OI Exclusive: ‘17 साल तक कर्नल पुरोहित ने झेली बदनामी, साथी बन गए ब्रिगेडियर'! सब कुछ छूटा पीछे
OI Exclusive: 29 सितंबर 2008 को हुए मालेगांव बम ब्लास्ट केस में मुंबई की NIA कोर्ट ने फैसला दिया है। इस फैसले में सभी 7 आरोपियों में से किसी के खिलाफ सबूत नहीं मिले। लिहाजा कोर्ट ने कर्नल प्रसाद पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर समेत सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया है।
मालेगावं ब्लास्ट मामले पर किताब लिखने ('कर्नल पुरोहित द मैन बिट्रेयड') वाली लेखक और पत्रकार स्मिता मिश्रा ने वनइंडिया से बातचीत में इस केस के बारे में कई ऐसे तथ्य बताए जो आज तक आम जनता की पहूंच से दूर हैं।

कर्नल पुरोहित: हीरो को बनाया विलेन
मालेगांव ब्लास्ट केस की जांच शुरुआती दिनों में मुंबई ATS के पास गई। लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित के मुताबिक 29 अक्टूबर 2008 को उन्हें तब गिरफ्तार किया गया जब वे सेना में अपनी सेवाएं दे रहे थे। ATS ने लंबे वक्त तक कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी अपने रिकॉर्ड में नहीं दिखाई। कर्नल पुरोहित पर RDX लाने और बम बनाने का आरोप था।
योगी आदित्यनाथ के नाम लेने का था दबाव
कर्नल पुरोहित को जांच और पूछताछ के दौरान मुंबई ATS के अधिकारियों द्वारा काफी प्रताड़ना झेलना पड़ी। कई अफसर उनसे अवैध तरीकों और बिना अथॉरिटी के पूछताछ करते रहे। उन पर गोरखपुर के तत्कालीन सांसद का नाम लेने का दवाब भी डाला गया। उनहें तत्काली ATS चीफ और दिवंगत अधिकारी हेमंत करकरे और ATS के तत्काली ज्वॉइंट कमिश्नर द्वारा खंडाला के एक बंगले में ले जाया गया। यहां उनसे कई दिनों तक पूछताछ की गई।
बिन बाप बड़े हुए बच्चे
स्मिता मिश्रा ने बताया कि 'केस के दौरान उनकी पत्नी अपर्णा पुरोहित और बच्चों ने सामाजिक तौर पर कई परेशानियों का सामना किया। उनके बच्चे बिना पिता के प्यार के बड़े हुए। हालांकि जमानत के बाद उन्हें सेना में नौकरी मिल गई लेकिन उनका कभी प्रमोशन नहीं हुआ। उनके बैचमेट ब्रिगेडियर और यूनिट हेड जैसे पदों पर हैं लेकिन कर्नल पुरोहित आज भी लेफ्टिनेंट कर्नल ही हैं। उनके मुताबिक इस केस में परिवार के अलावा सेना ने उनकी सबसे ज्यादा मदद की।'
हिन्दू संगठन को टेररिस्ट गुट बनाने की साजिश
बकौल स्मिता, कुछ नेताओं ने इस केस की जांच को भटकाते हुए हिन्दू टेरर शब्द को उछालने की भरपूर कोशिश की। जबरन हिन्दू संगठनों से जुड़े लोगों पर कार्रवाईयां की गईं। हिन्दू धर्म को बदनाम करने की साजिश थी जो 17 सालों तक चली और कोर्ट में इसके खिलाफ कुछ नहीं मिल सका।
ये न्याय नहीं है- स्मिता मिश्रा
स्मिता मिश्रा कहती हैं कि ये किसी भी सूरत में न्याय नहीं कहा जा सकता। क्योंकि केस की जांच शुरुआत से ही राजनीति से प्रेरित होकर गलत दिशा में चलती रही और देश में सामुदायिक आग लगाने वाले इस बीच में बच निकले। मालेगांव ब्लास्ट के असल आरोपी बच निकले और निर्दोष लोगों को इस केस में जबरन घसीटा गया।इस मामले पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।












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