस क्या है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब बागी सांसदों के सामने कई राजनीतिक विकल्प मौजूद थे, तब उन्होंने NCPI को ही क्यों चुना? क्या यह सिर्फ राजनीतिक मजबूरी थी या इसके पीछे कोई बड़ा कानूनी और रणनीतिक खेल छिपा है? और आखिर वह पवन कुमार दास कौन हैं, जिनकी पार्टी अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई है?
आखिर बागियों ने NCPI को ही क्यों चुना?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इन 20 बागी सांसदों ने बीजेपी में जाने या कोई नई पार्टी बनाने के बजाय एक ऐसी पार्टी को क्यों चुना, जिसके पास पहले से एक भी सांसद या विधायक नहीं था? इसके पीछे बहुत ही सोची-समझी कानूनी और राजनीतिक रणनीति है।
अगर ये सांसद सीधे बीजेपी में शामिल हो जाते, तो ममता बनर्जी और विपक्ष को यह कहने का सीधा मौका मिल जाता कि यह पूरी बगावत बीजेपी ने करवाई है। इससे जनता के बीच उनकी छवि 'दलबदलू' की बनती। दूसरी तरफ, अगर वे एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने जाते, तो चुनाव आयोग (EC) से मान्यता लेने, नाम और चुनाव चिह्न तय करने में महीनों का समय लग जाता। इस बीच उन पर दलबदल कानून के तहत अयोग्य घोषित होने का खतरा मंडराता रहता।
ऐसे में NCPI उनके लिए एक तैयार 'कवच' की तरह सामने आई। यह पार्टी पहले से चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड है, इसका अपना एक ढांचा है और कानूनी वजूद भी है। बागियों को लगता है कि एक चलती पार्टी में विलय (Merge) करके वे खुद को दलबदलू के ठप्पे से बचा लेंगे।
बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने खुद यह बात मानी है कि जब आप दो-तिहाई बहुमत के साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो पहले दिन ही मूल पार्टी के नाम पर दावा नहीं कर सकते। उनका प्लान साफ है- अभी NCPI के जरिए संसद में अपनी सदस्यता बचाओ और आने वाले समय में कोर्ट के जरिए असली तृणमूल कांग्रेस पर अपना दावा ठोक दो।
कौन हैं पवन कुमार दास और क्या है इस पार्टी का एजेंडा? (Who Leads The Party Paban Kumar Das?)
इस गुमनाम पार्टी के पीछे जिस शख्स का दिमाग है, उनका नाम है पवन कुमार दास। पवन कुमार दास त्रिपुरा की राजनीति के एक पुराने और जाने-माने आदिवासी नेता हैं, जो राज्य में मंत्री भी रह चुके हैं। उन्होंने साल 2020 में NCPI की स्थापना की थी। शुरुआत में इस पार्टी को बनाने का मकसद त्रिपुरा में आदिवासियों का कल्याण, राष्ट्रवाद और प्रशासनिक सुधारों को बढ़ावा देना था।
भले ही इस पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है, लेकिन इसका मुख्य कामकाज और जनाधार त्रिपुरा में ही सिमटा हुआ था। यह पार्टी खुद को एक राष्ट्रवादी और विकासवादी संगठन बताती है। इसके मुख्य एजेंडे में मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा, आदिवासियों और पिछड़े समाज का कल्याण, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और छोटे समुदायों को राजनीति में ज्यादा जगह देना शामिल है।
दिलचस्प बात यह है कि NCPI का झुकाव हमेशा से एनडीए (NDA) की नीतियों की तरफ रहा है, इसलिए बागियों के लिए यहां जाना और भी आसान हो गया। हालांकि इस विलय के बाद अब पार्टी की कमान व्यावहारिक तौर पर टीएमसी से आए काकोली घोष जैसे बड़े चेहरों के हाथ में जाने की उम्मीद है।
रातों-रात कैसे बदल गई संसद की तस्वीर?
इस विलय से पहले देश की राजनीति में NCPI की हैसियत शून्य के बराबर थी, लेकिन 20 सांसदों के आते ही यह पार्टी रातों-रात देश की संसद में एक बड़ी ताकत बन गई है। अब हालत यह है कि लोकसभा में बीजेपी के बाद NCPI एनडीए (NDA) गठबंधन का दूसरा सबसे बड़ा घटक दल बन गई है।
इस बदलाव से तृणमूल कांग्रेस को बहुत बड़ा झटका लगा है। लोकसभा में टीएमसी की ताकत घटकर सिर्फ 8 सांसदों की रह गई है। वहीं, दूसरी तरफ एनडीए का आंकड़ा 294 से बढ़कर 314 पर पहुंच गया है। हालांकि एनडीए अभी भी लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत से थोड़ा दूर है, लेकिन इस नए समीकरण ने विपक्ष के हौसले पस्त कर दिए हैं।
दलबदल कानून और संविधान की असली पहेली
इस पूरी कहानी का सबसे पेचीदा हिस्सा कानूनी है। भारत का दलबदल विरोधी कानून (संविधान की 10वीं अनुसूची), जिसे 1985 में लाया गया था, वह साफ कहता है कि कोई भी सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी नहीं बदल सकता। साल 2003 में हुए संशोधन के बाद अब पार्टी में 'विभाजन' या स्प्लिट (1/3 सदस्यों का अलग होना) जैसी कोई छूट नहीं बची है।
अब बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है- विलय (Merger)। कानून के मुताबिक, अगर किसी मूल राजनीतिक पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय होता है और उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्य इसके लिए तैयार होते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी।
यहीं पर सबसे बड़ा पेंच फंसा हुआ है। टीएमसी के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी और जाने-माने वकील कपिल सिब्बल का तर्क है कि दलबदल कानून में 'पार्टी के विलय' की बात कही गई है, न कि 'विधायक दल या संसदीय दल के विलय' की।
उनका कहना है कि जब तक ममता बनर्जी की अगुवाई वाली मुख्य टीएमसी पार्टी खुद को NCPI में मर्ज नहीं करती, तब तक सिर्फ सांसदों का एक गुट खुद को अलग करके किसी दूसरी पार्टी में विलय का दावा नहीं कर सकता। 2023 के महाराष्ट्र संकट (शिवसेना विवाद) में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि विधायी विंग (संसद के अंदर के लोग) और राजनीतिक संगठन (पार्टी के पदाधिकारी) दो अलग-अलग चीजें हैं।
अब आगे क्या होगा और स्पीकर की भूमिका?
इस समय गेंद पूरी तरह से लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के पाले में है। बागी सांसदों ने उन्हें पत्र सौंपकर अलग बैठने की जगह मांगी है। स्पीकर अब इन सभी 20 सांसदों के हस्ताक्षरों की जांच करेंगे और कानून के दायरे में इस पर फैसला लेंगे।
जब तक स्पीकर इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाते, तब तक ये बागी सांसद तकनीकी रूप से टीएमसी के ही सदस्य माने जाएंगे। इसका मतलब यह है कि अगर संसद में कोई वोटिंग होती है, तो इन्हें टीएमसी के व्हिप (Whip) का पालन करना होगा। अगर वे व्हिप का उल्लंघन करते हैं, तो उन पर तुरंत अयोग्य होने का खतरा बढ़ जाएगा। चूंकि दलबदल कानून में स्पीकर के फैसला लेने की कोई समय सीमा तय नहीं है, इसलिए यह कानूनी लड़ाई लंबी खिंच सकती है और अंततः इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर ही होगा।














Click it and Unblock the Notifications