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Rahul Gandhi के 'वोट चोरी' दावे का जानें पूरा फैक्ट चेक, आंकड़ों और तथ्यों के साथ जानें हर आरोप का सच

Rahul Gandhi Vote Chori Claims: भारत के राजनीतिक मंच पर इन दिनों एक और पर्दा उठ गया है। सामने जो दिख रहा है वह कई अर्थों में विचित्र है। भारतीय लोकतंत्र की पहचान रहे किसी महत्वपूर्ण काम या मिशन से अलग यह एक नाटकीय मंचन जैसा लग रहा है। इस नाटक के केंद्रीय किरदार राहुल गांधी ही हैं।

लोकसभा में नेता विपक्ष दावा कर रहे हैं कि देश की चुनावी प्रणाली भ्रष्ट और विपक्ष के प्रति अन्यायपूर्ण है। पिछले कुछ समय में इस मुद्दे पर उन्होंने जोशीले भाषण दिए हैं। उनके भाषण गंभीर आरोपों से भरे हुए हैं, जिनका उद्देश्य जनता को उत्तेजित करना लग रहा है। तथ्यों को अगर बारीकी से विश्लेषण करें, तो ये दावे कहीं टिकते नजर नहीं आ रहे हैं।

Rahul Gandhi Vote Chori

Rahul Gandhi ने मतदाता संख्या पर उठाए सवाल

राहुल गांधी का आरोप है कि भारत की चुनावी प्रणाली भ्रष्ट है और विपक्ष के प्रति अन्यायपूर्ण है। उन्होंने महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मतदाताओं की संख्या में अचानक वृद्धि पर सवाल उठाए हैं।

फैक्ट: सच्चाई यह है कि पूर्व में आंकड़ों में इस तरह का परिवर्तन कांग्रेस के शासन में भी देखा जा चुका है। हालांकि, यह दूसरी बात है कि इन दावों के बाद भी न तो उन्होंने कोई औपचारिक शिकायत दर्ज की है और न ही न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही अपील कर रहे हैं।

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चुनाव आयोग और प्रक्रिया पर संदेह

लोकसभा में नेता विपक्ष पिछले कई महीनों से देश को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि चुनावी मशीनरी सत्ता पक्ष की तरफ झुक चुकी है। चुनाव आयोग निष्पक्ष तरीके से चुनाव नहीं करा रहा है। मतदाता सूची में फर्जी नाम भरे हुए हैं और आयोग की भूमिका संवैधानिक संस्था की न होकर सत्ता पक्ष की मशीनरी बन गई है। सोशल मीडिया पर इस दावे को लगातार प्रचारित किया जा रहा है और भाषणों में भी इसका बार-बार जिक्र कर रहे हैं।

फैक्ट: राहुल गांधी के जोशीले भाषणों को अगर तथ्यों की कसौटी पर परखें, तो उनके दावे हवाई किले की तरह बिखर जाते हैं। कांग्रेस सांसद की मुख्य शिकायत है कि मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी संदिग्ध है। खास तौर पर महाराष्ट्र और कर्नाटक में। अब इसे संख्यावार समझते हैं।

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कांग्रेस सांसद ने महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के बीच पंजीकृत मतदाताओं में 4.4% की बढ़ोतरी का दावा किया है। उनके दावे को पुराने आंकड़ों के आधार पर परखते हैं:

2004 में यह बढ़ोतरी 4.7% रही थी और लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद यूपीए की सरकार केंद्र में बनी थी। 2009 मे जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी तब लोकसभा चुनाव से विधानसभा चुनाव के बीच यह वृद्धि 4.1% थी। 2024 के जिस आंकड़े को नेता विपक्ष संदिग्ध बता रहे हैं, असल में जब उनकी पार्टी केंद्र और राज्य की सत्ता में थी, तब से भी कम हैं। यहां कुछ अहम बातें ध्यान में रखने योग्य हैं:

Rahul Gandhi Vote Chori

⦁ चुनाव आयोग और प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की वृद्धि सामान्य और नियमित होती है। यह लगातार पंजीकरण, सत्यापन और सुधार की कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। हैरानी की बात यह है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के हर बूथ एजेंट ने मतदान खत्म होने पर फॉर्म 17C पर हस्ताक्षर किए थे। यह हस्ताक्षर बिना किसी गड़बड़ी के नियमों के दायरे में मतदान की प्रक्रिया पर सहमति के संदर्भ में होता है।

⦁ कांग्रेस की ओर चुनाव नतीजों को चुनौती देने के लिए एक भी याचिका दायर नहीं की गई है। अगर आंकड़े वाकई संदिग्ध थे, जैसा कि राहुल गांधी दावा कर रहे हैं, तो सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ही क्यों रुक गए? उन्होंने अदालत का दरवाजा भी नहीं खटखटाया, जहां आरोपों को सबूतों के आधार पर परखा जा सकता है।

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कर्नाटक में Vote Chori के दावे का सच

राहुल गांधी ने बेंगलुरु के महादेवपुरा क्षेत्र को मतदाता सूची में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए आंकड़े पेश किए थे। उनके ही दिए आंकड़े अलग कहानी कहते हैं। वहां बीजेपी को जीत मिली है, लेकिन यह जीत बेंगलुरु सेंट्रल के कई विधानसभा क्षेत्रों में दिखने वाले रुझान का एक हिस्सा है। ये आंकड़े खुद कांग्रेस और लोकसभा में नेता विपक्ष के लिए असहज कर सकते हैं। जिन क्षेत्रों में मतदाता सूची में गड़बड़ी, फर्जी वोटर का दावा किया है, वो हैं शिवाजी नगर और चामराजपेट। ये अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र हैं और ये दोनों क्षेत्र कांग्रेस का मजबूत गढ़ है। यहां डुप्लिकेट वोटर एंट्री, घर के नंबरों की कमी, और असामान्य रूप से ज्यादा मतदान जैसे लक्षण मिले हैं। इन्हीं गड़बड़ियों के खिलाफ लड़ने का दावा राहुल गांधी खुद कर रहे हैं।

महाराष्ट्र का मालेगांव सेंट्रल के दावों की पड़ताल

इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक आबादी 90% से ज्यादा है और 2024 में यहां हुए मतदान में 43.51% की असाधारण बढ़त दिखी है। मतदाता सूची में 9,700 से ज्यादा नामों के पते अधूरे थे। यह वही इकलौती विधानसभा है जिसने धुले लोकसभा सीट का नतीजा पलट दिया था। इस लोकसभा क्षेत्र की पांच विधानसभा में बीजेपी आगे थी, जबकि यहां कांग्रेस ने बाजी मारी। इन आंकड़ों की एक कहानी है, लेकिन यह कहानी राहुल गांधी के दावों से उलट हैं। गड़बड़ियों के संकेत मिले हैं, लेकिन कांग्रेस सांसद जिस तरह के पक्षपात के दावे कर रहे हैं यह उसके ठीक उलट है।

चुनावी नतीजों को लेकर राहुल गांधी का रवैया अब तक दोहरे मानदंड वाला रहा है। जब कांग्रेस जीतती है, जैसे कि जैसे झारखंड या जम्मू-कश्मीर में, तो प्रक्रिया को निष्पक्ष और जनता की आवाज और फैसले को सर्वोपरि बताया जाता है। अगर बीजेपी जीतती है, जैसे कि महाराष्ट्र या हरियाणा में तब उसी प्रक्रिया को लोकतंत्र के पतन का सबूत बताया जाता है। यहां यह याद रखना चाहिए कि चुनाव के नियम राज्यों के आधार पर या कुछ महीने के अंतर पर नहीं बदलते हैं। अगर कुछ बदलता है, तो वह है चुनाव का नतीजा। अंग्रेजी में एक कहावत है 'Heads I win, tails you lose' यानी कि चित भी मेरी और पट भी मेरी वाली राजनीति।

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चुनाव आयोग ने दी है औपचारिक शिकायत करने की चुनौती

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर बार-बार सवाल उठा रहे नेता विपक्ष को आयोग ने अपने बयानों को शपथपत्रों और औपचारिक शिकायतों के साथ साबित करने की कई बार चुनौती दी है। अगर उनके दावों में सत्यता है, तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कानूनी संरक्षण मिलेगा। हालांकि, अगर उनके दावे भ्रामक और झूठ साबित होते हैं, तो भारतीय न्याय संहिता के तहत उन्हें कार्रवाई का भी सामना करना पड़ सकता है। अब तक कांग्रेस सांसद ने इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया है।

हालांकि, इसके बजाय वे राजनीतिक सभाओं और मीडिया के मंच पर वही दावे दोहरा रहे हैं। वह राजनीतिक दांव-पेच वाली जगहों पर अपने दावे दोहरा रहे हैं, जहां इनका कोई कानूनी आधार नहीं होता है। इस तरीके के लिए अंग्रेजी में "शूट-एंड-स्कूट" का इस्तेमाल होता है। आसान शब्दों में कहें, तो आरोपों के मिसाइल दागो, मीडिया में धमाका करो और इससे पहले कि कोई सबूत मांगे, हाथ झटककर आगे बढ़ जाओ।

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विदेशी मंच पर भी दोहराते रहे हैं अपने आरोप

राहुल गांधी लोकसभा और विधानसभा चुनालव में वोट चोरी और धांधली के आरोप देश की राजनीति तक सीमित नहीं रखते हैं। विदेशों में भी वह इसका जिक्र कर चुके हैं। विदेशों में राहुल गांधी भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था और भविष्य को लेकर आशंका जाहिर करते हैं। अब तक की उनकी रणनीति पर आलोचकों का कहना है कि यह कुछ ऐसा है कि घर पर दावा करो, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सहानुभूति पाने के लिए विदेशी मंच पर ऐसे दावे दोहराओ। विदेशी मीडिया में प्रसारित उन रिपोर्ट्स को भारत में वैश्विक समर्थन की नुमाइंदगी के तौर पर पेश करो।

Rahul Gandhi Vote Chori

इससे उनके आरोपों की विदेशों में चर्चा हो रही है और एक वैश्विक सहमति बन रही है, इसका भ्रम थोड़े समय के लिए जरूर पैदा करता है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह तरीका 'कलर रिवॉल्यूशन' रणनीति से मिलता है। कई देशों में इसी रणनीति के तहत जहां विपक्षी संगठन आंदोलन करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय दबाव की वजह से चुनी हुई सरकारें कमजोर पड़ती हैं और कई बार सत्ता से बेदखल भी हो जाती हैं।

SIR पर भी जारी है घमासान

इन सभी आरोपों के बीच, वोटर लिस्ट में संशोधन का एक जरूरी काम बिहार में चल रहा है। सिस्टमैटिक वोटर रोल प्यूरीफिकेशन एंड ऑथेंटिकेशन (SIR) प्रक्रिया के तहत बिहार से 65 लाख से ज्यादा फर्जी मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। इनमें मृतकों, राज्य छोड़ देने वाले लोगों और डुप्लिकेट एंट्री को हटाया गया है। केरल में, आंतरिक जांचों में 6.25 लाख से ज्यादा फर्जी मतदाता पाए गए थे और 2.7 लाख से ज्यादा मामलों में एक ही व्यक्ति को कई आईडी थी। हजारों मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें एक व्यक्ति ने एक से अधिक बार मतदान किया। इनमें से कुछ अनियमितताएं वायनाड में थीं, जो राहुल गांधी का निर्वाचन क्षेत्र रहा है।

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SIR प्रक्रिया का विरोध कांग्रेस की रणनीति रही है। आलोचकों का कहना है कि इस विरोध के पीछे मतदाताओं के अधिकारों का संरक्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक गुणा-गणित है। जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मजबूत वोट बैंक हैं, खास तौर पर अक्सर अल्पसंख्यक-बहुल शहरी इलाक़ों में, वहां वोटर लिस्ट संशोधन चुनावी हार-जीत को प्रभावित कर सकती है। खास तौर पर अगर इन क्षेत्रों में मुकाबला बेहद कड़ा होता रहा हो। धुले, मालेगांव सेंट्रल और कई बेंगलुरु निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस की जीत अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों की वजह से ही हुई, जबकि पार्टी बाकी जगहों पर पिछड़ गई थी।

राहुल गांधी की राजनीति का एक पैटर्न रहा है। सीएए विरोध प्रदर्शन, किसानों का आंदोलन, वक्फ एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर उनकी तय रणनीति रही है। उन्होंने इन सभी कानूनों का विरोध करते हुए इसे लोकतंत्र की आत्मा पर चोट के तौर पर पेश किया है। इन सभी प्रदर्शनों ने सड़कों पर लोगों का सैलाब खड़ा किया और मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरीं। हालांकि, एक तथ्य यह भी है कि इनमें से किसी मुद्दे पर देश की बहुसंख्यक आबादी को लोकतंत्र पर संकट नहीं लगा। हालांकि, इससे इनकार नहीं कर सकते हैं कि इन गतिविधियों ने राजनीतिक हंगामा मचाने और सरकार को कटघरे में खड़ा करने जितना माहौल जरूर बना दिया।

कांग्रेस में गांधी परिवार के विरोध के लिए जगह नहीं

कांग्रेस पार्टी के अंदर की व्यवस्था की बात करें, तो यहां असहमति खास तौर पर सुप्रीम परिवार के लिए बर्दाश्त नहीं की जाती है। कर्नाटक के अनुसूचित जनजाति से आने वाले मंत्री केएन राजन्ना को पद से हटा दिया गया। उन्होंने राहुल गांधी के चुनावी धांधली संबंधी दावों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया था। पार्टी ने इस एक्शन के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि सुप्रीम परिवार से बगावत की अनुमति नहीं है। राहुल ने खुद को खुले विमर्श और लोकतांत्रिक आदर्शों का पैरोकार बताया है। हालांकि, असहमति के प्रति यह बर्ताव उनकी उस छवि से मेल नहीं खाता है।

Rahul Gandhi Vote Chori

भारत जोड़ो यात्रा पर भी हैं सवाल

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा पर भी सवाल उठते रहे हैं। अमेरिका की एजेंसी यूएसएआईडी से जुड़े संगठनों सहित विदेशी फंडिंग पाने वाले एनजीओ की इसमें सक्रिय भागीदारी की खबरें मीडिया में आई थीं। राजनीति के आलोचकों का कहना है कि यह भागीदारी जमीनी स्तर पर जनता से संवाद की कोशिश तक सीमित नहीं रहेगी। इस देश की राजनीति में कुछ विदेशी तत्वों के अनुकूल नैरेटिव गढ़ने के लिए भी इस्तेनमाल की जाएगी। आज इस इस दौर में जी रहे हैं, जब देश के मुद्दे और वैश्विक लॉबिंग के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया है। ऐसे वक्त में 'लोकतंत्र बचाने' के कथित अभियान में विदेशी संस्थाओं की भागीदारी के अपने खतरे हैं।

इन तमाम घटनाओं को जोड़ने पर एक बात तय नजर आ रही है कि राहुल गांधी की रणनीति संस्थाओं में सुधार के बजाय उनमें जनता के भरोसे को कमजोर करने की है। इसका पैटर्न भी दिख रहा है: पहले, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाओ। फिर, 'रेफ़री' (निर्वाचन आयोग) को ही पक्षपाती साबित करो और प्रशासनिक गड़बड़ियों को साजिश का सबूत बनाकर पेश करो। इससे सड़क से लेकर मीडिया में आक्रोश का मौहाल बनेगा। यह सब अगले चुनाव नतीजे तक दोहराते जाना है। जब नतीजा आपके पक्ष में हो, तो लोकतंत्र को जीत और अगर नतीजा प्रतिकूल हो, तो लोकतंत्र के अंत की घोषणा कर दो।

भारत की चुनावी प्रक्रिया में भी हैं त्रुटियां

भारत की चुनावी प्रणाली भी एक मानवीय संस्था है। इसमें कुछ गड़बड़ी हो सकती है और समय के साथ सुधार की भी जरूरत है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि सुधार की संभावनाओं और तोड़फोड़ में अंतर होता है। सतर्कता जरूरी है जिसका मतलब है सबूत पेश करना, उचित प्रक्रिया का पालन करना और अपने दावों को वहां पेश करना, जहां से उसकी उचित जांच हो सके। इशारों-इशारों में आरोप लगाना, उन्हें बार-बार दोहराना, और कानूनी जांच से बचना, किसी सतर्कता नहीं है।भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में चुनावी प्रक्रिया उन कुछ पलों में से एक है जो सच में एक अरब से अधिक आबादी को एक सूत्र में जोड़ती है। इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर किसी नाटक के मंचन की तरह पेश करने पर कुछ पलों की सुर्खियां मिल सकती हैं। इसका दूरगामी असर लोकतंत्र को बनाए रखने के भरोसे को कमजोर करने के तौर पर पड़ सकता है। राहुल गांधी के सामने असली चुनौती किसी रैली में अपने नाम के नारे लगवाना नहीं है। उनकी चुनौती है कि क्या वह देश को अपने बार-बार दोहराए जाने वाले आरोपों पर यकीन दिला पाते हैं या नहीं। वह जगह किसी भी लोकतंत्र में होती है: कानून के सामने सच साबित करना।

जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक कुछ एक नाटक के मंचन जैसा है। यहां आरोप गूंजते रहेंगे, और देश देखता रहेगा। नाटक का पर्दा गिरेगा, तो उसका फ़ैसला न तो भीड़ करेगी और न विदेशी दर्शक। इसका फैसला वह मतदाता ही करेगा जो एक कार्डबोर्ड के पीछे खड़े होकर वह एक निशान के बटन को दबाएगा।

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