NDA में जाते ही अब चली जाएगी ममता बनर्जी के 20 बागी सांसदों की सांसदी? क्या कहता है कानून, समझ लीजिए पूरा गणित

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त दिल्ली से लेकर कोलकाता तक एक बहुत बड़ा सियासी भूचाल आया हुआ है। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक ऐसी बगावत की पटकथा लिखी जा रही है, जो केंद्र से लेकर राज्य तक की राजनीति को हिलाकर रख देगी। दिल्ली में 14 जून को हुए एक बड़े सियासी ड्रामे के तहत लोकसभा में TMC के करीब 20 बागी सांसद ममता बनर्जी की पार्टी का साथ छोड़कर बीजेपी की अगुवाई वाले NDA में शामिल होने का ऐलान कर चुके हैं। इन बागी सांसदों ने दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की है।

सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष और शताब्दी रॉय जैसे बड़े नामों वाले इस बागी गुट ने खुद को 'नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी' (NCP) में विलय करने और दो-तिहाई बहुमत होने का दावा किया है। वहीं टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर को चिट्ठी लिखकर इस बगावत का विरोध किया है।

TMC Anti-Defection Law

इस पूरे सियासी घमासान के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या संविधान के दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत इन बागी 20 सांसदों की सदस्यता बची रहेगी या यह खतरे में पड़ जाएगी? ऐसे में आइए समझते हैं संविधान का वो दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) और लोकसभा की सीटों का वो अंकगणित, जो इन सांसदों का भविष्य तय करेगा।

🔷TMC Political Crisis: TMC में बगावत: कौन-कौन से बड़े दावे हुए?

🔹 NCP में विलय का ऐलान
TMC के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी (NCP) में शामिल होने की घोषणा की। बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि अब उनका समूह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले NDA के साथ काम करेगा।

🔹 दिल्ली में हुई अहम बैठक
काकोली घोष समेत 17 बागी सांसदों ने दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठक की। इसके बाद सभी सांसद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी मिले।

🔹 दो-तिहाई समर्थन का दावा
काकोली घोष ने दावा किया कि उनके साथ TMC के दो-तिहाई से अधिक सांसद हैं, इसलिए दल-बदल कानून के तहत उनका विलय संवैधानिक रूप से वैध है। बाद में उन्होंने 22 सांसदों के समर्थन का भी दावा किया।

🔹 'असली TMC' पर कानूनी लड़ाई
वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि अब अदालत तय करेगी कि असली TMC कौन है। बागी गुट ने पार्टी के चुनाव चिन्ह 'जुड़वा फूल' पर भी दावा करने की बात कही है।

🔹 स्पीकर को शिकायत
TMC सांसद कीर्ति आजाद ने बागी नेताओं के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष को औपचारिक शिकायत सौंप दी है। उनका कहना है कि महाराष्ट्र जैसे राजनीतिक घटनाक्रम की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए।

🔹 सायोनी घोष और माला रॉय पर नजर
दिल्ली पहुंचीं सायोनी घोष ने फिलहाल कोई टिप्पणी करने से इनकार किया। ममता बनर्जी उन्हें और माला रॉय को पार्टी पदों से हटा चुकी हैं।

🔹 लीगल नोटिस भी भेजा गया
काकोली घोष के बेटे बैद्यनाथ ने ममता बनर्जी, महुआ मोइत्रा और कल्याण बनर्जी को कानूनी नोटिस भेजकर टिकट मांगने के आरोपों को खारिज किया है।

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🔷What Is Anti-Defection Law: क्या है दल-बदल विरोधी कानून?

दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) भारतीय राजनीति का एक ऐसा पहरेदार है, जिसे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थिर रखने के लिए संविधान में जगह दी गई। 1960 और 70 के दशक में भारतीय राजनीति में एक जुमला बहुत मशहूर हुआ था-"आया राम, गया राम"। दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने महज एक ही दिन में तीन बार अपनी राजनीतिक पार्टी बदल डाली थी। नेताओं के इस तरह पैसे, मंत्री पद या लालच में आकर बार-बार पार्टियां बदलने से सरकारें ताश के पत्तों की तरह गिरने लगी थीं।

इसी राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए साल 1985 में राजीव गांधी सरकार के समय 52वां संविधान संशोधन किया गया, जिसके तहत संविधान में 10वीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़ी गई। इसी को हम 'दल-बदल विरोधी कानून' कहते हैं।

दल-बदल विरोधी कानून में सांसदों और विधायकों को अयोग्यता से बचाने के लिए एक विशेष छूट (Exception) दी गई है। कानून के मुताबिक, अगर किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्य एक साथ टूटकर अलग होते हैं और किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो इसे कानूनी तौर पर 'विलय' (Merger) माना जाता है। ऐसे मामलों में पाला बदलने वाले सांसदों की सदस्यता रद्द नहीं होती और न ही मूल पार्टी में बचे रहने वाले लोगों पर कोई आंच आती है।

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🔷20 सांसदों की बगावत: क्या कहता है लोकसभा का गणित?

अब आते हैं उस असली अंकगणित पर जो यह तय करेगा कि ममता बनर्जी के इन 20 बागी सांसदों की कुर्सी बचेगी या जाएगी। यहां कानून का पेंच बहुत ध्यान से समझने की जरूरत है:

  • लोकसभा में टीएमसी की कुल संख्या: मौजूदा लोकसभा में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के पास कुल 28 सांसद हैं।
  • कानूनी मान्यता के लिए जरूरी संख्या: 10वीं अनुसूची के दो-तिहाई (2/3) नियम के मुताबिक, अगर टीएमसी के लोकसभा सांसदों को बिना अपनी सदस्यता गंवाए अलग गुट बनाना है या एनडीए में जाना है, तो कुल 28 सांसदों में से कम से कम 19 सांसदों (28 का 2/3 = 18.66, यानी पूर्णांक में 19) का एक साथ आना अनिवार्य है।
  • बागी गुट का दावा: बगावत करने वाले धड़े का दावा है कि उनके साथ कुल 20 सांसद मौजूद हैं।

अगर बागी गुट का 20 सांसदों के साथ होने का दावा बिल्कुल सच साबित होता है, तो यह संख्या कानूनी रूप से जरूरी 19 के आंकड़े (दो-तिहाई) को पार कर जाएगी। ऐसी स्थिति में कानूनन इन सांसदों की सदस्यता नहीं जाएगी और वे बिना किसी डर के एनडीए का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन अगर आखिरी वक्त पर यह संख्या 19 से घटकर 18 भी रह गई, तो दो-तिहाई का नियम फेल हो जाएगा और पाला बदलने वाले सभी सांसदों की सदस्यता रद्द हो जाएगी।

🔷पूरे मामले में लोकसभा स्पीकर की भूमिका और कानूनी पेच

इस पूरे सियासी ड्रामे में सबसे अहम भूमिका देश के लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) की होती है। दल-बदल कानून के तहत किसी भी सांसद को अयोग्य ठहराने या न ठहराने का अंतिम और सर्वोच्च अधिकार लोकसभा स्पीकर के पास ही सुरक्षित होता है। हालांकि, बागी सांसद अपने फैसले की जानकारी देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष की तलाश कर रहे हैं, लेकिन स्पीकर इस वक्त दिल्ली में नहीं बल्कि चंडीगढ़ में हैं।

कानून में कुछ बेहद जरूरी और पेचीदा बातें भी हैं जिन्हें जानना जरूरी है। इस कानून में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि लोकसभा अध्यक्ष को दल-बदल की अर्जी पर कितने दिनों के भीतर अपना फैसला सुनाना होगा। कई बार इस फैसले में महीनों या सालों का वक्त लग जाता है, और तब तक बागी सदस्य सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेते रहते हैं।

साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद, अब लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन अदालत तब तक दखल नहीं दे सकती जब तक स्पीकर अपना अंतिम आदेश जारी न कर दें।

फिलहाल बगावत की यह चिंगारी दिल्ली से लेकर बंगाल तक सुलग रही है। अब देखना यह होगा कि क्या 19 सांसदों का यह जादुई आंकड़ा जमीन पर बरकरार रहता है या ममता बनर्जी का संकट प्रबंधन इस बगावत को नाकाम कर देता है।

TMC Anti-Defection Law

🔷What Is Anti Defection Law In India: अब दल-बदल विरोधी कानून के बारे में डिटेल में जानिए

1. कोई सांसद या विधायक कब 'दल-बदलू' माना जाता है? (When is a Legislator Disqualified?)

संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत किसी भी निर्वाचित सदस्य (MP या MLA) को इन परिस्थितियों में अयोग्य (Disqualify) ठहराया जा सकता है और उसकी कुर्सी जा सकती है:

  • स्वेच्छा से इस्तीफा देना (Voluntarily Giving Up Membership): अगर कोई निर्वाचित सदस्य खुद अपनी मर्जी से उस राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह चुनाव जीतकर आया है।
  • पार्टी के आदेश (Whip) का उल्लंघन करना: संसद या विधानसभा में किसी भी बिल या प्रस्ताव पर वोटिंग के समय हर पार्टी एक निर्देश (जिसे 'व्हिप' कहते हैं) जारी करती है। अगर कोई सदस्य अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ जाकर वोट करता है, या वोटिंग के दिन सदन से गायब रहता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। (हालांकि, अगर पार्टी 15 दिनों के भीतर अपने उस सदस्य को माफ कर दे, तो उसकी कुर्सी बच सकती है)।
  • निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए नियम: अगर कोई नेता 'निर्दलीय' (Independent) उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता है और जीतने के बाद वह किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है, तो उसकी सदस्यता तुरंत खत्म हो जाएगी।
  • मनोनीत (Nominated) सदस्यों के लिए नियम: राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा सदन में मनोनीत किए गए सदस्य यदि अपनी नियुक्ति के 6 महीने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होते हैं, तो वे भी अयोग्य माने जाएंगे (उन्हें पार्टी जॉइन करनी है तो शुरुआती 6 महीने के भीतर ही करनी होगी)।

🔷2. इस कानून के अपवाद क्या हैं? कुर्सी कब बच सकती है? (Exceptions to the Anti-Defection Law)

इस कानून में कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियां भी बताई गई हैं, जहां पाला बदलने के बावजूद सांसदों या विधायकों की सदस्यता पर कोई आंच नहीं आती:

  • दो-तिहाई का नियम (The 2/3rd Merger Rule): शुरुआत में (1985 में) नियम था कि अगर किसी पार्टी के एक-तिहाई (1/3) सदस्य टूटते हैं, तो उनकी सदस्यता बच जाएगी। लेकिन इसके बाद थोक में पार्टियां टूटने लगीं। इसलिए साल 2003 में 91वां संविधान संशोधन किया गया और नियम को कड़ा कर दिया गया।
  • मौजूदा नियम: अब यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्य एक साथ मिलकर अपनी मूल पार्टी से अलग होते हैं और किसी दूसरी पार्टी में अपना विलय (Merger) करते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं माना जाएगा। उन सभी की सदस्यता पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।

🔷स्पीकर या चेयरपर्सन बनने पर

अगर सदन का कोई सदस्य लोकसभा का अध्यक्ष (Speaker), राज्यसभा का उपसभापति, या विधानसभा का अध्यक्ष चुना जाता है, तो वह निष्पक्ष रहने के लिए अपनी पार्टी से इस्तीफा दे सकता है। जब वह इस पद से हटेगा, तो दोबारा अपनी पार्टी में शामिल हो सकता है। इस दौरान उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता।

🔷3. फैसले का अंतिम अधिकार और समय सीमा का पेंच

दल-बदल कानून के तहत किसी सदस्य को अयोग्य ठहराने का अंतिम और सर्वोच्च फैसला सदन के पीठासीन अधिकारी यानी लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) या राज्यसभा के सभापति (Chairman) का होता है।

इस मोर्चे पर कानून में दो बड़े पेंच (Loopholes) हैं, जिनका राजनीतिक दल अक्सर फायदा उठाते हैं:

कोई निश्चित समय सीमा नहीं (No Fixed Timeframe): संविधान में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि स्पीकर को दल-बदल की याचिका पर कितने दिनों के भीतर अपना फैसला देना होगा। कई बार दल-बदल के मामलों पर स्पीकर महीनों या साल भर तक कोई फैसला ही नहीं लेते।

इसका नतीजा यह होता है कि पाला बदलने वाले सदस्य लंबे समय तक सदन की कार्यवाही का हिस्सा बने रहते हैं और सरकारें बचाने या गिराने में वोट भी कर देते हैं। (हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में टिप्पणी की है कि ऐसे फैसले सामान्यतः 3 महीने के भीतर हो जाने चाहिए)।

अदालती समीक्षा (Judicial Review): 1985 में जब कानून बना था, तब नियम था कि स्पीकर के फैसले को किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन 1992 में 'किहोतो होलोहान' (Kihoto Hollohan) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि जब स्पीकर दल-बदल पर फैसला देते हैं, तो वे एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) की तरह काम करते हैं। इसलिए उनके अंतिम फैसले की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है और उसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन, अदालत स्पीकर के फैसला लेने से पहले इस प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती।

🔷4. दल-बदल कानून की सबसे बड़ी कमजोरी या आलोचना (Criticism of Anti-Defection Law)

भले ही इस कानून ने सरकारों को बार-बार गिरने से बचाकर राजनीतिक स्थिरता दी हो, लेकिन लोकतांत्रिक नजरिए से इसके कुछ बड़े नुकसान भी हैं:

  • नेताओं की अंतरात्मा की आवाज पर ताला: इस कानून के कारण सांसद या विधायक सदन में अपनी अंतरात्मा की आवाज, अपनी व्यक्तिगत बुद्धि या अपने क्षेत्र की जनता के हितों के अनुसार स्वतंत्र रूप से फैसला या वोट नहीं ले पाते। उन्हें हर छोटे-बड़े बिल पर अपनी पार्टी के आलाकमान (High Command) के आदेश यानी व्हिप का पालन करना ही पड़ता है, भले ही वे अंदर से उस फैसले के खिलाफ क्यों न हों।
  • विधायिका पर कार्यपालिका का अत्यधिक नियंत्रण: यह कानून सरकार के खिलाफ बोलने की सांसदों की आजादी को सीमित कर देता है। कई विशेषज्ञों का सुझाव है कि दल-बदल कानून को केवल उन्हीं महत्वपूर्ण मौकों पर लागू किया जाना चाहिए जिससे सरकार की स्थिरता जुड़ी हो-जैसे अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion), बजट पास होना, या धन विधेयक (Money Bill)। आम विधेयकों पर सांसदों को खुलकर अपनी राय रखने और वोट करने की आजादी होनी चाहिए।
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